Sunday, 24 September 2017

1857 ग़दर में अंग्रेजों को धूल चटाने वाले महानायक 

नाना साहेब पेशवा ...

नाना साहेब का जन्म सन 1824 में वेणुग्राम निवासी माधवनारायण राव के घर में हुआ था। इनके पिता जी पेशवा बाजीराव द्वतीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा ने बालक नानाराव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का प्रबंध किया। उन्हें हाथी घोड़े की सवारी, तलवार व बंदूक चलाने की विधि सिखाई गई और कई भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी कराया गया। नाना साहेब पेशवा सन् 1857 के भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के शिल्पकार थे। स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहियों का नेतृत्व किया था।

1857 ग़दर के हीरो थे नाना साहेब-

1857 में जब मेरठ में क्रांति की शुरुवात हुई तो नाना साहेब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांति की सेनाओं का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। क्रांति प्रारंभ होते ही उनके अनुयायियों ने अंग्रेजी खजाने से साढ़े आठ लाख रुपया और कुछ युद्धसामग्री प्राप्त की। कानपुर के अंग्रेज एक गढ़ में कैद हो गए और क्रांतिकारियों ने वहाँ पर भारतीय ध्वजा फहराई।

जब अंग्रेज अफसर ने रोक दी नाना की पेंशन-

अंग्रेज अफसर डलहौज़ी ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद नाना साहब को 8 लाख की पेन्शन से वंचित कर, उन्हें अंग्रेज़ी राज्य का शत्रु बना दिया था। नाना साहेब ने जब इस अन्याय की फरियाद को देशभक्त अजीम उल्लाह ख़ाँ के माध्यम से इंग्लैण्ड की सरकार तक पहुँचाया, तो वहा से भी उन्हें निराशा हाथ लगी उसके बाद नाना और अजीम दोनों ही अंग्रेज़ी राज्य के विरोधी हो गये और भारत से अंग्रेज़ी राज्य को उखाड़ फेंकने के प्रयास में लग गये। 1857 में भारत के विदेशी राज्य के उन्मूलनार्थ, जो स्वतंत्रता संग्राम का विस्फोट हुआ था, उसमें नाना साहेब का विशेष उल्लेखनीय योगदान रहा था।

20 साल तक मराठा साम्राज्य पर किया शासन-

नाना साहेब के दो भाई थे रघुनाथराव और जनार्दन. रघुनाथराव ने अंग्रेज़ों से हाथ मिलकर मराठाओं को धोखा दिया, जबकि जनार्दन की अल्पायु में ही मृत्यु हो गयी थी. नाना साहेब ने 20 वर्ष (1740 से 1761) तक मराठा साम्राज्य पर शासन किया।

नाना के बेटे की मृत्यु-

1761 में, पानीपत की तीसरी लड़ाई में अफगानिस्तान के एक महान योद्धा अहमदशाह अब्दाली के खिलाफ मराठाओं की हार हुई. मराठों ने उत्तर में अपनी शक्ति और मुगल शासन बचाने की कोशिश की। लड़ाई में नानासाहेब के चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ (चिमाजी अप्पा के पुत्र), और उनके सबसे बड़े पुत्र विश्वासराव मारे गए थे। उनके बेटे और चचेरे भाई की अकाल मृत्यु उनके लिए एक गंभीर झटका थी।

नाना की मृत्यु-

नाना के बेटे के बाद नाना साहेब भी ज़्यादा समय के लिए जीवित नहीं रहे। जिस समय नाना साहब नेपाल स्थित ‘देवखारी’ नावक गांव में, दल-बल सहित पड़ाव ड़ाले हुए थे, वह भयंकर रूप से बुख़ार से पीड़ित हो गए और केवल 34 वर्ष की अवस्था में 6 अक्टूबर, 1858 को मृत्यु की गोद में समां गये। उनका दूसरा बेटा माधवराव पेशवा उनकी मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा.


sanskar-nov

मध्यकालीन भारत के कुछ महान क्षत्रिय राजा 
जिनका इतिहास सभी धर्मावलम्बियो को पढना चाहिए ...

1. *बप्पा रावल*- अरबो, तुर्को को कई हराया ओर हिन्दू धरम रक्षक की उपाधि धारण की
2. *भीम देव सोलंकी द्वितीय* - मोहम्मद गौरी को 1178 मे हराया और 2 साल तक जेल मे बंधी बनाये रखा
3. *पृथ्वीराज चौहान* - गौरी को 16 बार हराया और और गोरी बार बार कुरान की कसम खा कर छूट जाता ...17वी बार पृथ्वीराज चौहान हारे
4. *हम्मीरदेव (रणथम्बोर)* - खिलजी को 1296 मे अल्लाउदीन ख़िलजी के 20000 की सेना में से 8000 की सेना को काटा और अंत में सभी 3000 राजपूत बलिदान हुए राजपूतनियो ने जोहर कर के इज्जत बचायी ..हिनदुओ की ताकत का लोहा मनवाया
5. *कान्हड देव सोनिगरा* – 1308 जालोर मे अलाउदिन खिलजी से युद्ध किया और सोमनाथ गुजरात से लूटा शिवलिगं वापिस राजपूतो के कब्जे में लिया और युद्ध के दौरान गुप्त रूप से विश्वनीय राजपूतो , चरणो और पुरोहितो द्वारा गुजरात भेजवाया तथा विधि विधान सहित सोमनाथ में स्थापित करवाया
6. *राणा सागां*- बाबर को भिख दी और धोका मिला ओर युद्ध . राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे, युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे.
7. *राणा कुम्भा* - अपनी जिदगीँ मे 17 युदध लडे एक भी नही हारे
8. *जयमाल मेड़तिया*- ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट डाला था। चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में *जयमाल राठौड़* पैर जख्मी होने कि वजह से *कल्ला जी* के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान की याद आयी थी, जंग में दोनों के सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ते रहे और 8000 राजपूतो की फौज ने 48000 दुश्मन को मार गिराया ! अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर जयमाल मेड़तिया और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में लगवायी 
10. *रानी दुर्गावती*- चंदेल राजवंश में जन्मी रानी दुर्गावती राजपूत राजा कीरत राय की बेटी थी। गोंडवाना की महारानी दुर्गावती ने अकबर की गुलामी करने के बजाय उससे युद्ध लड़ा 24 जून 1564 को युद्ध में रानी दुर्गावती ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद अपने आपको मुगलों के हाथों अपमान से बचाने के लिए खंजर घोंपकर आत्महत्या कर ली।
11. *महाराणा प्रताप* - इनके बारे में तो सभी जानते ही होंगे ... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.
12. *जय सिंह जी* - जयपुर महाराजा ने जय सिंह जी ने अपनी सूझबुज से छत्रपति शिवजी को औरंगज़ेब की कैद से निकलवाया बाद में औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उनकी हत्या विष देकर करवा डाली
13. *छत्रपति शिवाजी* - मराठा वीर वंशज छत्रपति शिवाजी ने औरंगज़ेब को हराया तुर्को और मुगलो को कई बार हराया
14. *रायमलोत कल्ला जी* का धड़ शीश कटने के बाद लड़ता- लड़ता घोड़े पर पत्नी रानी के पास पहुंच गया था तब रानी ने गंगाजल के छींटे डाले तब धड़ शांत हुआ उसके बाद रानी पति कि चिता पर बैठकर सती हो गयी थी.
15. सलूम्बर के नवविवाहित *रावत रतन सिंह चुण्डावत* जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई निशानी मांगी तो रानी ने सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे तब रानी ने निशानी के तौर
पैर अपना सर काट के दे दिया था, अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए शहीद हो गये थे.
16. औरंगज़ेब के नायक तहव्वर खान से गायो को बचाने के लिए पुष्कर में युद्ध हुआ उस युद्ध में *700 मेड़तिया राजपूत* वीरगति प्राप्त हुए और 1700 मुग़ल मरे गए पर एक भी गाय कटने न दी उनकी याद में पुष्कर में गौ घाट बना हुआ है
17. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और धड़ पाकिस्तान में है.
18. जोधपुर के *यशवंत सिंह* के 12 साल के पुत्र *पृथ्वी सिंह* ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.
19. *करौली के जादोन राजा* अपने सिंहासन पर बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते थे.
20. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 राजपूत सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर भी अकबर की मुगल सेना पर हिंदू भारी पड़े
21. राजस्थान पाली में आउवा के *ठाकुर खुशाल सिंह* 1857 में अजमेर जा कर अंग्रेज अफसर का सर काट कर ले आये थे और उसका सर अपने किले के बाहर लटकाया था तब से आज दिन तक उनकी याद में मेला लगता है

Saturday, 23 September 2017

saskar-nov

हिंदु और सिखों में अलगांव वाद पैदा करनेवाले जरा एक बार बज्जर सिंह का चरित्र पढ़ ले -

सरदार बज्जर सिंह राठौड़ के विषय में, जिनका देश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है बहुत कम लोग इससे परिचित हैँ।

सरदार बज्जर सिंह राठौड सिक्खो के दसवे गुरू श्री गोविंद सिंह जी के गुरू थे ,जिन्होने उनको अस्त्र शस्त्र चलाने मे निपुण बनाया था। बज्जर सिंह जी ने गुरू गोविंद सिंह जी को ना केवल युद्ध की कला सिखाई बल्कि उनको बिना शस्त्र के द्वंद युद्ध, घुड़सवारी, तीरंदाजी मे भी निपुण किया। उन्हे राजपूत -मुगल युद्धो का भी अनुभव था और प्राचीन भारतीय युद्ध कला मे भी पारंगत थे। वो बहुत से खूंखार जानवरो के साथ अपने शिष्यों को लडवाकर उनकी परिक्षा लेते थे। गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने ग्रन्थ बिचित्तर नाटक मे इनका वर्णन किया है। उनके द्वारा आम सिक्खो का सैन्यिकरण किया गया जो पहले ज्यादातर किसान और व्यापारी ही थे और भारतीय martial art गटखा का प्रशिक्षण भी दिया, ये केवल सिक्ख ही नही बल्की पूरे देश मे क्रांतिकारी परिवर्तन साबित हुआ।
बज्जर सिंह राठौड जी की इस विशेषता की तारीफ ये कहकर की जाती है कि जो कला सिर्फ राजपूतों तक सीमित थी उन्होंने मुग़लो से मुकाबले के लिये उसे खत्री सिक्ख गुरूओ को भी सिखाया, जिससे पंजाब में हिन्दुओ की बड़ी आबादी जिसमे आम किसान, मजदूर, व्यापारी आदि शामिल थे, इनका सैन्यकरण करना संभव हो सका।

===पारिवारिक पृष्टभूमि===
बज्जर सिंह जी सूर्यवंशी राठौड राजपूत वंश के शासक वर्ग से संबंध रखते थे। वो मारवाड के राठौड राजवंश के वंशंज थे --
वंशावली--
राव सीहा जी
राव अस्थान
राव दुहड
राव रायपाल
राव कान्हापाल
राव जलांसी
राव चंदा
राव टीडा
राव सल्खो
राव वीरम देव
राव चंदा
राव रीढमल
राव जोधा
राव लाखा
राव जोना
राव रामसिंह प्रथम
राव साल्हा
राव नत्थू
राव उडा ( उडाने राठौड इनसे निकले 1583 मे मारवाड के पतंन के बाद पंजाब आए)
राव मंदन
राव सुखराज
राव रामसिंह द्वितीय
सरदार बज्जर सिंह ( अपने वंश मे सरदार की उपाधि लिखने वाले प्रथम व्यक्ति) इनकी पुत्री भीका देवी का विवाह आलम सिंह चौहान (नचणा) से हुआ जिन्होंने गुरू गोविंद सिंह जी के पुत्रो को शस्त्र विधा सिखाई--।

1710 ईस्वी के चॉपरचिरी के युद्ध में इन्होंने भी बुजुर्ग अवस्था में बन्दा सिंह बहादुर के साथ मिलकर वजीर खान के विरुद्ध युद्ध किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।

स्त्रोत : गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा कृत-बिचित्तर नाटक
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Friday, 22 September 2017

वेदव्यासों द्वारा वेद मन्त्रों का संकलन-
28 वेदव्यास हुए थे, अर्थात् 28 बार वेदों का संकलन हुआ। कई बार वेद लुप्त भी हुए हैं। उनका हयग्रीव, वराह तथा मत्स्य अवतारों द्वारा उद्धार हुआ है।
केवल दयानन्द द्वारा सुनी हुई संहितायें ही वेद नहीं हैं। ऋक् वेद की सभी 21 संहितायें ऋक् वेद हैं। उनमें अभी 3 उपलब्ध हैं-शाकल्य, वाष्कल, शांख्यायन। इसी प्रकार यजुर्वेद की सभी 101 शाखायें यजुर्वेद हैं। शुक्ल की 2 तथा कृष्ण की 4 शाखा उपलब्ध हैं-काण्व, माध्यन्दिन, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कपिष्ठल। सामवेद की आकाश में 1000 तथा शब्द रूप में 13 शाखा हैं जिनमें 3 उपलब्ध हैं-कौथुमी, जैमिनीय, राणायनीय। अथर्ववेद की आकाश में 50 तथा शब्द रूप में 9 शाखा हैं जिनमें 2 उपलब्ध हैं-शौनक, पैप्पलाद।
वेद मन्त्र समझने लायक, भाषा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प, शिक्षा का जब तक विकास नहीं हो तब तक किसी भी मनुष्य को तथाकथित ईश्वर वेद नहीं दे सकता। इसमें प्रत्येक मन्त्र में ऋषि के उल्लेख से ही स्पष्ट है कि भिन्न भिन्न स्थान और काल के ऋषियों को मन्त्र का दर्शन हुआ था। इनका संकलन 28 बार 28 व्यासों द्वारा हुआ है।
ब्रह्म के कई स्तर हैं। परात्पर में निर्विशेष या सविशेष द्वारा कोई मन्त्र नहीं दिया जा सकता। ईश्वर रूप सभी प्राणियों के हृदय में रह कर नियन्त्रण करता है (गीता, 18/61)। उसकी प्रेरणा से अनुभव हो सकता है। वह परा वाणी के स्तर पर होगा। उसको पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी के स्तर पर व्यक्त करना मनुष्य ऋषि का काम है। अव्यक्त परा वाक् को व्यक्त वाणी के मन्त्र में प्रकट करने से वह शाश्वत होता है जैसा ईशावास्योपनिषद (काण्व संहिता, अध्याय 40) में लिखा है-
स पर्यगात् शुक्रं अकायं अस्नाविरं, शुद्धं अपापविद्धं कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः।
मनुष्य ऋषियों द्वारा अलग अलग मन्त्र का दर्शन होने पर भी 3 प्रकार से वेद अपौरुषेय है-
(1) मन्त्र दर्शन के समय ऋषि अपने व्यक्तित्व से स्वतन्त्र था।
(2) यह किसी एक व्यक्ति का मत नहीं है। भिन्न भिन्न ऋषियों के मन्त्रों के संकलन रूप में औसत है।
(3) 5 प्रकार के ज्ञानेन्द्रिय द्वारा प्राप्त ज्ञान के अतिरिक्त इसमें 2 प्रकार के अतीन्द्रिय ज्ञान भी हैं। इनके माध्यम के रूप में 5 सत् प्राण तथा 2 अतिरिक्त असत् प्राण (परोरजा, ऋषि) वेद में वर्णित हैं।
वेद को ३ अर्थों में अपौरुषेय कहा है-
(१) अतीन्द्रिय ज्ञान-सामान्यतः ५ ज्ञानेन्द्रियों से ५ प्राणों के माध्यम से ज्ञान होता है। अन्य २ असत् प्राणों से अतीन्द्रिय ज्ञान होता है। इनको परोरजा तथा ऋषि कहा गया है। सृष्टि का मूल ऋषि प्राण है जो सभी चेतना से परे होने के कारण असत् है। ऊपर (स्रोत) से नीचे (शिष्य) तक ज्ञान का प्रवाह परोरजा प्राण द्वारा है, यह परोऽवरीय कहा है (पर से अवर)-
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् (मुण्डकोपनिषद् २/१/८),
पञ्च प्राणोर्मिं पञ्च बुद्ध्यादि मूलाम्। (श्वेताश्वतर उपनिषद्१/५)
परोरजसेऽसावदोम् (बृहदारण्यक ५/१४/७), परोरजा य एष तपति (भ्रुह. ५/१४/३)
परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति, य एतदेवं विद्वान् (छान्दोग्य उपनिषद् १/९/२)
असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति । ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
(२) कई ऋषियों का समन्वय- वेद मन्त्रों का दर्शन मनुष्य ऋषियों द्वारा हुआ। किन्तु कई हजार वर्षों तक विभिन्न देशों के ऋषियों द्वारा मन्त्र का दर्शन होने से उनका समन्वय अपौरुषेय है।
ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात् कृतकर्माण ऋषयो बभूवुः। (निरुक्त १/२०)
तद्वा ऋषयः प्रति बुबुधिरे य उतर्हि ऋषय आसुः (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/१४)
नमो ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रविद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यो। मा मामृषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहु (दु) र्दैवी वाचमुद्यासम्॥ (वरदापूर्वतापिनी उपनिषद्, तैत्तिरीय आरण्यक, ४/१/१, मैत्रायणी संहिता ४/९/२)
ऋषे मन्त्रकृतां स्तोत्रैः कश्यपोद्वर्धयत् गिरः। सोऽयं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥ (ऋक् ९/११४/२)
आप्तोपदेशः शब्दः। (न्याय सूत्र १/१/७)
(३) तीन विश्वों का समन्वय-विश्व के ३ स्तरों का समन्वय जो विज्ञान के प्रयोगों द्वारा सम्भव नहीं है-आधिदैविक (आकाश की सृष्टि), आधिभौतिक (पृथ्वी पर), आध्यात्मिक (मनुष्य शरीर के भीतर)। इनका एक दूसरे की प्रतिमा रूप दर्शन परोरजा या ऋषि प्राण से सम्भव है।
स ऐक्षत प्रजापतिः (स्वयम्भूः) इमं वा आत्मनः प्रतिमामसृक्षि। आत्मनो ह्येतं प्रतिमामसृजत। ता वा एताः प्रजापतेरधि देवता असृज्यन्त-(१) अग्निः (तद् गर्भितो भूपिण्डश्च), (२) इन्द्रः (तद् गर्भितः सूर्यश्च), सोमः (तद् गर्भितः चन्द्रश्च), (४) परमेष्ठी प्राजापत्यः (स्वायम्भुवः)-शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१२-१३)
पुरुषोऽयं लोक सम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुः आत्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके॥ (चरक संहिता, शारीरस्थानम् ५/२),
अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च (तत्त्व समास ७)
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्म उच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः॥३॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषस्याधिदैवतम्। (गीता, अध्याय ८)
सृष्टि और वेद का आरम्भ- पहले मूल वेद एक ही था। इसे ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को पढ़ाया था अतः उसे अथर्ववेद कहते थे। बाद में उसका परा और अपरा विद्या मे अङ्गिरा ने विभाजन किया। उनके शिष्य सत्यवह भरद्वाज ने अपरा विद्या का विभाजन 4 वेद और 6 अङ्गों में किया। यह मुण्डक उपनिषद् के प्रथम 5 श्लोकों में है। अतः भरद्वाज गोत्र वालों को आङ्गिरस भरद्वाज कहते हैं। मूल वेद अथर्ववेद होने के कारण इसके बारे में सभी वेदों में लिखा है ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में ही 30 बार सामवेद तथा प्रायः 40 बार अथर्ववेद का उल्लेख है। पर इस ऐतिहासिक क्रम को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों ने प्रचार किया कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है। वैदिक क्रम को नष्ट करने के लिए यूनेस्को आदि भी ऐसी घोषणा करते रहते हैं। भारतीय लोग विदेशियों की नकल के अतिरिक्त कुछ नहीं करते। मूल अथर्व से 3 शाखाएं ऋक्, यजु, साम निकली, पर मूल भी बना रहा। अतः त्रयी का अर्थ 4 वेद होता है-एक मूल और 3 शाखा। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे 3 पत्ते निकलने पर मूल भी बना रहता है। यज्ञोपवीत के समय वेदारम्भ संस्कार के लिये वेद का प्रतीक पलास दण्ड का प्रयोग होता है। यह वेद निर्माता ब्रह्मा का भी प्रतीक है।
मूल अथर्ववेद का प्रथम श्लोक है-
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वाः = जो 3 प्रकार के 7 हैं उनसे सभी विश्व व्याप्त हैं।
इसके 15 प्रकार के अर्थ हैं। एक अर्थ है कि 7-7 लोक आकाश में, पृथ्वी पर तथा शरीर के भीतर हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार यह सृष्टि का क्रम है। चूँकि सृष्टि का आरम्भ 3 सप्तक से हुआ, अतः वेद का आरम्भ भी उसी से हुआ तथा मनुष्य भी अपना काम वैसे ही शुरू करता है। आकाश में पहले 7 लोक हुये, तब 8 दिव्य सृष्टि और 6 पार्थिव सृष्टि हुई। 7 लोक हैं-भू, भुवः (ग्रह कक्षा), स्वः (सौर मण्डल), महः (आकाश गंगा की सर्पाकार भुजा में सूर्य के चारों तरफ उसकी मोटाई के बराबर का गोला। इसके 1000 तारा शेषनाग के 1000 सिर हैं), जनः (आकाश गंगा), तपः (दृश्य जगत् जहां तक का प्रकाश यहां तक आ सकता है), सत्य (अनन्त आकाश)।
हर लोक की चेतना या प्राण का एक स्तर है जो उस लोक की दिव्य सृष्टि है। अव्यक्त स्रष्टा या ब्रह्म सर्वव्यापी है-कुल 8 दिव्य सृष्टि हुई। पृथ्वी पर 6 प्रकार की सृष्टि है-मनुष्य ब्रह्म या विश्व की प्रतिमा है। मनुष्य मस्तिष्क में उतने ही कण (न्यूरॉन) हैं जितना दृश्य जगत् मे आकाश गंगा, या हमारी आकाश गंगा में उतने तारा हैं।एक निर्जीव या मृत (मिट्टी) है। एक अर्ध चेतन वृक्ष है। बाकी 3 जल, स्थल तथा वायु के जीव हैं।
✍🏻अरुण उपाध्याय
.इस्लाम की शीर्ष संस्था है उम्माह... जिसका सार है कि  मुसलमानो  को किसी देश के प्रति ईमानदार नहीं होना चाहिए, क्योंकि मुसलमान के लिए केवल इस्लाम का महत्व है...
अगर किसी भी देश के मुसलमान के लिए अपने देश के काफिरों को मारना पड़े, तो मुसलमान को एक पल भी नहीं सोचना चाहिए..., जी हां यही है इस्लाम में राष्ट्रवाद न होने का सार।
इस्लाम के अनुसार जहां तक मुसलमानों की बहुसंख्यक जनता के प्रभाव से देश चलते हैं, शासन चलते हैं वह सब दार-अल-इस्लाम हैं। +जो नही हैं वह दार-अल-हर्ब की भूमि कही जाती है।
भारत, बर्मा, श्रीलँका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि को "उम्माह" के अनुसार दार-अल-कब्ज़ा की स्थिति में माना जाता है, हालांकि इसका कोई लिखित concept नही है जैसे दार-अल-इसलाम और दार-अल-हर्ब का है।
 बौद्ध राजाओं ने "Rakhine" में रहने वाले मुसलमानो को इज़्ज़त, दौलत दी... लेकिन स्वभाव से मजबूर बर्मा के मुसलमानो, ने इन सारी इज़्ज़तों को लात मार के "उम्माह" के concept पे चलने का फैसला किया।
परन्तु DNA की विकृति से मजबूर रोहिंग्या मुसलमानो ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय, गुप-चुप तरीकों से Britian से setting कर ली कि बर्मा के मुसलमान अपने ही बौद्ध भाइयों के खिलाफ (जो द्वित्य विश्व युद्ध में जापान की तरफ थे) विश्व युद्ध में England का साथ देंगे और बदले में England उनको एक मुस्लिम राष्ट्र देने में मदद करेगा।
तो रोहिंग्या मुसलमानो ने इंग्लैंड के साथ मिल कर के अपने ही बौद्ध भाइयों को काटना शुरू किया, और खूब काटा, जी भर जाने तक काटा.... लेकिन जैसा होता आया है विश्व युद्ध जीत जाने के बाद England ने रोहिंग्या मुसलमानो को कोई इस्लामिक राष्ट्र देने में मदद नहीं की, अर्थात अपना काम बना कर निकल गए।
 , भोले-भाले बौद्ध भी हिन्दूओं की भांति इस इस्लामिक शीर्ष संस्था "उम्माह" के concept को जानते भी नहीं थे... इन सब को भुला कर बौद्धों ने रोहिंग्या मुसलमानो को शान्ति से और मिल-जुल कर रहने का प्रस्ताव दिया, पर रोहिंग्या मुसलमान उस प्रस्ताव को ठुकरा के MAY, 1946 में जिन्नाह के पास चले गए, खुद को पाकिस्तान में मिलवाने का प्रस्ताव लेकर...
नरमदिल बौद्ध लोगों ने बड़ी दरियादिली दिखा कर रोहिंग्या मुसलमानो के सब गलती को माफ़ करके अपने Parliament में बुलाया, और रोहिंग्या मुसलमानो से उनकी परेशानी बताने को कहा ताकि मिल-जुल कर दोनों समुदाय ख़ुशी से रह सकें... पर रोहिंग्या ने भाईचारे के इस पेशकश को मानने से इंकार कर दिया 
फिर रोहिंग्या ने वही किया, जो दुनिया भर के मुसलमान करते हैं, गुप्त रास्तों से रोहिंग्या मुसलमानो ने RAKHINE में लाखों बांग्लादेशियों की घुसपैठ कार्रवाई, और RAKHINE के जन्मसंख्या का ढांचा बदल दिया।
अधिक आबादी के जोश में रोहिंग्या मुस्लमानो ने फिर से बर्मा के बौद्धों पर हमला शुरू कर दिया और 1954 में 100 से अधिक बौद्धों का क़त्ल किया, जिसके जवाब में बर्मा सरकार को मजबूरन रोहिंग्या पे attack करना पड़ा, जिसमे काफी रोहिंग्या भी मारे गए।

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केरल के एक मुस्लिम  धर्मगुरु अब्दुल मुहसिन एडिड ने बयान दिया है कि वह जो कुछ कह रहा है वह उसका निजी बयान नहीं, बल्कि उसका बयान इस्लाम और सऊदी अरब के मुस्लिम धर्मगुरु की विचारधारा के हवाले से दिया गया है: मुहसिन एडिड ने कहा है कि मुसलमानो के लिए देशभक्ति हराम है क्योंकि इस्लाम में देशभक्ति हराम है।
 धर्मगुरु ने यह भी कहा है कि भारत के मुसलमानो को इस्लामिक देशों (पाकिस्तान, सऊदी इत्यादि) से प्यार करना चाहिए, भले ही वो उसके निवासी हो न हो, या उन देशों से कोई सम्बन्ध भी न हो। उन्हें तो सिर्फ मुसलमान होने के कारण इस्लामिक देशों से प्यार करना चाहिए। उनके प्रति ईमानदारी रखनी चाहिए। मुसलमानो के लिए इस्लाम पहले है, और भारत की जगह उन्हें उन देशों को प्यार करना चाहिए जो की इस्लामिक देश हो, जैसे की पाकिस्तान, सऊदी अरब, बांग्लादेश, अफगानिस्तान -इत्यादि..
उमा शंकर सिंह

Thursday, 21 September 2017

 *इसाई धर्म*
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ईसा एक है
बाइबिल एक।
फिर भी, लेटिन कैथलिक, सीरियन कैथलिक, मारथोमा, पेंटेकोस्ट, सैल्वेशन आर्मी, सेवेंथ डे एडवांटिष्ट, ऑर्थोडॉक्स, जेकोबाइट जैसे 146 फिरके आपस में किसी के भी चर्च में नहीं जाते।
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*इस्लाम धर्म*
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अल्लाह एक,
कुरान एक,
नबी एक।
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फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे। सबकी अलग मस्जिदें। साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ सकते। धर्म के नाम पर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।
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*हिन्दू धर्म*
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1280 धर्म ग्रन्थ
10 हज़ार से ज्यादा जातियां, अनगिनत पर्व एवं त्योहार,
असंख्य देवी-देवता।
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एक लाख से ज्यादा उपजातियां, हज़ारों ऋषि-मुनि, सैकड़ों भाषाएँ।
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फिर भी सारे हिन्दू सभी मन्दिरों में जाते हैं और सारे त्योहारों को मनाते हुए आपस में शान्ति एवं शालीनता से रहते हैं।
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यह है भव्यता, सुन्दरता और खूबसूरती हिन्दू धर्म की ...... !!
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फिर क्यों न गर्व हो हिन्दुओं को हिन्दू धर्म पर .....आज कल लोगो के पास मे aadhyatmik ज्ञान की कमी होने के कारण लड़ाई बड़ रहा है. हिन्दू में अशांति फेल रही है । आपस मे एक नही हो पा रहे है। लोग आपने को ही नही जानते है कि मै कौन हूं? लोग आपने को अलग अलग जाती में हिन्दू बट गए है। कोई बोलता है में ब्राम्हण हु कोई छत्रिय, कोई वैस्य, कोई शूद्र आपने आप को नही जानने के कारण आज हिन्दू एक नही हो पाता है। मैं आत्मा हु बस इतना मान ले और जान ले तो उसी दिन से ही सभी हिन्दू एक जुट हो जाएंगे। हिन्दू एक जुट नही होने के कारण मुसलमान और ईसाई मिशनरी इसका बहुत अच्छे से फायदा उठा रहा है और हिन्दू बैठा हुए है सोया हुए है ।
जागो हिन्दू जागो।
Kuber Ram Sapaha

गजवा-ए-हिन्द का ये सच! आँखों के सामने होने के बावजूद भी नहीं जानते करोड़ों हिन्दू...
गजवा-ए-हिन्द का मतलब होता है इस्लाम कि भारत पर विजय। और इस की तैयारी जोरो पर है। एक जगह जहाँ मिडिया हिन्दुओ का ध्यान बाटने में लगी है, वही दूसरी और यह कोशिशें ज़ोरों पर है,फर्क सिर्फ यह है इन कोशिशों को सेकुलर चोला पहनाया जा रहा है।
काफिरों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं। जब भी किसी आक्रान्ता और अक्रमंनकारी के नाम के सामने गाजी लग जाता है, उसका यह मतलब होता है कि निश्चय ही वह हिन्दुओ का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था।
हिन्दुओ की सबसे बड़ी कमजोरी है की हम अपने ही धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और फिर भी अपने को सेकुलर कहते है। पर क्या हम सेकुलर का मतलब भी जानते है ? कभी भी कोई मुस्लिम अपने को सेकुलर नहीं कहेगा, फिर चाहे वह नेता हो या आम नागरिक। पर वह एक भीड़ को सेकुलर भाषण जरुर दे सकता है। कहा जाता है कि मुहीम के लिए लड़के इस तरह तैयार किए जा रहें है कि वह पुलिस और फ़ौज से मुकाबला कर पाएंगे और हर आम गैर मुस्लिम पर भारी पड़ेंगे।
यह बहुत ही चिंता कि बात है क्यूंकि गजवा-ए-हिन्द का मतलब है की भारत में सभी गैर मुस्लिम पर इस्लामिक शरिया कानून लागु किया जायेगा, जिसका साफ़ साफ शब्दों में यह मतलब हुआ कि:
“इनको मारकर ख़तम कर दो या इनको इस्लाम स्वीकार कराओ”
या
“उन्हें तब तक जिन्दा रखो जब तक अपनी कमाई का एक हिस्सा “जजिया कर” के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहे”
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, मुग़ल यह कोशिश एक बार पहले कर चुके है, जिसका बड़ा उदाहरण “ताजमहल” है, जो एक शिवमंदिर था और उसे?
गजवा-ए-हिन्द को और तफ्शीश से समझिये:
1- अल-तकिय्या
इस अवस्था में जब एक मुस्लिम कमजोर हो जाता है, तब उसे काफिरों यानि गैर-मुस्लिमों से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना कि पूरी इज़ाज़त होती है। इस अवस्था से मुस्लमान अपने को अंदरूनी तौर से मजबूत रखेंगे और काफिरों से अपनी अंदरूनी जानकारियों से दूर रखेंगे। इसके चलते नेहरुद्दीन जवाहिरी और मैमूना बेगम, राजीव का असली धर्म आज भी किसी को नहीं पता है।
2- काफिरों के मन में भय भरना
इस मुकाम को हासिल करने के लिए काफिरों पर धोखे से हमला करना और उनकी हत्या करना, जायज़ होगा। उनपर झुण्ड बनाकर किसी एक जगह पर हमला करा जायेगा। और ऐसा तो पिछले ३-४ सालों से भारत में जारी है। कितने ही गैर मुस्लिम अगुआ और आक्रामक नेताओं को मौत के घात उतर दिया गया है। इससे लोगों के दिल में डर बना रहता है। और सार्वजनिक रूप से आम हिन्दू इसके खिलाफ जबान नहीं खोलते।
3- हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना
इस मुहीम के मुसलमानों का मानना है काफ़िर को जितनी पीड़ा दायक मृत्यु दी जाये और वो भी दूसरे काफ़िर को दिखाकर) वह उतना ज्यादा प्रभावित होता है। हथियार इकठ्ठा करने का काम अदनान खगोशी और उसके बाद बहुत से मुस्लिम तस्कर पिछले ४० साल से कर रहे हैं। सबसे ज्यादा हथियार सोवियत संघ से मुस्लिम देशों के टूटने के बाद भारत में लाये गए, अनुमान के अनुसार पूर्व सोवियत देशों से १ करोड़ AK-47 गायब हुयीं मगर आज तक उनका कोई पता नहीं है! ये हथियार मुख्यतः भारत में है और कुछ अफ़ग़ानिस्तान में।
4- समय समय पर काफिरों की ताकत का अंदाज़ा करना
ताकत का अंदाज़ा लगाने के लिए दंगो का सहारा लिया जाता है। यह प्रतिरोध का आंकना बहुत दिनों से चल रहा है और इसका उदाहरण जम्मू के किश्तवाड़ में देखने को मिला है। छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा करवाया जायेगा, और जब काफिर एक जुट हो जायेंगे तो उनकी ताकत का पता लग जायेगा।
5- ठिकाने या शिविर बनाना
इस काम के लिए धर्म का सहारा लिया जायेगा और दूसरे धर्म पर इस्लाम को सच्चा धर्म बताकर लोगों को आस्थावान बनाया जायेगा। इससे लोग मुस्लिमों पर विश्वास कर्नेगे और उन पर शक नहीं करेंगे। इन इलाकों से गैर मुस्लिमों को दूर रखा जायेगा, जिस से उन्हें गतिविधियों की जानकारी मिल नहीं पायेगी। इस काम के लिए बस्तियों और मस्जिदों को इस्तेमाल किया जायेगा। लोगों को इकठ्ठा करा जायेगा और उन्हें भड़काकर काफिरों का सफाया करने के लिए भेजा जायेगा। उद्देश्य सभी काफिरों को भगाना होगा, ताकि उन्हें संवेदनशील सूचनाएँ न मिल पाएं।
“क्योंकि इस्लाम की असली ताकत “अल-तकिय्या” ही है।”
6- सरकारी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करना
इस काम के लिए तो खुद सरकारें शामिल हैं। सच तो यह है कि सेकुलर सरकारें खुद इस काम को समर्थन दे रही हैं। अगर किसी फौजी के पास १२०० गज कारगर रेंज की असाल्ट रायफल है, वह यह जान ले कि यह जेहादियों पर गुलेल चलने के बराबर है। इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन केस इसी का भाग है, यह दोनों केस इस्लामिक शक्तियों के इशारे पर हुए थे।
7- व्यापक दंगे
यह गजवा-ए-हिन्द का अंतिम उद्देश्य है और इस में बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर मुस्लिम मर्दों को मौत के घाट उतरा जायेगा। गजवा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण सबसे उपयुक्त समय होगा, और ऐसा पाकिस्तानी वेबसाइटों पर बार-बार देखने को मिलता है। जेहादी लड़कों के मरने पर युवा जेहादियों को ७२ सुन्दर जवान हुर्रें मिलने की बात कई बार कही गई है। और वह जीत जाता है तो जवान काफ़िर महिलाओं के साथ सहवास करने के अनंत मौके प्रदान किए जायेंगे!
यही अंतहीन सिलसिला पिछले १४०० सालों से चल रहा है। पहले हमारे देश कि सनातनी जड़ें गहरी थीं, जिस कारण हम ऐसे खतरों का सामना बड़ी अच्छी तरह से कर पाते थे। लेकिन आज के दिन झूठे इतिहास और गलत पढ़ाई तथा चर्चों ने हिंदुत्व को बहुत आघात पहुँचाया है।
गजवा-ए-हिन्द की प्रक्रिया कश्मीर में आज़माई जा चुकी है १००% सफल रही है, जम्मू में इसका ट्रायल चल रहा है। बीच में ईसाइयत के इनके खेल को कमजोर ज़रूर किया था लेकिन अब दोबारा इसने गति पकड़ ली है।
उमा शंकर सिंह

250 ग्राम नीम के पत्ते लें |
इन्हें साफ करके एक बर्तन में रख दें।
1/2 लीटर साफ पानी एक बर्तन में लें और नीम के पत्ते उसमें डाल कर अच्छी तरह गर्म करें ।
फिर इसमें 3 दाने इलायची, थोड़ा सा पौदीना, थोड़ी सी दालचीनी और 4 दाने लोंग के डालें ।
जब पानी आधा रह जाए तब पानी को उतार कर छान लें।
ठंडा होने पर ये एक ग्लास पानी लेकर कुल्ली करें और 2 घूंट पी जाएं
इससे खोपड़ी का वो कीड़ा मर जाएगा , जो आपको काम-धंधे छुड़वा कर wtsapp उलझाए रखता है
Jitendra Pratap Singh

*अन्न के स्थूल भाग से रक्त मज़्ज़ा और शारीरिक कोष बनते हैं, अन्न की ऊर्जा से प्राणमय कोष बनते हैं और अन्न के संस्कार से मनोमय कोष बनता है।* आहार चयन में विशेष सावधानी बरते, कृषि द्वारा प्राप्त अन्न जिसे दुबारा बोने पर पुनः पौधे निकल सकें, ऐसे सात्विक अन्न को बलिवैश्व में भोग लगा के संस्कारित करके खाने से स्वस्थ शरीर के साथ, श्रेष्ठ प्राण ऊर्जा और श्रेष्ठ मन बनता है जो मानव मात्र के लिए उत्तम है।
पशु जिनमें सम्वेदना व्यक्त करने की क्षमता हो, दर्द पर छटपटाहट हो, ऐसे जीव को मारकर खाने पर मॉस में पशु का श्राप होता है। स्थूल शरीर हेतु तो कुछ लाभ मिल भी सकता है मांस भक्षण से लेकिन, मर्मान्तक हत्या द्वार प्राप्त माँस से प्राण ऊर्जा नहीं मिलती और दूषित मन का निर्माण होता है।
अन्न के संस्कार के आधार पर ही- इसे सात्विक, तामसिक और राजसिक भागों में बाँटा गया है।
ऐसा जीव जो स्वतः मरा हो, उसका भक्षण करने पर उतना मन पर बुरा असर नहीं पड़ता, जितना जबरन स्वाद हेतु हत्या कर, तड़फ़ाकर हलाले माँस को खाने पर पड़ता है। कुत्सित कुंठित असंवेदनशील निर्दयी मन का निर्माण करती है, जो मानवमात्र के लिए घातक होता है।
🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाईन इण्डिया यूथ एसोसिएशन
नूर इस्लाम नामक रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी, जिसे आस्ट्रेलियन सरकार निशुल्क भोजन, आवास,मेडिकल सुविधाएं देती है ,सुबह दस बजे ,मेलबोर्न,आस्ट्रेलिया के कामनवेल्थ बैंक में पहुचता है और फ्री आर्थिक सहायता वाली क्यू में लग जाता है,जहां अगले दिन आने को कहा जाता है ! रोहिंग्या शरणार्थी का जिहाद जाग जाता है वह कामनवेल्थ बैंक के पास के ही एक सर्विस स्टेशन पर जाता है और पेट्रोल से भरी केन लेकर वापस बैंक लौटता है,बैंक में दर्जनों ग्राहक मौजूद हैं ! रोहिंग्या, ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े और खूबसूरत इंफ्रास्ट्रक्चर वाले इस बैंक में पेट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है !
बैंक की रु तीन सौ करोड़ मूल्य की संपत्ति जल कर नष्ट हो गई ! 28 आस्ट्रेलियन नागरिक पेट्रोल की आग से जलकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं,कुछ अभी भी अस्पतालों में पड़े हुए हैं ! नूर इस्लाम पकड़ लिया गया ! मगर उसने खुद को 'पागल' दर्शाना शुरू कर दिया ! रोहिंग्या 'शरणार्थी' फिलहाल रिहैबिलिटेशन सेंटर में मौज ले रहा है !
"प्रिय रोहिंग्या, हम आपका भारत मे स्वागत करते हैं?
Jitendra Pratap Singh
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कोलकाता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के सरकारी वकील से पूछा कि यदि वह दुर्गा विसर्जन के लिए मुहर्रम का जुलूस क्यों नहीं रोक रहे ?? मुहर्रम के लिए यदि आप दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन रोक सकते हैं तो फिर दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए आप मोहर्रम का जुलूस भी रोक सकते हैं लेकिन आप ऐसा नहीं कर रहे क्योंकि आपकी नियत में खोट है आप वोट बैंक की गंदी पॉलिटिक्स कर रहे हैं और न्यायालय इस गंदी पॉलिटिक्स पर चुप नहीं बैठेगी

Jitendra Pratap Singh
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एक रसूल,एक अल्लाह,एक कुरान बोलकर जो मौलवी रोहंगिया मुस्लिमो को अपना भाई बता रहे हैं, कल को वो इसी आधार पर पाकिस्तानियों को भी अपना भाई बता सकते हैं ।
युद्ध की परिस्तिथि में हो सकता हैं कि एक युद्ध सेना पाकिस्तानियो से सीमा पर लड़े और दूसरा युद्ध इनके भारत मे रहने वाले भाईयों से।
Rajesh Jindal
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दो खबरों पर गौर करें -
पहली खबर - जैसे ही एक लाख रोहीन्गया बंग्लादेश मे धुसने मे सफल हुए वैसे ही 20 रूपये किलो, आलु 50 रूपये और 30 रूपये लिटर दुध, 60 रूपये हो गया ! 
सोचीये जब मात्र एक लाख रोहीन्गया को शरणार्थी स्वीकार करने से एक देश की आर्थिक स्थिति इतनी बदल जाती है तब हमारे देश में 3 करोड़ बंग्लादेशी घुसपैठियों का हमारी अर्थव्यवस्था पर कितना गहरा प्रभाव पड रहा होगा ? 
दूसरी खबर - बंग्लादेशी शरणार्थी गौ तस्करों ने हमारे देश के फौजी की निर्मता पुर्वक हत्या कर दी ताकि वह गौ तस्करी निर्भयता पुर्वक कर सकें !
सोचीए क्या शरणार्थी कभी देशभक्त हो सकते हैं ?
आप को आश्चर्य क्यों है जब बंगाल में "बंगाल मांगे आजादी " के नारे लगने लग जाते है ? जब वहां के डेढ करोड़ निवासी आपके बंगाल के बंगाली नही बंग्लादेशी है !
मनन करें क्या बंग्लादेश कभी अपने इन नागरिकों को वापस लेगा ?
अगर आप बंग्लादेशी धुसपैठीयो को आजतक नहीं निकल सके तो आप कल क्या रोहीन्गयाऔ को निकाल सकेगें ?
अगर आप सोचते है बंगाल या कश्मीर मे आजादी के नारों के बिच बंग्लादेशी घुसपैठिये या रोहीन्गया, हिन्दुस्तानी तिरंगे तले लडेंगे तब आपको निश्चित ही जल्द से जल्द नजदीकी मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहीए क्योंकि आपको वहीं वामपंथी किडा काट गया है जो सोवियत संघ को काट गया था और वह तब मरा जब सोवीयत संघ कई हिस्सों मे बंट चुका था !
Farida Khanam

*पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है*
*पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजार्बर है, बरगद 80% और नीम 75 %*
*अब सरकार ने इन पेड़ों से दूरी बना ली तथा इसके बदले विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है*
*इस पेड़ को लगाना इंदिरा गांधी ने चालू किया. आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है*
*अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही*
*हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा*
*वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए*
पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं।
*जब सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे तब मंत्रियों और सांसदों के आवास के अंदर से सभी नीम और पीपल के पेड़ कटवा दिए थे*
*मीडिया में बड़ा मुद्दा नहीं बना, क्यूँकि मीडिया को इससे कोई लाभ नही था*
वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,
सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,
वृक्षराज नमस्तुते।
*अब करने योग्य कार्य*
*इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाय*
*आइये हम सब मिलकर अपने "हिंदुस्तान" को प्राकृतिक आपदाओं से बचाए
बांग्लादेश ने भी माना, 'साझा दुश्मन' हैं रोहिंग्या जिहादी ...
लश्कर-ए-तैयबा समर्थित अराकन रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (ARSA) जैसे जिहादी संगठनों को बांग्लादेश ने भी खतरा मान लिया है। बांग्लादेश ने कहा है कि इस तरह के रोहिंग्या जिहादी संगठन उसके व भारत और म्यांमार के लिए साझा दुश्मन हैं।
 पीएम शेख हसीना के राजनीतिक सलाहकार तौफीक इमाम ने कहा है कि खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान की आईएसआई रोहिंग्या मुद्दे का इस्तेमाल म्यांमार के साथ लगी सीमा पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए लिए कर रही है। ARSA का कनेक्शन बांग्लादेश में सक्रिय प्रमुख इस्लामिक आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से भी है ।  आईएसआई 1969 से ही रोहिंग्या अलगाववाद का समर्थन कर रही है। तब मैं अविभाजित पाकिस्तान में सिविल सर्वेंट था और चिटगान्ग में अपनी सेवा दे रहा था।'  आईएसआई एक बार फिर इसी रणनीति को अपनाकर साउथ और साउथ ईस्ट एशिया के रणनीतिक तौर पर अहम हिस्से में जिहाद की जमीन तैयार कर रही है। 
इमाम ने कहा कि इसी बहाने हसीना सरकार को अस्थिर करने की भी साजिश की जा रही है। आईएसआई दुर्गा पूजा के दौरान सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए रोहिंग्या का इस्तेमाल कर सकती है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश ने म्यांमार को रोहिंग्या जिहादियों के खिलाफ साझा मिलिटरी अभियान की भी पेशकश कर रखी है।
 उन्होंने आगे कहा कि सबसे अहम बात यह है कि यह एक मानवीय समस्या है। यही वजह है कि बांग्लादेश ने रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं।
.आइंस्टीन का सापेक्षिता का सिद्धांत और वेद...!
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वेदो के भाष्य पुराणों में एक कथा है..... कुछ इस प्रकार कि राजा रैवतक की पुत्री का नाम रेवती था। वह सामान्य कद के पुरुषों से बहुत लंबी थी, राजा उसके विवाह योग्य वर खोजकर थक गये और चिंतित रहने लगे। थक हारकर वो योगबल के द्वारा पुत्री को लेकर ब्रह्मलोक गए।
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राजा जब वहां पहुंचे तब गन्धर्वों का गायन समारोह चल रहा था, राजा ने गायन समाप्त होने की प्रतीक्षा की।
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गायन समाप्ति के उपरांत ब्रह्मदेव ने राजा को देखा और पूछा कहो, कैसे आना हुआ?
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राजा ने कहा हे ब्रह्मदेव..... मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने बनाया अथवा नहीं??????
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ब्रह्मा जी जोर से हँसे और बोले जब तुम आये तब तक तो नहीं...... पर जिस कालावधि में तुमने यहाँ गन्धर्वगान सुना उतनी ही अवधि में पृथ्वी पर 27 चतुर्युग बीत चुके हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है....अब तुम वहाँ जाओ...... और कृष्ण के बड़े भाई बलराम से इसका विवाह कर दो... अच्छा हुआ कि तुम रेवती को अपने साथ लाए जिससे इसकी आयु नहीं बढ़ी।
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अब विज्ञान की ओर आइए.... प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन की एक थ्योरी पढ़ाई जाती है... थ्योरी आफ रिलेटिविटी ....
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आर्थर सी क्लार्क ने आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी की व्याख्या में एक पुस्तक लिखी है मैन एंड स्पेस, उसमे गणना है कि 10 वर्ष का बालक यदि प्रकाश की गति वाले यान में बैठकर एंड्रोमेडा गैलेक्सी का एक चक्कर लगाये.... तो वापस आने पर उसकी आयु मात्र 66 वर्ष की होगी जबकि धरती पर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे।....
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अब आप स्वयं सोचिए.... जो बात वैज्ञानिकों को जानने में इतना समय लगा... वो बात काफी पहले ही सनातन वैदिक ग्रंथों में सन्निहित थी....यानि कि तब के विद्वान इसके बारे में काफी कुछ जानते थे,,,,
और इस महान सनातन धर्म के होते हुए धरती को चपटी बताने वाले मजहब के लोग अपने धर्म को श्रेष्ठ बतायें तो इससे बड़ा मजाक कुछ नहीं हो सकता...!

नेहरू ने आजादी मिलने के बाद अपने नाम के आगे जानबूझकर पं. लगाना शुरू कर दिया और खुद को कश्मीरी बताने लगे

जो सर्वविदित तथ्य हैं उनके अलावा जो कुछ ध्यान देने वाली बातें हैं-
नेहरू ने आजादी मिलने के बाद अपने नाम के आगे जानबूझकर पं. लगाना शुरू कर दिया और खुद को कश्मीरी बताने लगे ताकि कश्मीर के प्रति उनके रूख को लोग पक्षपाती न कह सकें।
 आजाद भारत का सेनाध्यक्ष ये किसी अंग्रेज जनरल को बनाना चाहते थे परन्तु तत्कालीन भारतीय सेना के तीन सबसे अनुभवी भारतीय अधिकारियों के विरोध के कारण फील्ड मार्शल करियप्पा को प्रथम सेनाध्यक्ष बनाया गया लेकिन फिर भी अपने मंसूबों को सफल करने के लिए कश्मीर युद्ध में जानबूझकर अंग्रेज जनरल रोचर को भारतीय सैना का सर्वेसर्वा बनाकर भारतीय सैनाध्यक्ष को प्रभावहीन कर दिया। 
फिर भी जब भारतीय सेना कश्मीर में सफल होने लगी और जनरल करियप्पा बार बार नेहरू से अनुरोध करते रहे कि हमे बस 13 दिन का वक्त और दे दीजिए 3 दिन में हम मुजफ्फराबाद जीत लेंगे और 13 दिनों में पूरा कश्मीर उसी वक्त नेहरू का संयुक्त राष्ट्र भागना और सीज फायर की घोषणा आखिर क्या साबित करती है?
 हैदराबाद प्रकरण से आप सब वाकिफ हैं ही। 
              अब बात करते हैं चीन युद्ध की हम सबको बताया जाता है कि चीन ने हमें धोका दिया, नेहरू को चीन के रूख का अंदेशा नहीं था। क्या सच में? हमें सिर्फ चीन ने धोखा दिया? सन् 1951 भारतीय सेना ने कुछ घुसपैठिये चीनी सैनिकों को गिरफ्तार किया, उनके पास से ऐसे नक्शे मिले जिनमें भारतीय क्षेत्रों जैसे अक्साई चिन, लद्दाख, अरूणांचल आदि को चीन का हिस्सा दिखाया गया था। भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा ने तुरंत नेहरू को सूचित किया और चीन को भारत के लिए खतरा बताते हुए तैयार रहने और तिब्बत पर चीन के कब्जे का विरोध करने को कहा लेकिन नेहरू ने उन्हें लताड़ दिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सेना को बेज्जत करते हुए कहा कि सेना हमें ना सिखाए कि कौन देश का शत्रु है और कौन मित्र। 1953 में जनरल करियप्पा रिटायर हो गए उन्हें वो सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वो अधिकारी थे। अब बात करते हैं दूसरे फील्ड मार्शल श्री सैम बहादुर मानेकशॉ जी की। लेकिन पहले कुछ और बातों पर ध्यान देते हैं भारत के रक्षामंत्री और नेहरू के लाडले कृष्णा मेनन की। जनाब ने ना जाने किसके निर्देश पर सन् 1957-58 में अचानक अॉर्डिनेन्स फैक्ट्रीज में रक्षा उत्पादन बंद करवा कर कप प्लेट और कॉस्मेटिक बनवाना शुरू कर दिया। सन् 1961 में ईस्टर्न कमांड के कमांडिंग अॉफीसर जनरल मानेकशॉ पर यह कहकर इन्क्वायरी बैठा दी की आपकी कार्यशैली पर अंग्रेजों का प्रभाव है जबकी स्वयं मि.मेमन अधिकांश समय लंदन में ही रहते थे। यानी एक अनुभवी और कुशल जनरल को हटाकर एक सप्लाई कोर के ब्रिगेडियर को कमांडिंग अॉफीसर बनाया गया जिसे कांबैट प्लानिंग और टैक्टिक्स का कोई अनुभव नहीं था या यूं कहें कि ये ब्रिगेडियर सहगल मेनन और नेहरू के यस मैन थे। चीनी मोर्चों की कहानी हम सब जानते हैं लेकिन एक बात कुछ अजीब सी नहीं लगती कि जिन भी मोर्चों पर भारतीय सेना मजबूत थी उन पर चीन की विजय से पहले 2-3दिनों से एम्यूनेशन और रसद की सप्लाई रूकी होती थी? हमसे कहा गया कि भारतीय सेना तैयार नहीं थी, अच्छा!! और इतनी बुरी तरह हारने के बाद जब सेना के संसाधनो और देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से डूब जाती है ठीक 3 साल के बाद ही चीन से भी अधिक इन्टैन्सिटी से किये गये हमले को भारतीय सेनाऐं कुचल के रख देतीं हैं! बदलाव क्या हुआ था इन 3 सालों में? नेतृत्व! ताशकंद में शास्त्री जी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाये जाते हैं आखिर उनका जीवित रहना किसके लिए और क्यों घातक था? क्योंकि वो कश्मीर को भारत को वापस करने की शर्त पर ही संघर्ष विराम के लिए राजी थे? अगर उनको पाकिस्तान या रशिया ने मरवाया तो भारत की नयी प्रधानमंत्री ने समझौते को संदिग्ध मान कर पुनः वार्ता की मेज पर आने का दबाव क्यों नहीं डाला? बात करते हैं 1971 की आप कहेंगे इंदिरा की शौर्य गाथा, अरे जरा ठहरिए जनाब। मैं कहूंगा की वर्तमान कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में देने और बांग्लादेश को कश्मीर की तरह नासूर बनाने के षड्यंत्र की कोशिश जिसे जनरल मानेकशॉ की अद्भुत रणनीति,जनरल जैकब की गजब की चतुरता और जनरल अरोड़ा के जुझारूपन ने धूल में मिला दिया और इस तरह बांग्लादेश का उदय हुआ और इंदिरा ना चाहते हुए भी इसके लिए जिम्मेदार बन गयीं। जी हां भारतीय सेना को दो बिल्कुल विपरीत मोर्चों पर आकस्मिक लडाई के आदेश दिये गये थे हमसे कहा जाता है कि जनरल मानेकशॉ ने पहली बार एकदम से मना कर दिया था जोकि पूरा सच नहीं है जनरल मानेकशॉ ने बड़ी चालाकी से युद्ध का आदेश अपने पास रख लिया और समय के निर्धारण के लिए स्वयं को अधिकृत कर लिया और युद्ध के आदेश के आधार पर तैयारी के लिए आकस्मिक बजट आवंटित करवा लिया जिसे तीनो सेनाओं को देकर युद्ध के लिए आवश्यक तैयारियां की गयीं ये बजट देना इंदिरा की मजबूरी थी क्योंकि हमले का लिखित आदेश जनरल मानेकशॉ के पास था और तैयारी का समय देने की मजबूरी इसलिए थी क्योंकि युद्ध की रणनीति और हमले के समय का निर्धारण सेनाध्यक्ष का विशेषाधिकार होता है। आपको मालूम है कि उस युद्ध में भी इंदिरा ने संयुक्त राष्ट्र के सुझाव के आधार पर सेना को युद्ध विराम करने का आदेश दिया था? जिसका अर्थ था बांग्लादेश का भी कश्मीर की तरह सरदर्द बनकर रह जाना लेकिन जिस समय ये आदेश जनरल जैकब के पास बांग्लादेश पहुंचा वो जनरल नियाजी से सरेंडर करदेने की बात करने निकल रहे थे उन्होंने आदेश उनके निकल जाने के बाद पहुंचना दर्ज करने को कहा। मीटिंग में नियाजी ने सीजफायर की मंशा जताई लेकिन वो सरेंडर करने को राजी नहीं था लेकिन जनरल जैकब ने उसे भारत सरकार का आदेश ना बताते हुए 30 मिनट में सरेंडर अथवा बांग्ला मुक्तीवाहिनी सर्पोटेड बाइ इण्डियन आर्मी द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों के उनके परिवार सहित मारे जाने की धमकी दी गई। जनरल जैकब ने बहुत बड़ा रिस्क लिया था क्योंकि उन्होंने मिनट्स अॉफ मीटिंग में यह दर्ज करवा दिया की नियाजी ने इन्सट्रूमेंट अॉफ सरेंडर पर दस्तखत कर दिये जबकी नियाजी की सहमती उसके 40 मिनट बाद पहुंची थी। जिन्हें इंदिरा की भूमिका पर अब भी संदेह हो वो ये बतायें कि इतनी बड़ी जीत, दुश्मन देश के 90000 pow, दुश्मन देश की नेवी को 90%और एयर फोर्स को 60% तबाह कर देने के बाद भी, सोवियत संघ के आपके पक्ष में खड़े होने के बाद भी आप कश्मीर तो क्या 1 रुपए भी पाकिस्तान से नहीं लेतीं बल्कि हारे हुए पाकिस्तान को विजेता बनकर निकल जाने देतीं हैं क्यों?आपको पता है जनरल मानेकशॉ से बीबीसी रिपोर्टर ने एक बार ये पूछा कि अगर आप बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए होते तो क्या होता तो उन्होंने मजाकिया अंदाज में ये कह दिया कि तो 71 में पाकिस्तान जीत जाता। सिर्फ इस बात के लिए सहिष्णु और सैनिकों का सम्मान करने वाली कांग्रेस ने उनकी पेंशन में कटौती कर दी, उनकी सरकारी कार, सरकारी घर और स्पोर्टिंग स्टाफ छीन लिए गए जो उन्हें असहिष्णु एवं राष्ट्रविरोधी बीजेपी के सत्ता में आने और एपीजे के राष्ट्रपति बनने के बाद ही वापस मिलीं। सोचिये सन् 2008 में इतने कद्दावर सैनिक और फील्ड मार्शल की अंत्येष्टि में ना राष्ट्रपति जाता है न प्रधानमंत्री ना रक्षामंत्री ना ही कोई सेना प्रमुख। शर्म आती है इन पर ये कहते हैं कि इन्होंने देश को आजादी दिलाई सच मे?

Wednesday, 20 September 2017

*POWER OF POSITIVE THOUGHT*
*एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है, उसे बहुत ज्यादा आयकर चुकाना पड़ता है आदि - आदि*।
*इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था*।
*एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी*।
*होमवर्क का टाइटल था*
*"वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं"।*
*इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था* •••
● *मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं*।
● *मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं*।
● *मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ*।
● *मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं*।
*बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह अन्तिम पंक्ति। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया*।
●● *मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है*।
●● *मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं*।
●● *मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं*।
●● *मैं बहुत ज्यादा आयकर चुकाता हूँ, इसका मतलब है कि मेरे पास अच्छी नौकरी/व्यापार है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं या पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधाओं से वंचित हैं*।
*हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया ••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।*
_*इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा*।_
*हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्थितियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।*
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*अगर आपको अज्ञात व्यक्ति की लिखी हुई यह बात अच्छी लगे तो इसका अनुकरण करके जिन्दगी को खुशहाल बनाइये*...

दुनिया में 6 तरह की क़ुरान है। इनकी आयतों की संख्या भी अलग-अलग है। आज तक कोई भी नहीं समझ पाया कि कोनसी असली और सही क़ुरान है...
1. कूफी क़ुरान (आयत 6236)
2. बशरी क़ुरान (आयत 6216)
3. शयामी क़ुरान (आयत 6250)
4. मक्की क़ुरान (आयत 6212)
5. ईराकी क़ुरान आयत (6214)
6. साधारण क़ुरान आयत (6666)
ये समझना असम्भव है कि कोनसी क़ुरान सही और असली है, क्योंकि सभी क़ुरान के मानने वाले, एक दूसरे की क़ुरान को गलत बताते हैं।
कुमार अवधेश सिंह