Monday, 21 August 2017

अहंकार का बोझ ))))))))))
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एक बार एक राजा के राज्य में एक पहुंचे हुए महात्मा जी का आगमन हुआ. महात्मा जी की कीर्ति राजा ने सुन रखी थी इसलिए पूरे राजसी अंदाज़ में हीरे-जवाहरात और उत्तम भोग से भरे भेंट के कई थाल लिए हुए वह उनके दर्शन को पहुंचा.
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महात्मा जी उस समय कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे. उन्होंने राजा को संकेत में बैठने का निर्देश दिया. महात्मा जी सबसे विदा लेकर राजा के पास पहुंचे तो राजा ने भेंट के थाल महात्मा जी की ओर बढ़ा दिए.
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महात्मा जी थोड़े से मुस्कुराए. हीरे-जवाहरातों को भरे थालों को उन्होंने छुआ तक नहीं. हां बदले में एक सूखी रोटी अपने पास से निकाली और राजा को देकर कहा- इसे खा लीजिए.
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राजा ने सूखी रोटी देखी तो उसका मन कुछ बिदका पर लगा कि महात्मा का दिया प्रसाद है, खा ही लेना चाहिए. उसने रोटी खाई पर रोटी सख्त थी. राजा से चबायी नहीं गई.
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तब महात्मा जी ने कहा- जैसे आपकी दी हुई वस्तु मेरे काम की नहीं है उसी तरह मेरी दी हुई वस्तु आपके काम की नहीं. हमें वही लेना चाहिए जो हमारे काम का हो. अपने काम का श्रेय भी नहीं लेना चाहिए.
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बिना आवश्यकता लिया किसी से लिया हुआ एक कंकड-पत्थर भी बहुत भारी चट्टान के बोझ जैसा हो जाता है. परमार्थ के लिए लिया गया विपुल धन भी फूलों के हार जैसा है जिसे धारण करना चाहिए.
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मुझे यदि किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता होगी तो मैं स्वयं याचक की तरह आपके पास आउंगा. उस समय मैं आवश्यकता अनुसार दान स्वीकार करूंगा परंतु आज तो यह मेरे लिए बोझ जैसा ही है.
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राजा इन बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ. राजा जब जाने को हुआ तो महात्मा जी उसे दरवाजे तक छोड़ने आए.
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राजा ने पूछा- महात्मन मैं जब आया था तब आपने मेरी ओर देखा तक नहीं था, अब बाहर तक छोड़ने आ रहे हैं. ऐसा परिवर्तन क्यों ?
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महात्मा जी बोले- बेटा जब तुम आए थे तब तुम्हारे साथ अहंकार का बोझ था. अब तो चोला तुमने उतार दिया है तुम इंसान बन गए हो. हम ऐसे सद्गुणों का आदर करते हैं. साधु मान-अपमान से ऊपर होता है. उसे तो सदगुण प्रिय हैं.
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राजा नतमस्तक हो गया. कितनी बड़ी बात कही महात्मा जी ने. हम अनावश्यक जीवन में लोगों के उपकार का बोझ लेते रहते हैं. हम समझते हैं कि यह कोई कार्य थोड़े ही था. यकीन मानिए हर उपकार एक बोझ जैसा ही होता है जिसे कभी न कभी चुकाना ही होगा.
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किसी दीन-दुखी या सचमुच किसी जरूरत मंद को देखें तो आगे बढ़कर सहायता का भाव रखें. संभव है आपको कुछ पुराने अनुभव बुरे रहे हों पर न जाने किस अनुभव के लिए ईश्वर समय आ गए हो परीक्षा के लिए.
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धर्म में आस्था रखें. धर्मकार्यों में आस्था रखें. किसी अन्य धर्म का अनादर करना, उसकी अवहेलना करना धर्म नहीं. सनातन तो जीवन जीने की आदर्श कला है. वसुधैव कुटुंबकम्.
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भगवान श्रीरामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण
अब हम श्री राम से जुडे कुछ अहम् सबूत पेश करने जा रहे हैं........
जिसे पढ़ के नास्तिक भी सोच में पड जायेंगे की रामायण सच्ची हैं या काल्पनिक ||
भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण >>>>
पुराने उपलब्ध प्रमाणों और श्रीराम अवतार जी के शोध और अनुशंधानों के अनुसार कुल १९५ स्थानों पर राम और सीता जी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिन्हें ५ भागों में वर्णित कर रहा हूँ
१.>>>वनवास का प्रथम चरण गंगा का अंचल >>>
सबसे पहले राम जी अयोध्या से चलकर तमसा नदी (गौराघाट,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश) को पार किया जो अयोध्या से २० किमी की दूरी पर है |
आगे बढ़ते हुए राम जी ने गोमती नदी को पर किया और श्रिंगवेरपुर (वर्त्तमान सिंगरोर,जिला इलाहाबाद )पहुंचे ...आगे 2 किलोमीटर पर गंगा जी थीं और यहाँ से सुमंत को राम जी ने वापस कर दिया |
बस यही जगह केवट प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है |
इसके बाद यमुना नदी को संगम के निकट पार कर के राम जी चित्रकूट में प्रवेश करते हैं|
वाल्मीकि आश्रम,मंडव्य आश्रम,भारत कूप आज भी इन प्रसंगों की गाथा का गान कर रहे हैं |
भारत मिलाप के बाद राम जी का चित्रकूट से प्रस्थान ,भारत चरण पादुका लेकर अयोध्या जी वापस |
अगला पड़ाव श्री अत्रि मुनि का आश्रम
२.बनवास का द्वितीय चरण दंडक वन(दंडकारन्य)>>>
घने जंगलों और बरसात वाले जीवन को जीते हुए राम जी सीता और लक्षमण सहित सरभंग और सुतीक्षण मुनि के आश्रमों में पहुचते हैं |
नर्मदा और महानदी के अंचल में उन्होंने अपना ज्यादा जीवन बिताया ,पन्ना ,रायपुर,बस्तर और जगदलपुर में
तमाम जंगलों ,झीलों पहाड़ों और नदियों को पारकर राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम नाशिक पहुँचते हैं |
जहाँ उन्हें अगस्त्य मुनि, अग्निशाला में बनाये हुए अपने अशत्र शस्त्र प्रदान करते हैं |
३.वनवास का तृतीय चरण गोदावरी अंचल >>>
अगस्त्य मुनि से मिलन के पश्चात राम जी पंचवटी (पांच वट वृक्षों से घिरा क्षेत्र ) जो आज भी नाशिक में गोदावरी के तट पर है यहाँ अपना निवास स्थान बनाये |यहीं आपने तड़का ,खर और दूषण का वध किया |
यही वो "जनस्थान" है जो वाल्मीकि रामायण में कहा गया है ...आज भी स्थित है नाशिक में
जहाँ मारीच का वध हुआ वह स्थान मृग व्यघेश्वर और बानेश्वर नाम से आज भी मौजूद है नाशिक में |
इसके बाद ही सीता हरण हुआ ....जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पार हुई जो इगतपुरी तालुका नाशिक के ताकीद गाँव में मौजूद है |दूरी ५६ किमी नाशिक से |
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इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया क्यों की यहीं पर मरणसन्न जटायु ने बताया था की सम्राट दशरथ की मृत्यु हो गई है ...और राम जी ने यहाँ जटायु का अंतिम संस्कार कर के पिता और जटायु का श्राद्ध तर्पण किया था |
यद्यपि भरत ने भी अयोध्या में किया था श्राद्ध ,मानस में प्रसंग है "भरत किन्ही दस्गात्र विधाना "
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४.वनवास का चतुर्थ चरण तुंगभद्रा और कावेरी के अंचल में >>>>
सीता की तलाश में राम लक्षमण जटायु मिलन और कबंध बाहुछेद कर के ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढे ....|
रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी से मुलाकात हुई और नवधा भक्ति से शबरी को मुक्ति मिली |जो आज कल बेलगाँव का सुरेवन का इलाका है और आज भी ये बेर के कटीले वृक्षों के लिए ही प्रसिद्ध है |
चन्दन के जंगलों को पार कर राम जी ऋष्यमूक की ओर बढ़ते हुए हनुमान और सुग्रीव से मिले ,सीता के आभूषण प्राप्त हुए और बाली का वध हुआ ....ये स्थान आज भी कर्णाटक के बेल्लारी के हम्पी में स्थित है |
५.बनवास का पंचम चरण समुद्र का अंचल >>>>
कावेरी नदी के किनारे चलते ,चन्दन के वनों को पार करते कोड्डीकराई पहुचे पर पुनः पुल के निर्माण हेतु रामेश्वर आये जिसके हर प्रमाण छेदुकराई में उपलब्ध है |सागर तट के तीन दिनों तक अन्वेषण और शोध के बाद राम जी ने कोड्डीकराई और छेदुकराई को छोड़ सागर पर पुल निर्माण की सबसे उत्तम स्थिति रामेश्वरम की पाई ....और चौथे दिन इंजिनियर नल और नील ने पुल बंधन का कार्य प्रारम्भ किया |

"उद्धव गीता"
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उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी। उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- "भगवन #महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया! आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा! क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"

श्री कृष्ण बोले- “उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह "भगवद्गीता" थी। आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह "उद्धव-गीता" के रूप में जानी जाएगी। इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है। तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया- "हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"

कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"

उद्धव- "कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया। कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।

किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया? आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं? चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा! आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे! आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे! अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे! इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया! लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं? उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है! एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया? अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा? क्या यही धर्म है?"

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं! उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले- "प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है। उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं। यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"

उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा। जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता? पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार? चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की! और वह यह- उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए! क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं! इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी! इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!

अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही! तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा! उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर- 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम' की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला। जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया। अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"

उद्धव बोले- "कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई! क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?" कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा "इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"

कृष्ण मुस्कुराए- "उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है। न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ। मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ। मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ। यही ईश्वर का धर्म है।"

"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण! तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे? हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे? आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?" उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!

तब कृष्ण बोले "उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो। जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे? तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे। जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है! अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"

भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले - प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है। गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।

सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है। सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे। वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया! यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!

वाह क्या इस्लाम है

अधिकतर मुस्लिम खेती नहीं करते पर कृषि उत्पादों की दलाली करते।
गाय नहीं पालते पर गाय खाने को लार टपकाते हैं।
गंदगी के अम्बार लगाते पर सफाई कर्मचारी नहीं बनते।
चैरिटेबल चिकित्सालय नहीं खोलते पर सरकारी अस्पताल इन्ही की तीमारदारी में लगे रहते हैं।
फौज में भर्ती नहीं होते पर फौजियों पर गोलीबारी और पत्थर बरसाते हैं।
बातें इमान की करते पर अपराधियों में 98% यही मिलते हैं।
राष्ट्र से सुविधा व सुरक्षा चाहते हैं पर राष्ट्र को मानते नहीं हैं।
बात बेबात पर फतवे जारी करते हैं पर कानून तोड़ने में पहले दर्जे की बदमाशी देते हैं।
भाई चारे की बात करते हैं लेकिन सभी आतंकवादी इसी समुदाय से मिलते हैं।
इस्लाम की तारीफ़ में बाते बड़ी बड़ी इस्लाम की और इस्लाम की अमन की करते है और कहते है इस्लाम अमन (शांति) का मजहब है ,और सारी दुनिया में इस्लाम दहशत और आतंकवाद फैलता आया है और फैला रहा है,,, शुरू से ही,
कुर्बानी हलाला तीन तलाक चार चार शादी 10-12 बच्चे जैसी जाहिली का शौक फरमाते हैं लेकिन बात कुराने पाक की करेंगे।
इस्लाम की अमन (पीस) शांति तो मानो ऐसी है कि कहीं से भी कभी भी किसी भी समय बम के या गोली के रूप में बरस जाती है,, और वह शांति अकारण ही निर्दोष लोगो की हत्या कर देती है,,, और यह सब इस्लाम के कट्टरवादी आतंकवादी केवल किसी दलाल के बहकावें में आकर उसके झांसे में जन्नत मिलने की बीमारी और उस जन्नत में 72 हूरे पाने के लिए या दिलाने के लिए करते है,,
वाह क्या इस्लाम है !
हामिद अंसारी किधर है ?
देश में मुसलमान कितने खतरे में हैं इसकी एक और बड़ी मिसाल सामने आई है। उत्तराखंड में मदरसे में पढ़ने वाले करीब 2 लाख मुसलमान लड़के रातों-रात गायब हो गए! दरअसल ये वो छात्र हैं जो हर महीने सरकार से वजीफा यानी स्कॉलरशिप पा रहे थे। लेकिन जैसे ही उत्तराखंड सरकार ने उन्हें अपने बैंक खातों को आधार नंबर से लिंक करने को कहा एक साथ 1 लाख 95 हजार 360 बच्चे गायब हो गए।
अभी तक इन छात्रों को सरकारें हर साल करीब साढ़े 14 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति बांट रही थीं। लेकिन अब ये सिर्फ 2 करोड़ रुपये रह गई है। ये अकेले उत्तराखंड का मामला है। अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि जब उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में मदरसों को अपना रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा तो क्यों इतना हंगामा खड़ा कर दिया गया।
तो इसलिए असुरक्षित हैं मुसलमान?
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बीजेपी की सरकार आने के बाद से मुसलमान खुद को क्यों असुरक्षित महसूस कर रहे हैं इस बात से साबित हो गया है। क्योंकि 2014-15 तक 2 लाख 21 हजार 800 मुसलमान छात्र सरकारी स्कॉलरशिप पा रहे थे। आधार से लिंक होते ही इनकी संख्या गिरकर 26 हजार 440 हो गई है। यानी एक साथ करीब 88 फीसदी मुसलमान छात्रों की संख्या कम हो गई। ये वो स्कॉलरशिप है जो बीपीएल परिवारों के छात्रों को दी जाती है। जिन छात्रों के पास आधार नहीं हैं, उन्हें भी स्कॉलरशिप का फायदा मिल रहा है, लेकिन उन्हें इसके लिए जिलाधिकारी से सत्यापन करवाना जरूरी है। फिलहाल जिला प्रशासन को इस घोटाले के दोषियों की लिस्ट तैयार करने और उन पर कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।
अल्पसंख्यक कोटे के नाम पर धांधली
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यह बात भी सामने आई है कि कई मदरसे और स्कूल सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं और वो फर्जी छात्रों के नाम भेजकर आराम से सरकारी फंड हासिल कर रहे थे। उत्तराखंड के 13 जिलों में से 6 में तो एक भी मुसलमान छात्र स्कॉलरशिप लेने नहीं आया। सबसे ज्यादा धांधली हरिद्वार जिले में पकड़ी गई है। इसके बाद ऊधमसिंहनगर, देहरादून और नैनीताल जिलों के नंबर आते हैं। कुछ जिलों में अब तक जितने अल्पसंख्यक छात्रों को स्कॉलरशिप दी जा रही थी उतनी तो उनकी वहां आबादी भी नहीं है। अब तक कांग्रेस के दौर में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत बिना जांच पड़ताल के ये काम चल रहा था। जाहिर है बीजेपी सरकार आने के बाद इस घोटाले पर नकेल कसनी शुरू कर दी गई।
यूपी में भी इसीलिए है सारी दिक्कत
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यूपी में भी इसी तरह की गड़बड़ियों को देखते हुए मदरसों का रजिस्ट्रेशन जरूरी कर दिया गया है। राज्य में कई मदरसे बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। और इन मदरसों को फंड कहां से मिल रहा है इसकी भी कोई जानकारी नहीं होती। इन मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है, इस पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होताष जबकि ये अपने छात्रों को अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के तहत तमाम फायदे पहुंचाते रहते हैं। यूपी सरकार राज्य में करीब 800 मदरसों पर हर साल 400 करोड़ के करीब खर्च करती है। जब इन मदरसों का रजिस्ट्रेशन होगा तो सही तस्वीर सामने आ पाएगी कि कितना पैसा वाकई गरीब छात्रों के पास पहुंच रहा है और कितना उन लोगों की जेब में जा रहा है, जिन्हें लेकर हामिद अंसारी जैसे लोग परेशान रहते हैं।
इसाई धर्म
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ईसा एक है
बाइबिल एक।
फिर भी, लेटिन कैथलिक, सीरियन कैथलिक, मारथोमा, पेंटेकोस्ट, सैल्वेशन आर्मी, सेवेंथ डे एडवांटिष्ट, ऑर्थोडॉक्स, जेकोबाइट जैसे 146 फिरके आपस में किसी के भी चर्च में नहीं जाते।
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इस्लाम धर्म
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अल्लाह एक,
कुरान एक,
नबी एक।
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फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे। सबकी अलग मस्जिदें। साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ सकते। धर्म के नाम पर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।
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हिन्दू धर्म
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1280 धर्म ग्रन्थ
10 हज़ार से ज्यादा जातियां, अनगिनत पर्व एवं त्योहार,
असंख्य देवी-देवता।
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एक लाख से ज्यादा उपजातियां, हज़ारों ऋषि-मुनि, सैकड़ों भाषाएँ।
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फिर भी सारे हिन्दू सभी मन्दिरों में जाते हैं और सारे त्योहारों को मनाते हुए आपस में शान्ति एवं शालीनता से रहते हैं।
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यह है भव्यता, सुन्दरता और खूबसूरती हिन्दू धर्म की ...... !!
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फिर क्यों न गर्व हो हिन्दुओं को हिन्दू धर्म पर .........
भारत के नाम हैं ये विश्व रिकॉर्ड
दूध के उत्पादन से लेकर रिकॉर्ड गोल्ड मेडल जीतने तक-भारत के नाम हैं कुछ ऐसे रिकॉर्ड जिनमें वह दुनिया में नंबर एक है.
सबसे ज्यादा डाकघर
डेढ़ लाख से अधिक डाकघरों वाले भारत में दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क मौजूद है. आजादी के समय यह संख्या करीब 23,000 थी, जो अब 7 गुना बढ़ गयी है. देश के कुल डाकघरों में से 90 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में हैं.
सबसे बड़ा धार्मिक मेला
कुंभ मेले को दुनिया की सबसे बड़े धार्मिक सभा या मेलों में गिना जाता है. हर 12 साल में होने वाले इस मेले में दुनिया भर से करोड़ों लोग पहुंचते हैं. 2013 में हुए कुंभ मेले में 3 करोड़ से भी ज्यादा लोग पहुंचे थे.
हर मैच में मिला गोल्ड
भारत की कबड्डी टीम ने आज तक खेले अपने सारे एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता है. कबड्डी साल 1990 में एशियन गेम्स का हिस्सा बना था.
सबसे ज्यादा बारिश भी यहीं
भारत के मेघालय में हर साल औसतन 467 इंच बारिश का रिकॉर्ड है. पूर्वोत्तर राज्य मेघालय को 'लैंड ऑफ क्लाउड्स' भी कहा जाता है.
क्रिकेट का सबसे ऊंचा मैदान
दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान भारत के हिमाचल प्रदेश में स्थित है. धर्मशाला के इस मैदान की ऊंचाई समुद्र तल से 2,144 मीटर (करीब 7000 फीट) है.
सबसे अधिक दूध उत्पादन
दुनिया भर में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन करने वाला देश भी भारत ही है. साल 2015-16 में देश में औसतन 155.5 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ.
कुछ और बातें बिल्व वृक्ष की----
1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते ।
2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है ।
3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है ।
4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।
5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।
6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।
7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।
8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे ।
10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है ।
11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।
कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं

श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते


सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था। अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।
मेघनाद का वध
रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोर्इ संदह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
कटी भुजा द्वारा सुलोचना को प्रमाण
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुर्इ उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृतान्त लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्रीराम के भार्इ लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कर्इ वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
सुलोचना की रावण से प्रार्थना
पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुर्इ सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे।[1] सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।' किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
पति के शीश की प्राप्ति
सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आर्इ हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सुग्रीव की जिज्ञासा
सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुर्इ कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुर्इ मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।
महान पतिव्रता स्त्री
श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुर्इ थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गर्इ। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।
अरून शुक्ला

भारत के कितनी बार "कोंग्रेस " ने टुकडे किये


 पिछले 100 वर्षों में भारत के कितनी बार "कोंग्रेस " ने टुकडे किये गए और उसके पीछे किसकी सरकार और सोच रही है ....
1.सन 1911 में भारत से श्री लंका अलग हुआ,जिसको तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था,,
2.सन 1947 में भारत से बर्मा -म्यांमार अलग हुआ ,कारण कांग्रेस ही थी,,
3,सन 1947 में भारत से पाकिस्तान अलग हुआ । कारण कांग्रेस ही थी,,
4.सन 1948 में भारत से आज़ाद कश्मीर काटकर अलग कर दिया गया और नेहरु जी की नीतियों ने सरदार पटेल के हाथ बांधे रखे थे |
5.सन 1950 में भारत से तिब्बत को काटकर अलग कर दिया गया और नेताओं ने मुह बंद रखा |
6. सन 1954 में बेरुबादी को काट कर अलग कर दिया गया |कारण कांग्रेस ही थी,,
7.सन 1957 में चीन ने भारत के कुछ हिस्से हड़प लिए और नेहरु ने कहा की यह घास फूंस वाली जगह थी |
8.सन 1962 में चीन ने अक्साई चीन का 62000 वर्ग मिल क्षेत्र भारत से छीन लिया ,और नेहरु जी हिंदी चीनी भाई-भाई कहते रहे ।
9.सन 1963 में टेबल आइलैंड पर बर्मा ने कब्ज़ा कर लिया ,और कांग्रेशी खामोश रहे । वहां पर म्यामांर ने हवाई अड्डा बना रखा है |
10.सन 1963 में ही गुजरात का कच्छ क्षेत्र छारी फुलाई को पाकिस्तान को दे दिया गया |
11. सन 1972 में भारत ने कच्छ तिम्बु द्वीप सर लंका को दे दिया |
12. सन 1982 में भारत के अरुणांचल के कुछ हिस्से पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया , और हम बात करते रहे |
13. सन 1992 में भारत का तीन बीघा जमीनी इलाका बांगला देश ने लेकर चीन को सौंप दिया ।
14. सन 2012 मे भी बांग्लादेश को कुछ वर्गमील इलाका कॉंग्रेस ने दिया और कहा की ये दलदली इलाका था
अरून शुक्ला
मोदी सरकार में अब तक जितने भी ट्रेन हादसे हुए सब के सब मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए हुए हैं, इससे पहले दो हादसों में पाकिस्तान की ISI का हाथ था, ये लोग ट्रेन हादसे करवाकर मोदी सरकार को कमजोर कर रहे हैं और विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दे दे रहे हैं क्योंकि ट्रेन हादसे के तुरंत बाद कांग्रेस का बयान आता है कि मोदी सरकार में ट्रेन हादसे बढ़ गए हैं.

 टेक्नोलॉजी का ज़माना है, ड्राईवर और गार्ड को पहले से ही बताया जाता है कि पटरी पर मरम्मत का काम चल रहा था लेकिन ना तो ड्राईवर को और ना ही गार्ड को इस बात की जानकारी दी गयी, यही नहीं स्टेशन मास्टर को भी पटरी पर मरम्मत कार्य के बारे में कोई सूचना नहीं दी गयी थी. यह सब सबूत चीख चीख कर कह रहे हैं कि ट्रेन अपने आप नहीं पलटी बल्कि इसे पलटवाया गया था, यह लापरवाही नहीं थी बल्कि एक सोची समझी साजिश के तहत इसे अंजाम दिया गया है और इसका मकसद था मोदी सरकार को बदनाम करना. 
 इन लोगों ने पूरी पटरी उखाड़ रखी थी, अगर ड्राईवर इमरजेंसी ब्रेक ना लगाया तो आगे जाकर पूरी ट्रेन पलट जाती, हादसे के वक्त ट्रेन की स्पीड 105 किलोमीटर थी. इतनी स्पीड में अगर ट्रेन पलट जाती तो लगभग सभी लोगों की मौत हो जाती, उसके बाद देश में हाहाकार मच जाता, विरोधी लोग विपक्ष के लोग इसे मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दा बना लेते और उसके बाद क्या होता आप इसका खुद अंदाजा लगा सकते हैं लेकिन ड्राईवर की वजह से लोगों की जान बच गयी यही नहीं मोदी सरकार पर भी एक बड़ा दाग लगने से बच गया.

ट्रेन को रोकने के लिए ड्राईवर ने तीन बार इमरजेंसी ब्रेक लगाई, मतलब उसनें यहाँ भी सूझ बूझ दिखाई, अगर एक बार ही तेजी से ब्रेक दबा दिया जाता तो ट्रेन तुरंत पलट जाती लेकिन ड्राईवर से चालाकी से पहले हलकी ब्रेक लगाई, उसके बाद दूसरी बार ब्रेक लगाई और तीसरी बार पूरा ही ब्रेक दबा दिया. ड्राईवर की चालाकी की वजह से ट्रेन को कम नुकसान हुआ.

अब यहाँ पर सवाल ये है कि वे कौन लोग थे जो स्टेशन मास्टर की बिना इजाजत लिए ही पटरी की मरम्मत का कार्य कर रहे थे, वे लोग अपने आप से मरम्मत कार्य क्यों कर रहे थे, क्या उन्हें किसी तीसरी पार्टी ने ऐसा करने को बोला था. हादसे के बाद वे लोग कहाँ भाग गए, उन लोगों ने कुछ दूर पहले ही लाल झंडा दिखाकर ट्रेन को क्यों नहीं रोका. ये सभी चीजें साबित करती हैं कि यह हादसा लापरवाही से नहीं बल्कि जान बूझकर कराया गया और इसका मकसद सिर्फ मोदी सरकार को बदनाम करना था. इसकी CBI जांच होनी चाहिए.

एक चीज और, इन घटनाओं के लिए चीन भी जिम्मेदार हो सकता है और पाकिस्तान भी क्योंकि डोकलाम विवाद पर चीन ने मोदी सरकार को अंजाम भुगतने की धमकी दी है, कांग्रेस के नेता चोरी छिपे मुलाकात कर रहे हैं और ऐसे हादसों की वजह से कांग्रेस और विपक्षी दलों को ही फायदा हो रहा है क्योंकि इन्हें मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दा मिल रहा है, चीन इस वक्त भारत से युद्ध करने में डर रहा है इसलिए वह मोदी सरकार को हटाकर कांग्रेस को लाना चाहता है ताकि तिब्बत की तरह उसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और भूटान भी मिल जाए.

"इतिहास की अनकही सत्य कहानियां" का एक अंश



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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘यह पाकिस्तान जाने की जिद किए हुए हैं, हम चाहते हैं कि भारत में ही रहें |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘तो जाने क्यों नहीं देते, फिर पाकिस्तान बनवाया ही किसलिए |’’
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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन इनके साथ पांच लाख मुस्लिम और पाकिस्तान चले जाएंगे |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘तो जाने दीजिए |’’
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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘लेकिन दिल्ली तो खाली हो जाएगी।
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘जो लाहौर से हिन्दू आएंगे उनसे भर जाएगी |’’
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जवाहर लाल नेहरू :- '‘नहीं उन्हें मुस्लिमों के घर हम नहीं देंगे, वक्फ बोर्ड को सौंप देंगे |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘और लाहौर में जो अभी से मंदिर और डीएवी स्कूल पर कब्जा कर उनके नाम इस्लामिक रख दिए हैं।
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जवाहर लाल नेहरू :- ‘'पाकिस्तान से हमे क्या लेना-देना, हम तो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘लेकिन देश का बंटवारा तो धर्म के आधार पर हुआ है| अब यह हिन्दुस्तान हिन्दुओं का है |’’
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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘नहीं यह देश कांग्रेस का है. . कांग्रेस जैसा चाहेगी वैसा होगा |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘इतिहास बदलता रहता है, अंग्रेज भी जा रहे हैं फिर कांग्रेस की हस्ती ही क्या है ? मुस्लिम साढे सात सौ साल में गए, अंग्रेज 200 साल में गए और कांग्रेस 60-70 साल में चली जाएगी और लोग भूल जाएंगे |'’
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जवाहर लाल नेहरू :- ‘‘ऐसा कभी नहीं होगा |’’
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सरदार वल्लभ भाई पटेल :- ‘‘जरूर होगा, आप मुगल सोच त्याग दें |’’ कहकर पटेल ने रिक्शा चालक से कहा, ‘आप तेज चलिए, हम भी किस मूर्ख से जबान लडा बैठे !’
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"इतिहास की अनकही सत्य कहानियां" का एक अंश (एक रिक्शाचालक, धर्मसिंह तोमर की डायरी के आधार पर)
कुमार अवधेश सिंह


अब मुस्लिम क्यों वंदेमातरम् का विरोध करने लगे ?
उसका एकमात्र जबाब है मुस्लिमो की जनसंख्या ..
आजादी के बाद और गुलाम भारत में भी मुस्लिमो को कभी वंदेमातरम् बोलने से परहेज नही रहा .. मुस्लिमो ने कभी वंदेमातरम् का विरोध नही किया था ..किसी भी देश में जब मुस्लिम कम संख्या में रहते है तब वो उस देश के नियम कानून, दुसरे धर्मो के लोगो, राष्ट्रगीत आदि का सम्मान करते है ..फिर धीरे धीरे जैसे इनकी जनसंख्या बढती है ये इस्लाम का हवाला देकर अपने लिए अलग नियम जैसे हलाल खाना , मस्जिद आदि की मांग करते है ..
आपको जानकर ये आश्चर्य होगा की आजादी के बाद सरदार पटेल ने अयोध्या, मथुरा, काशी विश्नाथ और सोमनाथ मन्दिरों को तोडकर बने मस्जिदों को तोडकर पुनः भव्य मन्दिर का निर्माण करना चाहते थे .. उन्होंने शुरुआत सोमनाथ से की ..क्योकि सरदार पटेल गुजरात के रहने वाले थे ... महमुद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर को तोडकर मस्जिद बनाया था .. उस मस्जिद को तोडकर उसे समुद्र में बहा दिया गया ..
सरदार पटेल घोर हिन्दूवादी थे .. उन्होंने सरकारी खर्च से सोमनाथ मन्दिर बनाया और भारत के राष्ट्रपति से उसका उद्घाटन करवाया .. लेकिन जैसे ही नेहरु को पता चला की डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सोमनाथ मन्दिर का उद्घाटन करने जा रहे है ..नेहरु नाराज हुआ तो डा. राजेन्द्र प्रसाद खुद के पैसे से टिकट खरीदकर दिल्ली से बड़ोदरा और फिर बड़ोदरा से सोमनाथ एक निजी व्यक्ति के कार से गये थे और सोमनाथ मन्दिर का उद्घाटन किया .. सरदार पटेल की इच्छा थी अयोध्या और मथुरा मामले को भी उसी समय हल कर दिया जाये ... लेकिन नीच नेहरु ने ये नही होने दिया था
Jitendra Pratap Singh
19 hrs

कैसे समाई मीरा द्वारिकाधीश की मूर्ति में?


कैसे समाई मीरा द्वारिकाधीश की मूर्ति में?
मीराबाई भक्तिकाल की एक ऐसी संत हैं, जिनका सब कुछ कृष्ण के लिए समर्पित था। यहां तक कि कृष्ण को ही वह अपना पति मान बैठी थीं। भक्ति की ऐसी चरम अवस्था कम ही देखने को मिलती है। आइए जानें मीराबाई के जीवन की कुछ रोचक बातें:
मीराबाई के बालमन में कृष्ण की ऐसी छवि बसी थी कि किशोरावस्था से लेकर मृत्यु तक उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना। जोधपुर के राठौड़ रतनसिंह जी की इकलौती पुत्री मीराबाई का जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ था। बचपन से ही वह कृष्ण-भक्ति में रम गई थीं।
मीराबाई के बचपन में हुई एक घटना की वजह से उनका कृष्ण-प्रेम अपनी चरम अवस्था तक पहुंचा। एक दिन उनके पड़ोस में किसी बड़े आदमी के यहां बारात आई। सभी औरतें छत पर खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीरा भी बारात देखने लगीं। बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है? इस पर उनकी माता ने कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर के कह दिया कि यही तुम्हारे दूल्हा हैं। बस यह बात मीरा के बालमन में एक गांठ की तरह बंध गई।
बाद में मीराबाई की शादी महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज, जो आगे चलकर महाराणा कुंभा कहलाए, से कर दी गई।
इस शादी के लिए पहले तो मीराबाई ने मना कर दिया, लेकिन जोर देने पर वह फूट-फूट कर रोने लगीं। शादी के बाद विदाई के समय वे कृष्ण की वही मूर्ति अपने साथ ले गईं, जिसे उनकी माता ने उनका दूल्हा बताया था।
ससुराल में अपने घरेलू कामकाज निबटाने के बाद मीरा रोज कृष्ण के मंदिर चली जातीं और कृष्ण की पूजा करतीं, उनकी मूर्ति के सामने गातीं और नृत्य करतीं। उनके ससुराल वाले तुलजा भवानी यानी दुर्गा को कुल-देवी मानते थे। जब मीरा ने कुल-देवी की पूजा करने से इनकार कर दिया तो परिवार वालों ने उनकी श्रद्धा-भक्ति को मंजूरी नहीं दी।
मीराबाई की ननद उदाबाई ने उन्हें बदनाम करने के लिए उनके खिलाफ एक साजिश रची। उसने राणा से कहा कि मीरा का किसी के साथ गुप्त प्रेम है और उसने मीरा को मंदिर में अपने प्रेमी से बात करते देखा है।
देखा कि मीरा अकेले ही कृष्ण की मूर्ति के सामने परम आनंद की अवस्था में बैठी मूर्ति से बातें कर रही थीं और मस्ती में गा रही थीं। राणा मीरा पर चिल्लाया – ’मीरा, तुम जिस प्रेमी से अभी बातें कर रही हो, उसे मेरे सामने लाओ।’ मीरा ने जवाब दिया – ‘वह सामने बैठा है – मेरा स्वामी – नैनचोर, जिसने मेरा दिल चुराया है, और वह समाधि में चली गईं। इस घटना से राणा कुंभा का दिल टूट गया, लेकिन फिर भी उसने एक अच्छे पति की भूमिका निभाई और मरते दम तक मीरा का साथ दिया।
हालांकि मीरा को राजगद्दी की कोई चाह नहीं थी, फिर भी राणा के संबंधी मीरा को कई तरीकों से सताने लगे। कृष्ण के प्रति मीरा का प्रेम शुरुआत में बेहद निजी था, लेकिन बाद में कभी-कभी मीरा के मन में प्रेमानंद इतना उमड़ पड़ता था कि वह आम लोगों के सामने और धार्मिक उत्सवों में नाचने-गाने लगती थीं।
वे रात में चुपचाप चित्तौड़ के किले से निकल जाती थीं और नगर में चल रहे सत्संग में हिस्सा लेती थीं। मीरा का देवर विक्रमादित्य, जो चित्तौड़गढ़ का नया राजा बना, बहुत कठोर था। मीरा की भक्ति, उनका आम लोगों के साथ घुलना-मिलना और नारी-मर्यादा के प्रति उनकी लापरवाही का उसने कड़ा विरोध किया। उसने मीरा को मारने की कई बार कोशिश की।
यहां तक कि एक बार उसने मीरा के पास फूलों की टोकरी में एक जहरीला सांप रखकर भेजा और मीरा को संदेश भिजवाया कि टोकरी में फूलों के हार हैं। ध्यान से उठने के बाद जब मीरा ने टोकरी खोली तो उसमें से फूलों के हार के साथ कृष्ण की एक सुंदर मूर्ति निकली। राणा का तैयार किया हुआ कांटो का बिस्तर भी मीरा के लिए फूलों का सेज बन गया जब मीरा उस पर सोने चलीं।
जब यातनाएं बरदाश्त से बाहर हो गईं, तो उन्होंने चित्तौड़ छोड़ दिया। वे पहले मेड़ता गईं, लेकिन जब उन्हें वहां भी संतोश नहीं मिला तो कुछ समय के बाद उन्होने कृश्ण-भक्ति के केंद्र वृंदावन का रुख कर लिया। मीरा मानती थीं कि वह गोपी ललिता ही हैं, जिन्होने फिर से जन्म लिया है। ललिता कृष्ण के प्रेम में दीवानी थीं।
खैर, मीरा ने अपनी तीर्थयात्रा जारी रखी, वे एक गांव से दूसरे गांव नाचती-गाती पूरे उत्तर भारत में घूमती रहीं। माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम कुछ साल गुजरात के द्वारका में गुजारे। ऐसा कहा जाता है कि दर्शकों की पूरी भीड़ के सामने मीरा द्वारकाधीश की मूर्ति में समा गईं।
“इंसान आमतौर पर शरीर, मन और बहुत सारी भावनाओं से बना है। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने शरीर, मन और भावनाओं को समर्पित किए बिना किसी चीज के प्रति खुद को समर्पित नहीं कर सकते। विवाह का मतलब यही है कि आप एक इंसान के लिए अपनी हर चीज समर्पित कर दें, अपना शरीर, अपना मन और अपनी भावनाएं। आज भी कई इसाई संप्रदायों में नन बनने की दीक्षा पाने के लिए, लड़कियां पहले जीसस के साथ विवाह करती हैं।
कुछ लोगों के लिए यह समर्पण, शरीर, मन और भावनाओं के परे, एक ऐसे धरातल पर पहुंच गया, जो बिलकुल अलग था, जहां यह उनके लिए परम सत्य बन गया था। ऐसे लोगों में से एक मीराबाई थीं, जो कृष्ण को अपना पति मानती थीं।
जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव-संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि ‘वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल।
आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा कोई और पुरुष भी है।’ इस जबाब से जीव गोसाईं बहुत शर्मिंदा हुए। वह फौरन मीरा से मिलने गए और उन्हें भरपूर सम्मान दिया।
मीरा ने गुरु के बारे में कहा है कि बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं होती। भक्तिपूर्ण इंसान ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है। वही सच्चा गुरु है। स्वयं मीरा के पद से पता चलता है कि उनके गुरु रैदास थे।
नहिं मैं पीहर सासरे, नहिं पियाजी री साथ
मीरा ने गोबिन्द मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास
मीरा ने अनेक पदों व गीतों की रचना की। उनके पदों में उच्च आध्यात्मिक अनुभव हैं। उनमें दिए गए संदेश और अन्य संतों की शिक्षाओं में समानता नजर आती है। उनके पद उनकी आध्यात्मिक उंचाई के अनुभवों का आईना है।
मीरा ने अन्य संतों की तरह कई भाषाओं का प्रयोग किया है, जैसे – हिंदी, गुजराती, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी, फारसी, मारवाड़ी, संस्कृत, मैथिली और पंजाबी।
मीरा के पदों में भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति के साथ-साथ प्रेम की ओजस्वी प्रवाह-धारा और प्रीतम से वियोग की पीड़ा का मर्मभेदी वर्णन मिलता है। प्रेम की साक्षात् मूर्ति मीरा के बराबर शायद ही कोई कवि हो।
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।
छांड़ि दई कुल की कानि कहा करै कोई।
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
दधि मथि घृत काढ़ि लियौ डारि दई छोई।
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोई।
पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।
जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।
सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
कुमार अवधेश सिंह

बातआर्य भट्ट के शून्य की


सोसल मीडिया में एक पोस्ट चल रहा है कि यदि आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार किया था,तो रावण के दस सिरों की गणना कैसे हुई थी?महाभारत काल मे कौरवों के 100 भाइयों की गणना कैसे हुई थी?ऐसा कहने वालों का मत है कि जब 05 वीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार किया तो,रामायण,महाभारत,इसके बाद ही लिखी गयी है और यदि इसके सैकड़ों साल पहले अगर लिखी गयी है तो सिद्ध किया जाय कि आर्य भट्ट ने शून्य का आविष्कार नहीं किया था।अब एक वाणिज्य के प्रोफेसर श्री अनिल कुमार यादव ने भी यह प्रश्न किया है जिसे हमारे एक भूतपूर्व छात्र,श्री मनोज द्विवेदी ने हमें भेजा है।
दर असल सोसल मीडिया में लोग
ज्ञान वर्धन नहीं करते,मनोरंजन करते हैं और हिन्दू धर्म को हेय दिखाने की कोशिश करते हैं।आरक्षण से नौकरी प्राप्त लोगों ने ये विवाद जन्म दिया है।
मुख्य विवाद शून्य और दस की संख्या का है।विश्व मे कहीं भी पहले मन मे भाव आये।भाव से शब्द बने।अंक तो गणना के लिए बाद में प्रतीकों के रूप में आये।जिस समय जितनी समझ थी,उसी प्रकार प्रतीक बनाकर,उसे ही अंक मानकर गणना किया गया।
भारत मे संस्कृत ज्ञात सबसे प्राचीन भाषा है।संस्कृत में गणना के मूल शब्द शुन्यम,एकः एका एकम,द्वौ दवे,त्रयः त्रीणि ,चत्वारः,
पंच, षष्ठ,सप्त,अष्ट,नव,दस,शत, ये सब प्रारम्भ से रहे हैं।ऋग्वेद में पुरुष सूक्त में सहस्र सिर,सहस्र आंख,सहस्र पैर,दस अंगुल शब्द लिखे हैं।यजुर्वेद से निकले ईश उपनिषद में सौ वर्ष जीने की बात लिखी है।अथर्व वेद में सौ शरद जीना लिखा है।पाणिनि ने अष्टअध्यायी में अंकों के शब्द रूपों का सूत्र भी लिखा है।ये सब आर्यभट्ट से बहुत पहले हुए हैं।इसका मतलब भारत मे गणना के अंक शब्दों में थे।बाद में अलग अलग समय पर इन शब्दों के लिए प्रतीकों से गणना किया गया।तो जब शब्द थे,तो रावण के दस सिर व कौरव के सौ पुत्र निश्चित रूप से गिने गए होंगे और रामायण महाभारत आर्य भट्ट से बहुत पहले लिखा गया होगा।हाँ उस समय शून्य अंक नहीं रहा होगा।
यह शून्य आर्य भट्ट से पहले ही था।शून्य दार्शनिक विचारों में हर समय रहा है।शून्य का मतलब ब्रह्म होता है।आर्य भट्ट से पहले नागार्जुन का शून्यवाद आ गया था।आर्य भट्ट ने शून्य का आविष्कार नहीं,शून्य पर आधारित दाशमिक प्रणाली दिया था।एक बात और जान लेना चाहिए कि पाश्चात्य चिंतन के दर्शन में पृथ्वी जल अग्नि वायु,ये चार ही मूल तत्व है।यही चार्वाक दर्शन में भी है।लेकिन भारतीय वैदिक दर्शन में इनके अलावा पांचवा तत्व आकाश है।यही शून्य है,मतलब नथिंग।कुछ भी नहीं।शून्य को आत्मसात करने के लिए हमें ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में जाना होगा।जब कुछ भी नहीं था तो क्या था-
नासदीय सूक्त,ऋग्वेद,दसम मण्डल,सूक्त संख्या 129
नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।
किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥१॥
अन्वय- तदानीम् असत् न आसीत् सत् नो आसीत्; रजः न आसीत्; व्योम नोयत् परः अवरीवः, कुह कस्य शर्मन् गहनं गभीरम्।
अर्थ- उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे।
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥२॥
अन्वय-तर्हि मृत्युः नासीत् न अमृतम्, रात्र्याः अह्नः प्रकेतः नासीत् तत् अनीत अवातम, स्वधया एकम् ह तस्मात् अन्यत् किञ्चन न आस न परः।
'अर्थ – उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत = मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥३॥
अन्वय -अग्रे तमसा गूढम् तमः आसीत्, अप्रकेतम् इदम् सर्वम् सलिलम्, आःयत्आभु तुच्छेन अपिहितम आसीत् तत् एकम् तपस महिना अजायत।
सृष्टिके उत्पन्नहोनेसे पहले अर्थात् प्रलय अवस्था में यह जगत् अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था,अज्ञात यह सम्पूर्ण जगत् सलिल=जल रूप में था। अर्थात् उस समय कार्य और कारण दोंनों मिले हुए थे यह जगत् है वह व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥४॥
अन्वय-अग्रे तत् कामः समवर्तत;यत्मनसःअधिप्रथमं रेतःआसीत्, सतः बन्धुं कवयःमनीषाहृदि प्रतीष्या असति निरविन्दन
अर्थ – सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम=अर्थात् सृष्टि रचना करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न हुयी, जो परमेश्वर के मन मे सबसे पहला बीज रूप कारण हुआ; भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को क्रान्तदर्शी ऋषियो ने अपने ज्ञान द्वारा भाव से विलक्षण अभाव मे खोज डाला।
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥५॥
अन्वय-एषाम् रश्मिःविततः तिरश्चीन अधःस्वित् आसीत्, उपरिस्वित् आसीत्रेतोधाः आसन् महिमानःआसन् स्वधाअवस्तात प्रयति पुरस्तात्।
पूर्वोक्त मन्त्रों में नासदासीत् कामस्तदग्रे मनसारेतः में अविद्या, काम-सङ्कल्प और सृष्टि बीज-कारण को सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता उनमें विद्यमान थी। यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में? क्या वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर विद्यमान था? वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था इस प्रकार इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान रूप में प्रकृति रूप थे; स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण होते हैं।
को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥६॥
अन्वय-कः अद्धा वेद कः इह प्रवोचत् इयं विसृष्टिः कुतः कुतः आजाता, देवा अस्य विसर्जन अर्वाक् अथ कः वेद यतः आ बभूव।
अर्थ - कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥७॥
अन्वय- इयं विसृष्टिः यतः आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। अस्य यः अध्यक्ष परमे व्यामन् अंग सा वेद यदि न वेद।
अर्थ – यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्या कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।
तो जो यह  की बातआर्य भट्ट के शून्य है,यह भारतीय शून्य का व्यावहारिक प्रयोग है।मतलब एक शक्ति भारत मे थी,जो दाहिनी ओर आ जाये तो शक्ति दस गुनी हो जाएगी,बाई ओर चली जाय तो निशक्त की स्थिति।इसी ब्रह्म रूप को गोलाकार शून्य प्रतीक में लाया गया और इस प्रकार भारतीय आर्यभट्ट नामक ब्राह्मण ने विश्व व्याप्त विभिन्न गणना के प्रतीकों को समाप्त कर एक कार दिया।
वेदान्त ने बताया दिया कि सबमे आत्मान एक ही है।
अगर हम शब्दों की बात करें,तो आर्य भट्ट से बहुत पहले कपिल मुनि ने सांख्य में 25 तत्व बता दिया था।इसका मतलब अंकों का शब्द ज्ञान यहां शुरू से ही था।तो किसी के सरों की गणना, व्यक्तियों की गणना क्यों नहीं हो सकती थी।
अब कुछ उदारण प्रस्तुत करते हैं-
पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।
(अथर्ववेद, काण्ड १९, सूक्त ६७)
जिसके अर्थ समझना कदाचित् पर्याप्त सरल है – हम सौ शरदों तक देखें, यानी सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे (१)। सौ वर्षों तक हम जीवित रहें (२); सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, हम ज्ञानवान् बने रहे (३); सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें, हमारी उन्नति होती रहे (४); सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें पोषण मिलता रहे (५); हम सौ वर्षों तक बने रहें (वस्तुतः दूसरे मंत्र की पुनरावृत्ति!) (६); सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें (७); सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें (८)।
ईश उपनिषद यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का उपनिषद है,जो उपनिषदों में प्रथम स्थान रखता है।इसमें दूसरे श्लोक में लिखा है-
यहाँ इस जगत् में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत्ँ समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥[
ऋग्वेद,दशम मण्डल,नब्बेवा सूक्त।पुरुष सूक्त,पहला मंत्र।
सहस्त्रशीर्षा पुरुष:सहस्राक्ष:सहस्रपात् |
स भूमि सर्वत: स्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ||१||
जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्मांड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ||१||
मुहूर्त चिंतामणि में ही एक जगह नक्षत्रों में ताराओं की संख्या बताते हुए एक श्लोक है (नक्षत्र प्रकरण, श्लोक-58)
त्रित्र्यङ्गपञ्चाग्निकुवेदवह्नयः शरेषुनेत्राश्विशरेन्दुभूकृताः |
वेदाग्निरुद्राश्वियमाग्निवह्नयोSब्धयः शतंद्विरदाः भतारकाः ||
अन्वय - त्रि (3) + त्रय(3) + अङ्ग(6) + पञ्च(5) +अग्नि(3) + कु(1) + वेद(4) + वह्नय(3); शर(5) + ईषु(5) + नेत्र(2) + अश्वि(2) + शर(5) + इन्दु(1) + भू(1) + कृताः(4) | वेद(4) + अग्नि(3) + रुद्र(11) + अश्वि(2) + यम(2) + अग्नि(3) + वह्नि(3); अब्धयः(4) + शतं(100) + द्वि(2) + द्वि(2) + रदाः(32) + भ + तारकाः ||
यहाँ थोड़ी संस्कृत बता दूं भतारकाः का अर्थ है भ (नक्षत्रों) के तारे | तो यदि नक्षत्रों में तारे अश्विनी नक्षत्र से गिनें तो इतने तारे प्रत्येक नक्षत्र में होते हैं |
सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेत्ता आर्यभट्ट ने आर्यभटीय ([ सङ्ख्यास्थाननिरूपणम् ]) में कहा है-
एकं च दश च शतं च सहस्रं तु अयुतनियुते तथा प्रयुतम् ।
कोट्यर्बुदं च वृन्दं स्थानात्स्थानं दशगुणं स्यात् ॥ २ ॥
अर्थात् "एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद तथा बृन्द में प्रत्येक पिछले स्थान वाले से अगले स्थान वाला दस गुना है।
उक्त से स्पष्ट हो जाता है कि जो विवाद उछाला गया है,वह मूर्खों के प्रलाप के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
इन मूर्खों के विषय मे पहले ही भर्तृ हरि ने लिख दिया है कि इन्हें ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते।
कुमार अवधेश सिंह

Sunday, 20 August 2017

vyang

महिलाओं के लिए 2016 / 2017 वर्ष कैसा गया ? और कैसा बीत रहा है..
* जय ललिता की ज़िंदगी गई !
*मायावती की माया गई !
*सुषमा स्वराज की किडनी गईं ! 
* ममता की मानसिकता गईं !
* आनंदीबेन की सत्ता गईं !
*शशिकला जेल गई *
और बाक़ी सभी महिलाओं की आजीवन पतियों से बचाई हुईं नोटो की ग़ड्डीया गईं !
 और अब बाकी औरतो में से कुछ की चोटी भी गई

Saturday, 19 August 2017

हिन्दुस्तान के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में बैठे हराम खोरो की हकीकत 
और भारत में अवैध रूप से बसाए गए रोहिंगिया मुसलमानों का सच .............!!!
वर्ष 2012 की बात है है ...म्यांमार में अवैध रूप से रह रहे रोहिंगिया मुसलमानों ने म्यांमार में बड़े पैमाने पर दंगे किये थे ...जिसके बाद पहले तो म्यांमार की  बौध जनता ने इन दंगो को खूब झेला ..बहुत से बौध मारे गए , उनकी संपत्तियों को बड़े पैमाने पर जलाया गया ...और उसके बाद फिर जब म्यांमार की जनता ने इन हिंसक रोहिंगिया मुसलमानों को प्रतिक्रिया में पेलना शुरू किया तो ये अपना झोला झंडा उठा के भागने लगे थे .उस समय भारत में मनमोहन सरकार का राज था .. तथा कश्मीर में कांग्रेस की भागीदारी वाली सरकार ..ऐसे माहौल में कांग्रेस और ओबैसी के इस्लामी गिरोह ने हजारो की संख्या में म्यांमार से भाग रहे रोहिंगिया मुसलमानों को भारत में अवैध रूप से बसाना शुरू किया ... जिस कश्मीर में भारत की जनता को बसने का अधिकार नहीं है ...उसी कश्मीर में भी बड़े पैमाने पर इन हिंसक रोहिंगिया मुसलमानों को बसाया गया था अब आते है असल मुद्दे पर ......
रोहिंगिया मुस्लिम म्यांमार के मूल वाशिंदे नहीं है ...ये लोग म्यांमार में अवैध रूप से घुस के अपनी कालोनिया बसाने लगे ..... शांतिप्रिय बौध जनता ने इस पर कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं की ..इसके कारण इनके डीएनए में शामिल हिंसा और अपराध की मानसिकता ने अपना असली रूप दिखाना शुरू किया .फिर इन रोहिंगियाओं की शैतानियत म्यांमार में उत्तरोत्तर बढती रही ....लोकल बौध आवादी पर अपनी हिंसक इस्लामी आक्रामकता के जरिये हावी होना , चोरी बलात्कार , लूटपाट तथा अन्य अपराध करना इनका स्वभाव था ...फिर एक दिन घटी घटना ने म्यांमार की जनता को प्रतिक्रिया देने को मजबूर कर दिया था ...
              हुआ यूँ की म्यांमार में एक बौध लड़की के साथ बलात्कार हुआ और उसके बाद उसके जिस्म के कई टुकड़े कर दिए गए .फिर यह मामला अदालत में गया और उसके बाद इस घटना के अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई गयी ..फांसी की सजा का एलान होते ही म्यांमार के इन रोहिंगिया मुसलमानों ने म्यांमार को इस्लामी दंगो की आग में झोक दिया था ....
एक सीमा तक सहन करने के बाद जब म्यांमार की जनता ने इन रोहिंगिया मुसलमानों को पेलना शुरू किया तो ये भाग कर किसी अन्य इस्लामी मुल्क में अपने हम मजहब भाईओ के पास नहीं गए बल्कि हिन्दुस्तान में भाग कर आये थे ये मुद्दा यही पर ख़तम नहीं होता .....
उसी दौर में जब म्यांमार की जनता ने लुटने पिटने तथ आगजनी बलात्कार आदि झेलने के बाद इन रोहिंगिया मुसलमानों के खिलाफ मज़बूरी में प्रतिक्रिया की थी तो .यहाँ भारत में मुसलमानों ने देश भर में उग्र इस्लामी प्रदर्शनों के साथ भारत के बहुत से शहरो दंगे किये थे और इसी सन्दर्भ में हुए इस्लामी दंगे तथा प्रदर्शन के दौरान मुम्बई में मुसलमानों ने उस शहीद स्मारक को जमीदोज कर दिया था जिसे मुम्बई के पाकिस्तान द्वारा किये गए आतंकी हमलो में मारे फौजियों तथा जनता की याद में बनाया गया था !
                       आज भारत में अवैध रूप से रह रहे जिन रोहिंगिया मुसलमानों के रोते हुए मासूम चेहरे आज मीडिया दिखा रहा है .और जिनको देख के भारत के मानवाधिकार आयोग में बैठे सेकुलरो की छाती में दूध उतर रहा है .उसी रोहिंगिया समाज की म्यांमार में की गयी हरकतों के चित्र इस पोस्ट में संलग्न है ..इच्छुक और जिज्ञासु मित्र विषय की जानकारी के उनका संज्ञान ले सकते है की आज मासूम से दिख रहे इस रोहिंगिया मुस्लिमो ने म्यांमार में कैसी हिंसा की थी !!!
पवन अवस्थी 
Shashi Agrawal हमारा देश कोई धर्मशाला नही है,कोई भी आये और यहाँ सरन दे दे,केन्द्र सरकार से अपील करता हु की ज्यादा मानवता दिखाने की जरूरत नही है,निकाल बाहर करे,ओर राज धर्म का पालन करे।

Anup Dalwani धर्मशाला है भी तो इंसानो के लिए है , वहशी जानवरो के लिए नही
Rahul Dubey मानव अधिकार आयोग का बैठक एक एक व्यक्ति को हंटर थी तब तक मारना चाहिए जबतक वह मानव अधिकार आयोग का नाम ना भूल जाए...मानवाधिकार वाले अवैध रोहंगियामुस्लिमों के पुनर्वास की चिंता करते हैं। 4 लाख से अधिक  प्रवासी कश्मीरियों की कोई चिंता नही ?