Tuesday, 19 September 2017

kahani

सन 2002 की एक रात को मेरे हाथ पुराना रीडर डाइजेस्ट हाथ लगा. पहले कभी पढा होगा मगर भूल गया हूंगा इसलिए तुरंत देखने लगा. उसमें एक आर्टिकल था एक टीवी स्टार ने लिखा है “जितनी भलाई आप कर सकते हैं उतनी आप करते चलो क्योंकि अच्छाई कभी फालतू नहीं जाती”
 उस फिल्म स्टार ने एक कहानी कही कि ‘एक व्यक्ति ने घर के खिड़की से रास्ते के उस पार एक छोटा सा रेस्टोरेंट था उसके दरवाजों की पैड़ियों को एक 18 साल के लड़के को साफ़ करते हुए देखा। वो 18 साल का लड़का उसको परिचित लगा उसने गौर से सोचा तो ध्यान आया उसके पिता जी के साथ उससे मिला था पिता जी नाम, फ़ोन नंबर उसके पास था उसने फ़ोन किया तुरंत और कहा तुम्हारे लड़के को मैं देख रहा हूं वो रेस्टोरेंट की पैड़ियां साफ कर रहा है, 18 साल का है, पढने की उम्र है उसको तुमने नौकरी पर क्यों लगाया तो पिता जी ने उसको कहा मुझे वेतन कम मिलता है और मुझे इतना बड़ा परिवार चलाना है, पढ़ने की उसकी इच्छा है और उसकी इच्छा का समर्थन मेरे मन में है भी लेकिन उसको मैं पैसा नहीं दे सकता इसलिए वो ये सारे काम करके पैसे इकट्ठा कर रहा है।
उस व्यक्ति को ये बात मन में रह गई उसने फ़ोन रख दिया और जाकर उस लड़के को कहा तुम्हारा काम होने के बाद रात को सामने मैं रहता हूं मुझे मिलकर जाना रात को लड़का आया तो उसने पूछा तुम पढ़ना चाहते हो? उस लड़के ने उत्तर दिया हाँ पढ़ना चाहता हूं व्यक्ति ने बोला कितना खर्चा होता है पूरा तुम्हारा बताओं, लड़के ने हिसाब लगाकर बताया उसने कहा देखों आगे की शिक्षा तुम्हे दूसरे जगह करनी होगी और वहां तुमको रहने के लिए खर्च लगेगा, खाने के लिए लगेगा सब जोड़ो उसने सब जोड़ा। व्यक्ति ने कहा कल से ये काम छोड़ दो और पढ़ने के लिए चले जाओ तुम्हारा खर्चा मैं करूंगा बालक खुश हो गया.
आगे व्यक्ति ने कहा देखों मैं तुम्हे दान नहीं दे रहा हूं तुम पढ़-लिखकर जब कमाने लगोगे तो जैसे तुमको बनता है वैसे हफ्तों में पूरा पैसा वापस करना है तुमको ये पहली शर्त है, दूसरी शर्त है अगर किसी की तुम्हारे जैसी परिस्थिति दिखती है तो जो मैं तुम्हारे लिए कर रहा हूं वैसा तुमको उसके लिए करना पढ़ेगा और तीसरी शर्त है मैंने तुम्हे जो पढ़ाया और खर्च किया ये बात जीवन में किसी तीसरे व्यक्ति को नहीं बताना है, इसे गुप्त रखना है। आगे 5 साल तक प्रतिवर्ष नौ सौ डॉलर उस बच्चे का खर्च उस व्यक्ति ने दिया फिर वो अपनी कहानी बताने वाला कहता है आगे वो बच्चा बड़ा हुआ, अच्छा कमाने लगा और उसने दो ही वर्षों में उसका पूरा पैसा वापस कर दिया. उस शर्त का उसने तुरंत पालन किया दूसरी शर्त का भी वो पालन करता है कठिनाई में फंसे व्यक्तियों की वो सहायता करता है बिना शर्त केवल तीसरी शर्त का पालन उसने नहीं किया। उसने ये कहानी लेख में लिखकर बताई वो जो पैड़ी साफ करने वाला लड़का था मैं ही था ये दायित्व बोध है. मेरे लिए किसी ने किया, मुझे भी करना है. ऐसी भावना यदि सबके मन में हो तो समाज में कोई गरीब नही रहेगा और सभी के सपने पूरे हो सकेंगे.

rohingya


 रोहिंग्या घुसपैठिये मानवीय मुद्दा नहीं बल्कि देश के गद्दारों के लिए वोट बैंक और जिहाद का मुद्दा है और ऐसे ही चंद गद्दार सिर्फ पैसों के लिए इन जिहादियों को हिन्दुस्थान में बसाने केलिए लड़ रहे हैं. वो पैसा जो इन्हें देशी विदेशी हिन्दुस्थान विरोधी गद्दारों से प्राप्त हो रहे हैं.*
*क्या आपको पता है रोहिंग्या आतंकवादियों के समर्थन में कौन कौन वकील सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं:*
१.फाली एस नरीमन
२.कपिल सिब्बल
३.राजीव धवन
४.अश्विनी कुमार
५.प्रशांत भूषण
६.कॉलिन गोजवेल्स
7- सलमान खुर्शीद
*ये ऐसे नामी गिरामी और महंगे वकील है जिन तक पहुँचने में भी आपकी एडियाँ घिस जाएगी. फिर भागे हुए कंगाल रोहिंग्या मुसलमानों पर ये वक्त जाया क्यों कर रहे हैं !*
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●पाकिस्तान तैयार कर रही है,रोंहिग्या की जेहादी सेना।
●सारे मुस्लिम देश जानते हैं कि रोंहिग्या आईएस और आई.एस.आई की सुविचारित साज़िश है,इसी लिए बंगलादेश सहित सभी इसे अपने यहाँ लेने के तैयार नहीं हैं और भारत में ठेलने के लिए जोर लगा रहे है
●इसका सबसे बड़ा प्रमाण है पाकिस्तान के ,#सुन्नी इत्तेहाद कांउसिल की खुले आम घोषणा।इसके हेड अशरफ बाजवा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे पाक आर्मी चीफ को कह रहे हैं.....#हे कम़र जावेद बाजवा..हम तस्तरी में सजाकर,गुलदस्ता बनाकर,फौरन सवा लाख जेहादी रोंहिग्या की फौज दे रहे हैं जिससे हमारा गजवा ए हिन्द का पुराना सपना सकार होगा,जन्नतनशीं मायूस#मौलाना हाली की रूह को सकून मिलेगा।ये फौजी भारत में मोदी को मारेगी और म्यांमार जाकर शू ची को भी खतम कर देगी।
●भारत सरकार से हम निवेदन करते हैं कि जो भी यहाँ रोंहिग्या का समर्थन कर रहे हैं उनपर रासुका के अधीन शीघ्र कड़ी कारवाईयां करे,संपत्ति भी जब्त कर ले।
कुमार अवधेश सिंह


धर्म को जीना ही धर्म का प्रचार है l
हम अपना पतन स्वयं कर रहे हैं lहम क्यों नही शिखा धारण करते?
क्या आज भी हमारे आसपास औरंगजेब घूम रहा है?शिखा धर्म का स्तम्भ है ... इसे धारण कीजिये lस्पष्ट रूप से कहूं तो मुझे इतिहासमें ऐसा कोई प्रमाण नही प्राप्त होता जिससे यह सिद्ध होता हो कि 1947 के बाद की किसी भी सरकार ने"शिखा" रखने पर प्रतिबन्ध लगाया हो lचोटी न रखने या चोटी काटने के लिए किसी ने प्रचार भी नहीं किया,किसीनेआपसे कहा भी नही,आपको आज्ञा भी नहीं दी,फिर भी आपने चोटी काट ली! क्यों ?परन्तु नेहरूवादी हिंदुत्व के इतिहासकारों और लेखकों ने सलीमशाही जूतियाँ चाट चाट कर जो कुछ लिखा है उसके बहुत ही नकारात्मक प्रभाव हिन्दू समाज पर पड़े हैं lफिर भी हम शिखा क्यों नही धारण करते...?जबकि आज विदेशी जो सनातन वैदिक धर्म को स्वीकार कर रहे हैं... वे सब शिखा धारण कर रहे हैं,एक ऐसा भीदिन आयेगा कि वो विदेशी आपको सनातनवैदिक हिन्दू धर्म का अनुयायी मानने से मना कर देगा ... और आपके पास कोई उत्तर नही रहेगा lयुवा और वृद्ध कोई नहीं बचा इस मायाजाल से ... आखिर ये कट्टरता होती क्या है?पहले ठुकता-पिटता है,फिर बदनाम होता है... और तिलक के स्थान पर माथे पे लिखवा लेता है हिन्दू ... साम्प्रदायिक lक्यूंकि इस राजनैतिक षड्यंत्र काCounterकरना तो दूर की बात है ... आम हिन्दूReplyतक नहीं कर सकता,अच्छे तरीके से lशिखा (चोटी) रखना,तिलक लगाना,जनेऊ पहनना,भगवा रंग का गमछा-अंगोछा लपेटना,कलावा या अन्य रक्षा-सूत्र बांधना,आदि उपरोक्त प्रतीकों को धारण करके जब कोई सरकारी कार्यालयों या विभागों में काम करने जाता था या काम करवाने जाता था,उन्हें यह जुमले मारे जाते थे... कि आप तो बहुत कट्टर दीखते हो?इतनी कट्टरता ठीक नही ...धीरे धीरे हिन्दू समाज ने शिखा धारण करना ही छोड़ दिया...जिन शिखाओं के लिए इसी हिन्दू समाजके पूर्वजों ने अपनी गर्दने करवाई थीं ...न जाने आज कितने कट्टर औरंगजेब इन -"अ-कट्टर" हिन्दुओं के आसपास घूम रहे हैं ...और कट्टर भी केवल हिन्दू ...कट्टर मुसलमान नही...कट्टर ईसाई नही...कट्टर यहूदी नही,कट्टर जैन नहीं,कट्टर बोद्ध नही,कट्टर सिक्ख नही,...कट्टरSECULARभी नही......कट्टर देशद्रोही भी नही...कट्टर भ्रष्टाचारी भी नही...कट्टर स्मैकिया भी नही.. .कट्टर नशेड़ी भी नही ...केवल हिन्दू ही कट्टर है पूरे विश्व में...आइये जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर ये कट्टर होता क्या है ...कट्टर अर्थात... किसी भी काम में,रूप,रंग,आदि में "अति" या अतिवाद को कट्टरता कहा जाता हैlदार्शनिक शब्दों में कहा जाए तो कट्टरता तमस का ही एक पर्याय है...जड़ और जड़ता... जो जहां है,वहीं रुक जाएlठहरे,जमे और रुके हुए पानी में भी कीड़े पड़ जाते हैंlइसी कारण से... सनातन धर्म में ज्ञान का बहुत महत्व बताया गया हैlज्ञान ... बढ़ता जाए,बढाते रहो,बहतेरहो,जो कि सत्त्व का पर्याय माना जाता हैlइसीलिए हमारे यहाँ शब्द प्रयोग होता है "धर्म-परायणता"...चीन में भारत की अलग परिभाषा दी जाती है ...भा+रतभा अर्थात ज्ञानरत अर्थात लीन रहना... ज्ञान में लीन रहना lआप क्या बनना चाहते हैं...?कट्टर हिन्दू या धर्म-परायण हिन्दू...वैसे... अतिवाद और अति की इस लहर से कोई नहीं बचा lचाहे कट्टर डाक्टर हो... जहां जाओ बस डाक्टरी ही दिखाओ lचाहे कट्टर इंजीनियर हो... जहां जाओबस इंजिनीयरि ही दिखाओ lचाहे कट्टर वैज्ञानिक हो... जहां जाओ बस विज्ञान ही विज्ञान ... बाकीसब पागल lचाहे कट्टर दुकानदार हो... दुनिया पलट जाए... परन्तु दुकानदारी नहीं छोड़ेंगे lचाहे कट्टर अफसर ... अफसरी के आगे बाकी सब नौकर lचाहे कट्टर अध्यापक... जहां भी हो बस... शुरू हो जाओ lकट्टर कांग्रेसी... यदि कांग्रेस किसी कुत्ते को खड़ा कर दे तो उसे भीवोट देंगे lलुट गया देश,बर्बाद हो गया देश,भाड़ में गया देश ... गांधी-नेहरु परिवार ही महान है lकट्टर सपाई... दूध का व्यापार चाहे मुल्ला मुलायम मुसलमानों को सौंप दें परन्तु वोट मुल्ल्ला को हो जायेगा lकट्टर बसपाई... माया धन और बल से कबकी मनुवादी हो गई,परन्तु वोट माया को ही देंगे lकट्टर वामपंथी... न घर चले,न दूकान,वामपंथ सदा महान,सारी जिन्दगी धर्म को अफीम कहते रहे,पर अंतिम संस्कार वैदिक मन्त्रों से ही,देहके साथ ही मर गई अफीम कहने वाली जुबान भी lकट्टर अम्बेडकरवादी ... जब आँख खोलीतो अम्बेडकर की कहानी ही सुनीं,वोजो अम्बेडकर ने न लिखी न कही,और लगे हिन्दुओं को गाली देनेlपर अम्बेडकर ने क्या कहा,क्या लिखा...ये न कभी जाना,न ही जानने का प्रयास मात्र ही किया lकट्टर पाकिस्तानी ... अपने देश का पता नही,पर भारत को नेस्तनाबूद करने के सपने रोज देखना lकट्टर अरबी ... खजूर और तेल पूरी दुनिया में बिकता रहे,इस्लाम का प्रचार होता रहे,मुसलमान गया भाड़ में lकट्टर और धर्म परायणता के इस खेल को ... हिन्दू ही कभी समझ न पाया जिसकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूलशिक्षाओं में भी सत्त्व का विशेष महत्व है lधर्म परायण बनो...और इन कट्टर कांग्रेसियों,कट्टर सपाई,कट्टर बसपाई,कट्टर वामपंथियों आदि के चंगुल से बाहर निकलो...और सोने की चिड़िया कैसे बनाया जाए,इस पर विचार मंथन करके अडिग होकर कार्य करो lसात्विक,राजसिक और तामसिक ... इन तीन प्राकृतिक गुणों की विवेचना अधिक करूँगा तो समय बहुत लग जायेगा,और पढ़े बिना ही सब छोड़ देंगे,काम की बात संभव है कि आप सबको समझ आ ही गई होगी lकुछ लोग शिखा और चोटी को लेकर अत्यधिक कुतर्क करते हैं, गीता प्रेस गोरखपुर की हजारों पुस्तकोंमें सद्विचार लिखने वाले युगसंत स्वामी रामसुख दास जी महाराज ने कुछ इस प्रकार उन कुतर्कों का उत्तर दिया है ...कुतर्क - चोटी रखने से क्या लाभ होगा?उत्तर - जो लाभ को देखता है,वह पारमार्थिक उन्नति कर ही नहीं सकता lलाभ देखकर ही कोई कार्य करोगे तो फिर शास्त्र-वचन का,संत वचन का क्या आदर हुआ?उनकी क्या सम्मान हुआ?अपने लाभ के लिए,अपना मतलब सिद्ध करने के लिए तो पशु-पक्षी भी कार्यकरते हैं lयह मनुष्य-पना नही हैlचोटी रखने में आपकी भलाई है - इसमें मेरे को रत्तीमात्र भी संदेह नही है lवास्तव में हमे लाभ-हानि को न देखकर धर्म को देखना है lधर्मशास्त्र मेंआया है कि बिना शिखा के जो भी दान,यज्ञ,ताप,व्रत आदि शुभकर्म किये जातेहैं वे सब निष्फल हो जाते हैं lसदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च lविशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम llशिखा अर्थात चोटी हिन्दुओं का प्रधान चिन्ह है lहिन्दुओं में चोटीरखने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आ रही है lपरन्तु अब अपने इसका त्यागकर दियाहै - यह बड़े भारी नुकसान की बात है lविचार करें,चोटी न रखनेया चोटी काटने के लिए किसी ने प्रचार भी नहीं किया,किसी ने आपसे कहा भीनही,आपको आज्ञा भी नहीं दी,फिर भीआपने चोटी काट ली तो आप मानो कलियुग केअनुयायी बन गये !यह कलियुग का प्रभाव है,क्योंकि उसे सबको नरकों में ले जाना है lचोटी कट जाने से नरकों में जाना सुगम हो जायेगा lइसलिए आपसे प्रार्थना है कि चोटी को साधारण समझकर इसकी उपेक्षा न करें,चोटी रखना मामूली दिखता है परन्तु वास्तव में यह तनिक भी मामूली कार्य नहीहै lलेख के आरम्भ की पंक्तियाँ फिर लिखरहा हूँ... इन्हें सदैव स्मरण रखें lहम अपना पतन स्वयं कर रहे हैं lहम क्यों नही शिखा धारण करते?क्या आज भी हमारे आसपास औरंगजेब घूम रहा है?शिखा धर्म का स्तम्भ है ... इसे धारण कीजिये lस्पष्ट रूप से कहूं तो मुझे इतिहासमें ऐसा कोई प्रमाण नही प्राप्त होता जिससे यह सिद्ध होता हो कि 1947 के बाद की किसी भी सरकार ने"शिखा" रखने पर प्रतिबन्ध लगाया हो lचोटी न रखने या चोटी काटने के लिए किसी ने प्रचार भी नहीं किया,किसीनेआपसे कहा भी नही, न ही आपसे आग्रह किया और न हीआपको आदेशही दिया... फिर भी आपने चोटी काट ली! क्यों ?
कुमार अवधेश सिंह
पिछले सात आठ सालों में जबसे हिन्दुओं ने सोशल मीडिया के द्वारा संगठित होना शुरु किया है।
तब से करीब 20% हिन्दुओं ने भी जाति-पाति को छोड़ कर अपना हिन्दू वोट बैंक मजबूत किया है।
जिसका सुखद परिणाम ये निकला की हिन्दुओं का वोट बैंक दुगना हो गया,,?
आज करीबन 40% हिन्दू अपने आप को हिन्दू कहने में गर्व करता है, और जो शक्तियाँ हिन्दुओं के खिलाफ काम कर रही हैं, उन शक्तियों को वो अपना दुश्मन समझने लगा है ?
ये 40% संगठित हिन्दू पढ़ा लिखा है,?
और इसकी बाजार में क्रय शक्ति भी सबसे ज्यादा है
आज हालत ये है कि कोई भी पार्टी, नेता, अभिनेता, पत्रकार, अखबार, न्यूज़ चैनल या कम्पनी हिन्दुओं के खिलाफ दुर्भावना दिखाता है तो ये मुखर 40% एक साथ उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है ?
जिसका परिणाम ये हो रहा है कि सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों की माला जपना कम कर दिया है ?
न्यूज़ चैनलों और अखबारों ने भी बहुत तेजी से अपने सेक्युलर बुरका उतार कर अब हिन्दुओं की भावनाओं को व्यक्त करना शुरु कर दिया है ?
खान बंधुओं की फ़िल्में पिटने लगी हैं,
वो सहम के अपने बिलों में घुस गए हैं,
सेक्युलर पत्रकारों का मजाक बनने लगा है ?
इन सेक्युलरों को कोई सुनना और पढ़ना नहीं चाहता।
हिन्दुओं के संगठित होने से देश की स्थिति और परिस्तिथियाँ बहुत तेजी से बदल रही हैं, जो इस बात को समझ कर अपने आप में बदलाव ला रहा है।
वही मार्केट में टिक रहा है, और टिक पायेगा, वर्ना मध्यवर्गीय हिन्दू उसको लात मारके मार्केट से बहार कर देगा ?
आज हिन्दुओं के संगठित होने का ही परिणाम है कि कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टी, मुलायम, शरद पावर भी मुसलमनो के वोट बैंक की परवाह किये बिना ये बोलने को मजबूर हुए हैं की, उन्होंने अपने शासनकाल में पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही की थी?
दुनिया के सभी बड़े देश भी तेजी से बदलते हुए भारत को महसूस कर रहे हैं, और अपनी नीतियों को उसी के अनुसार बदलने में मजबूर हुए हैं।
उनको भी मालूम हो गया है, की हिन्दुओं के खिलाफ नीतियाँ बना कर भारत में व्यापार करना अब मुश्किल है ?
इस तेजी से बदलते हुए भारत की वजह से हिन्दुओं को दुश्मन समझने वाला दुसरे धर्म के लोग और पाकिस्तान भी सहम गया है ?
ये आपको सोशल मीडिया में भी दिखने लगा है, हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलने वाली बहुत से पेज और ID अब निष्क्रिय हो गए हैं?
सौ बातों की एक बात
जो हिन्दुओं के हित की बात करेगा वो ही देश और समाज में राज करेगाl
कुमार अवधेश सिंह

हिंदी में पति की हत्या करने वाली औरत को गाली के रूप में " खसम खानी " कहा जाता है , लेकिन पाकिस्तान में वास्तव में एक औरत ने अपने पति को पका कर खा लिया था ...
अभी तक तो मुस्लिम मर्द दुश्मनों को मार कर उनका मांस खाया करते थे , लेकिन पाकिस्तान की औरतें मर्दों से भी बड़ी राक्षसी बन गयीं ,और उन्होंने अपने ही पत्तियों को मार कर उनका मांस खाना शुरू कर दिया है .
हत्या का कारण पूछने पर जैनब ने मीडिया और पुलिस वालों से कहा
"'I killed my husband before he dared to touch my daughter.'यानी - इस से पहले कि मेरा पति मेरी बेटी पर हाथ लगाने की हिम्मत करता , मैंने उसका क़त्ल कर दिया .
पाकिस्तानी अंगरेजी अखबार "डेली मेल (DAILY MAIL ) में दिनांक 25 नवम्बर 2011 को एक बड़ी सनसनी खेज खबर छपी थी , जिसकी हेडिंग थी "Wife 'killed, cut up and cooked her husband into a korma to stop him from abusing his stepdaughter"
(अर्थात- पत्नी ने पति की हत्या करने के बाद काट कर कोरमा बनाया , ताकि अपनी सौतेली बेटी को दुष्कर्मी पति से बचा सके )
अरून शुक्ला

Monday, 18 September 2017

एक देश था
नाम :- पर्शिया
100 % आबादी पारसियों की,
#मुसलमान वहां पहुचे, (रोहिग्ंया जैसे )
नारा दिया #पारसी मुस्लिम भाई भाई !
कुछ सालो बाद 28 पारसी अपनी जान बचाकर नौका से भाग कर #भारत आये, आज उस देश का नाम ईरान है, जहाँ 100% मुसलमान हैं और पारसी 000 % .........
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कुछ दशकों पहले #कश्मीरी पंडित #सेक्युलर समाज की मिसाल थे और मुस्लिमों के साथ दाना पानी का रिश्ता था । एक दिन नारा ए तदबीर उठा,
#अल्लाह_हु_अकबर के नारों के बीच अपनों की लाशें छोड़ सामान सर पर लिए सिंधियों पंजाबियों और बंगालियों की तरह भारतीय शहरों में आकर बसना पड़ा ।,,....यहां # लोग अभी #रोहिंग्या मुसलमानों को भारत मे लाने को है ..ऑखें खोलो ,
कुमार अवधेश सिंह
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सरदार सरोवर बांध का शुभारम्भ आज 101 पंडितोंद्वारा #वैदिक_मंत्रोच्चारण के साथ किया गया ।
इसका #मतलब इस बांध का पानी #उन_लोगों के लिए #हराम हो गया न ?
कुमार अवधेश सिंह
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Sunday, 17 September 2017

कुछ कहना चाहती हूँ आपसब से....
*वो वक्त गया जब कहा जाता था कि "हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा बच्चा राम है। " #कामान्ध #नरपिशाचों को मासूमों के साथ #हैवानियत से खेलने का शौक सर चढ़ गया है।ऐसे में माता-पिता के रूप में अब हमारे दायित्व सिर्फ ये नहीं रह गये कि हम अपने बच्चों से सिर्फ ये पूछें 
... लंच फिनिश किया था ?
क्या पढ़ाया गया आज?
कोई नोटिस मिली है क्या?
डायरी दिखाओ?
ड्रेस कितना गन्दा किये हो?
किसी टीचर ने शिकायत की तो पिट जाओगे
बड़ों की और टीचर्स की हर बात माना करो।
ज्यादा बातें नहीं।
स्कूल की बकवास बता कर मुझे तंग मत करो।
*आदि आदि पूछने से कई गुना जरूरी है अपने बच्चे से प्रतिदिन ये पूछना कि:-*
*बस ड्राइवर ने कुछ कहा है?*
*टीचर कैसे चीयर करती है तुम्हें?*
*टॉयलेट जाती हो तो स्वीपर तो नही होता वहां?*
*क्या आज कुछ offered फील हुआ तुमको?*
*कोई प्राब्लम तो नहीं है तुम्हे स्कूल में?*
*अगर तुम सही हो तो टीचर हो या प्रिंसिपल, किसी से मत डरना।*
*कोई बडा़, घर हो या बाहर, कुछ गलत करने को कहे तो उसकी बात कभी मत मानना।*
*बिल्कुल भी मत डरना। मुझे पूरा विश्वास है तुम पर।*
*तुम बिल्कुल भी अकेले/अकेली नहीं हो।*
*कोई धमकी दे, बेखौफ मुझे बताओ।स्कूल तुम से बढ़कर नहीं।*
*कुछ इस तरह से बच्चों को आत्मविश्वासी बनाएं और उन्हें बिल्कुल lower k.g. से ही गलत टच के बारे में रोज aware कर के स्कूल भेजे।क्यूंकि समाज अति से ज्यादा गंदा हो चला है। ऐसे में जागरुक माता-पिता बने, बच्चों के साथ friendly रहें अनुशासित वो समय के साथ स्वयं हो जाएंगे। उन्हें हरपल अहसास कराएँ कि वो कितनी अहमियत रखते हैं आपके लिये। उन्हें इतना जोड़े खुद से कि वे कभी कुछ गलत भी कर जाएँ तो सबसे पहले स्वयं आपको बताएँ।*
*मेरी बातों से पता नहीं आपलोग सहमत हो या नहीं, पर मुझे तो #परवरिश का यही तरीका समझ आता है आज के #व्यभिचारी_परिवेश में।*

पहली बुलेट ट्रेन चलाने का सपना

भारत में पहली बुलेट ट्रेन चलाने का सपना भले ही जापान साकार करेगा पर इस प्रोजेक्ट को तैयार करने की जिम्मेदारी कानपुर आईआईटी के पूर्व छात्र संजीव सिन्हा को सौंपी गई है। जापान सरकार ने उन्हें परियोजना का सलाहकार बनाया है। आईआईटी से डिग्री लेने के बाद संजीव जापान चले गए और पिछले 21 साल से वहीं काम कर रहे हैं। उन्होंने आईआईटी-के से भौतिकी में पांच साल का इंटीग्रेटेड एमएससी कोर्स किया है।
21 जनवरी 1973 को राजस्थान में जन्मे संजीव ने 12वीं तक की पढ़ाई वहीं से की है। पहली ही कोशिश में उनका चयन आईआईटी कानपुर में हो गया। यहां से एमएससी की डिग्री लेने के बाद वह जापान चले गए। वहां कई कम्पनियों में लंबे समय तक काम किया। शादी करने के बाद विदेश में ही बस गए।
जिस बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट का संजीव को सलाहकार बनाया गया है, उसे वर्ष 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है। अहमदाबाद से मुम्बई के बीच करीब 508 किमी की दूरी के बीच यह ट्रेन दौड़ेगी। इसे तय करने में महज दो घंटे का समय लगेगा, जबकि अभी करीब सात से आठ घंटे लग जाते हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट करीब एक लाख करोड़ का है। बुलेट ट्रेन जापान की तकनीक पर चलेगी।
इससे पहले काशी को क्योटो बनाने के लिए भी संजीव सिन्हा ने प्रोजेक्ट तैयार किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जापान गए थे तो संजीव ने उन्हें यह प्रोजेक्ट दिखाया था। इसी के आधार पर आईआईटी बीएचयू व आईआईटी कानपुर ने इस दिशा में कदम बढ़ाए थे।
पेट्रोल और टमाटर के दामों पर रोने वालो को थोड़ी सी फुर्सत निकालकर एक बार इसे भी पढ़ लेना चाहिए।
गुजरात के मंदिरों की मदद से दुनियाभर की ताकतों से अकेले भिड़ गए नरेंद्र मोदी, वर्ल्ड बैंक भी हक्का-बक्का ...
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 67वें जन्मदिन के मौके पर सरदार सरोवर बांध का उद्घाटन किया। इस बाँध से करोड़ों यूनिट बिजली व हजारों गाँवों को पानी मिलेगा....लेकिन इस बाँध के पीछे की इन सच्चाइयों के बारे में जानकर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे.आप सोच में पड़ जाएंगे कि भारत में ही रहने वाले कुछ गद्दार किस तरह देश की तरक्की की राह में रोड़े खड़े करते हैं..

बांध के उद्घाटन के बाद जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बताया कि इस बांध के निर्माण में अपने देश के कुछ लोगों के अलावा विश्व बैंक ने भी रुकावटें पैदा की थी। इससे देश को होने वाले जबरदस्त फायदे को देख देश विरोधी शक्तियों ने खूब प्रोपगंडा फैलाया। विश्व बैंक भी इसमें शामिल हो गया और उसने इस बाँध को बनाने के लिए पैसे देने से इंकार कर दिया था। विश्व बैंक के मना करने पर गुजरात के मंदिरों ने भी दिया था पैसा ! उस वक़्त गुजरात के मंदिर तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी की मदद के लिए आगे आये थे और मंदिरों ने बांध के निर्माण के लिए पैसा दिया था।
दुनिया की हर ताकत ने पैदा की थी रुकावट ... 
जिस बाँध का फायदा अब देश के 4 बड़े राज्यों को मिलेगा, कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया था, जिसके जवाब में 2006 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके लिए 51 घंटों का अनशन तक किया था। यहाँ तक कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी इसे बनाने के लिए काफी पापड़ बेले थे।
पीएम मोदी ने बताया कि दुनिया की हर ताकत ने सरदार सरोवर बांध के रास्ते में रुकावट पैदा की। मेधा पाटकर और अभिनेता आमिर खान जैसे लोगों ने भी उन ताकतों का साथ दिया और मोदी पर अनाश-शनाप आरोप लगाए। मामले को कोर्ट ले जाया गया। अंत में मोदी को हासिल हुई जीत !
नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाया गया,
 ‘कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा’ का नारा लगाया गया। जिसमे देशद्रोही फ़िल्म अभिनेता आमिर खान और देशद्रोही अरुंधती रॉय ने भी विरोधियों का साथ दिया। 
मोदी के सामने सभी राष्ट्रविरोधी शक्तियां एकजुट हो गयी थी। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में झूठे शपथ-पत्र तक पेश किये गए. पूरी कोशिश की गयी कि देशहित के इस प्रोजेक्ट को आगे ना बढ़ने दिया जाए, लेकिन सभी मुश्किलों से जूझते हुए नरेंद्र मोदी ने आखिरकार इसे बनवा ही लिया..
इस बाँध से किसानों की दशा बिल्कुल बदल जायेगी। वर्षा पर निर्भर किसानों को कभी सूखे का सामना नहीं करना पडेगा। इसके जरिये 9633 गांवों तक पानी पहुंचेगा, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा।
इसके अलावा इस बाँध से 100 करोड़ यूनिट बिजली पैदा होगी, जिससे बिजली की किल्लत सदा के लिए दूर हो जायेगी।

alians

https://www.youtube.com/watch?v=0IYku94yGCw
आज भी हाट मे बिकते है इंसान
दुनियाभर में आज भी अमानवीय ग़ुलाम प्रथा जारी है और जानवरों की तरह इंसानों की ख़रीद-फ़रोख्त की जाती है.इन ग़ुलामों से कारख़ानों और बाग़ानों में काम कराया जाता है. उनसेघरेलू काम भी लिया जाता है. इसके अलावा ग़ुलामों को वेश्यावृति के लिएमजबूर भी किया जाता है. ग़ुलामों में बड़ी तादाद में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मादक पदार्थ और हथियारोंके बाद तीसरे स्थान पर मानव तस्करी है. एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है किदुनियाभर में क़रीब पौने तीन करोड़ ग़ुलाम हैं. एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल की परिभाषा के मुताबिक़ वस्तुओं की तरह इंसानों का कारोबार, श्रमिक को बेहद कम या बिना मेहनताने के काम करना, उन्हें मानसिक या शारीरिक तौर पर प्रताड़ित कर काम कराना, उनकी गतिविधियो पर हर वक़्त नज़र रखना ग़ुलामी माना जाता है. 1857 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन ग़ुलामी की चरम अवस्था 'किसी पर मालिकाना हक़ जताने' को मानता है. फ़िलहाल दासता की श्रेणियों में जबरन काम कराना, बंधुआ मज़दूरी, यौन दासता, बच्चों को जबरने सेना में भर्ती करना, कम उम्र में या जबरन होने वाले विवाह और वंशानुगत दासता शामिल है.अमेरिका में क़रीब 60 देशों से लाए गए करोड़ों लोग ग़ुलाम के तौर पर ज़िन्दगी गुज़ारने को मजबूर हैं. ब्राज़ील में भी लाखों ग़ुलाम हैं. हालांकि वहां के श्रम विभाग के मुताबिक़ इन ग़ुलामों की तादाद तक़रीबन 50 हज़ार है और हर साल लगभग सात हज़ार ग़ुलाम यहां लाए जाते हैं. पश्चिमी यूरोप में भी गुलामों की तादाद लाखों में है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2003 में चार लाख लोग अवैध तौर पर लाए गए थे. पश्चिमी अफ्रीका में भी बड़ी तादाद में ग़ुलाम हैं, जिनसे बाग़ानों और उद्योगों में काम कराया जाता है. सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस और पूर्वी यूरोप में ग़ुलामी प्रथा को बढ़ावा मिला.पूर्वी अफ्रीका के देश सूडान में गुलाम प्रथा को सरकार की मान्यता मिली हुई है. यहां अश्वेत महिलाओं और बच्चों से मज़दूरी कराई जाती है. युगांडा में सरकार विरोधी संगठन और सूडानी सेना में बच्चों की जबरन भर्ती की जाती है. अफ्रीका से दूसरे देशों में ग़ुलामों को ले जाने के लिएजहाज़ों का इस्तेमाल किया जाता था. इनजहाज़ों में ग़ुलामों को जानवरों की तरह ठूंसा जाता था. उन्हें कई-कई दिनों तक भोजन भी नहीं दिया जाता था, ताकि शारीरिक और मानसिक रूप से वे बुरी तरह टूट जाएं और भागने की कोशिश न करें. अमानवीय हालात में कई ग़ुलामों की मौत हो जाती थी और कई समुद्र में कुदकर अपनी जान दे देते थे. चीन और बर्मा में भी गुलामों की हालत बेहद दयनीय है. उनसे जबरन कारख़ानों और खेतों में काम कराया जाता है. इंडोनेशिया, थाइलैंड, मलेशिया और फ़िलीपींस में महिलाओं सेवेश्यावृति कराई जाती है. उन्हें खाड़ी देशों में वेश्यावृति के लिए बेचा जाता है.दक्षिण एशिया ख़ासकर भारत, पाकिस्तानऔर नेपाल में ग़रीबी से तंग लोग ग़ुलाम बनने पर मजबूर हुए. भारत में भी बंधुआ मज़दूरी के तौर पर ग़ुलाम प्रथा जारी है. हालांकि सरकार ने 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेशके ज़रिये बंधुआ मज़दूर प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर इसके बावजूद सिलसिला आज भी जारी है. यह कहना ग़लत न होगा कि औद्योगिकरण की वजहसे इसमें इज़ाफ़ा ही हुआ है. सरकार भी इस बात को मानती है कि देश में बंधुआ मज़दूरी जारी है. भारत के श्रम व रोज़गार मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 19 प्रदेशों से 31 मार्च, 2010 तक देशभरमें दो लाख 86 हज़ार 612 बंधुआ मज़दूरों की पहचान की गई और मुक्त उन्हें मुक्त कराया गया. नवंबर तक एकमात्र राज्य उत्तर प्रदेश के 28 हज़ार 385 में से केवल 58 बंधुआ मज़दूरों को पुनर्वासित किया गया, जबकि 18 राज्यों में से एक भी बंधुआ मज़दूर को पुनर्वासित नहीं किया गया. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में सबसे ज़्यादा तमिलनाडु में 65 हज़ार 573 बंधुआ मज़दूरों की पहचान कर उन्हें मुक्त कराया गया. कनार्टक में 63 हज़ार 437 और उड़ीसा में 50 हज़ार 29 बंधुआ मज़दूरों को मुक्त कराया गया. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 19 राज्यों को 68 करोड़ 68 लाख 42 हज़ार रुपये की केंद्रीय सहायता मुहैया कराई गई, जिसमें सबसे ज़्यादा सहायता 16 करोड़ 61 लाख 66 हज़ार 94रुपए राजस्थान को दिए गए. इसके बाद 15करोड़ 78 लाख 18 हज़ार रुपये कर्नाटक और नौ कराड़ तीन लाख 34 हज़ार रुपये उड़ीसा को मुहैया कराए गए. इसी समयावधि के दौरान सबसे कम केंद्रीय सहायता उत्तराखंड को मुहैया कराई गई. उत्तर प्रदेश को पांचलाख 80 हज़ार रुपए की केंद्रीय सहायता दी गई. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली,गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंडको 31 मार्च 2006 तक बंधुआ बच्चों का सर्वेक्षण कराने, मूल्यांकन अध्ययन कराने और जागरूकता सृजन कार्यक्रमों के लिए चार करोड़ 20 लाखरुपए की राशि दी गई.भारत में सदियों से किसान गांवों के साहूकारों से खाद, बीज, रसायनों और कृषि उपकरणों आदि के लिए क़र्ज़ लेते रहे हैं. इस क़र्ज़ के बदले उन्हें अपने घर और खेत तक गिरवी रखने पड़ते हैं. क़र्ज़ से कई गुना रक़म चुकाने के बाद भी जब उनका क़र्ज़ नहीं उतर पाता. यहां तक कि उनके घर और खेत तक साहूकारों के पास चले जाते हैं. इसके बाद उन्हें साहूकारों के खेतों पर बंधुआ मज़दूर के तौर पर काम करना पड़ता है. हालत यह है कि किसानों की कईनस्लें तक साहूकारों की बंधुआ बनकर रह जाती हैं.बिहार के गांव पाईपुरा बरकी में खेतिहर मज़बूर जवाहर मांझी को 40किलो चावल के बदले अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ 30 साल तक बंधुआ मज़दूरी करनी पड़ी. क़रीब तीन साल पहले यह मामला सरकार की नज़र में आया. मामले के मुताबिक़ 33 साल पहले जवाहरमांझी ने एक विवाह समारोह के लिए ज़मींदार से 40 किलो चावल लिए. उस वक़्त तय हुआ कि उसे ज़मींदार के खेत पर काम करना होगा और एक दिन की मज़दूरी एक किलो चावल होंगे. मगर तीन दशक तक मज़दूरी करने के बावजूद ज़मींदार के 40 किलो का क़र्ज़ नहीं उतर पाया. एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल के मुताबिक़ भारत में देहात में बंधुआ मज़दूरी का सिलसिला बदस्तूर जारी है. लाखों पुरुष, महिलाएं और बच्चे बंधुआ मज़दूरी करने को मजबूर हैं. पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के अन्य देशों में भी यही हालत है.देश में ऐसे ही कितने भट्ठे व अन्य उद्योग धंधे हैं, जहां मज़दूरों को बंधुआ बनाकर उनसे कड़ी मेहनत कराई जाती है और मज़दूरी की एवज में नाममात्र पैसे दिए जाते हैं, जिससे उन्हें दो वक़्त भी भरपेट रोटी नसीब नहीं हो पाती. अफ़सोस की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी प्रशासन इन मामले में मूक दर्शक बना रहता है, लेकिन जब बंधुआ मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन मीडिया के ज़रिये प्रशासन पर दबाव बनाते हैं, तो अधिकारियों की नींद टूटती है और कुछ जगहों पर छापा मारकर वे रस्म अदायगी कर लेते हैं. श्रमिक सुरेंद्र कहता है कि मज़दूरोंको ठेकेदारों की मनमानी सहनी पड़ती है. उन्हें हर रोज़ काम नहीं मिल पाता,इसलिए वे काम की तलाश में ईंट भट्ठों का रुख़ करते हैं, मगर यहां भी उन्हें अमानवीय स्थिति में काम करना पड़ता है. अगर कोई मज़दूर बीमार हो जाए, तो उसे दवा दिलाना तो दूर की बात उसे आराम तक करने नहीं दिया जाता.दास प्रथा की शुरुआत की कई सदी पहले हुई थी. बताया जाता है कि चीन में 18-12वीं शताब्दी ईसा पूर्व ग़ुलाम प्रथा का ज़िक्र मिलता है. भारत के प्राचीन ग्रंथ मनु स्मृति में दास प्रथा का उल्लेख किया गया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 650 ईस्वी से 1905 के दौरान पौने दो क़रोड़ से ज़्यादा लोगों को इस्लामी साम्राज्य में बेचा गया. 15वीं शताब्दी में अफ्रीका के लोग भी इस अनैतिक व्यापार में शामिल हो गए. 1867 में तक़रीबन छह करोड़ लोगों को बंधक बनाकर दूसरे देशों में ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया.ग़ुलाम प्रथा के ख़िलाफ़ दुनियाभर में आवाज़ें बुलंद होने लगीं. इस पर 1807 में ब्रिटेन ने दास प्रथा उन्मूलन क़ानून के तहत अपने देश में अफ्रीकी ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख्त पर पाबंदी लगा दी. 1808 में अमेरिकी कांग्रेस ने ग़ुलामों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया. 1833 तक यह क़ानून पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में लागू कर दिया. कहने को तो भारत में बंधुआ मज़दूरी पर पाबंदी लग चुकी है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि आज भी यह अमानवीय प्रथा जारी है. बढ़ते औद्योगिकरण ने इसे बढ़ावा दिया है. साथ ही श्रम क़ानूनों के लचीलेपन के कारण मज़दूरों के शोषण का सिलसिला जारी है. शिक्षित और जागरूक न होने के कारण इस तबक़े की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया. संयुक्त राष्ट्र संघ को चाहिए कि वह सरकारों से श्रम क़ानूनों का सख़्ती से पालन कराए, ताकिमज़दूरों को शोषण से निजात मिल सके. संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवाधिकार जैसे संगठनों को ग़ुलाम प्रथा के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम को और तेज़ करना होगा. साथ ही ग़ुलामों को मुक्त करानेके लिए भी सरकारों पर दबाव बनाना होगा. इसमें बात में कोई राय नहीं है कि विभिन्न देशों में अनैतिक धंधे प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से ही होते हैं, इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी दुरुस्त करना होगा, ताकि ग़ुलाम भी आम आदमी की ज़िन्दगी बसर कर सकें.
भारतीय महाद्वीप केइस विभाजन में जिस संस्था ने मुख्य रूप से भाग लिया उसका नाम था मुस्लिम लीग एवं इंडियन नेशनल कांग्रेस, तथा जिनमुख्य लोगों ने हिस्सा लिया वो थे मो. अली जिन्नाह, लोर्ड माउन्टबेटेन, क्रेयल रैडक्लिफ, जवाहर लाल नेहरु, महत्मा गाँधी एवंदोनों संगठनो के कुछ मुख्य कार्यकर्तागण|
 इन सब में से सबसे अहम् व्यक्ति थे क्रेयल रैड्क्लिफ जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने भारत पाकिस्तान के विभाजन की जिम्मेदारी सौंपी थी| इसविभाजन का जो मुख्य कारणदिया जा रहा था वो था की हिंदू बहुसंख्यक है और आजादी के बाद यहाँ बहुसंख्यक लोग ही सरकार बनायेंगे तब मो. अली जिन्नाह को यह ख्याल आयाकी बहुसंख्यक के राज्य में रहने से अल्पसंख्यक के साथ नाइंसाफ़ी या उन्हें नज़रंदाज़ किया जा सकता तो उन्होंने अलगसे मुस्लिम राष्ट्र की मांग शुरू की| भारत के विभाजन की मांग वर्ष डर वर्ष तेज होती गई|
 भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र के विभाजन की मांग सन 1920 में पहली बार उठाईऔर 1947 में उसे प्राप्त किया| 15 अगस्त 1947 के दिन भारत को हिंदू सिख बहुसंख्यक एवं मुस्लिम अल्पसंख्यकराष्ट्र घोषित कर दिया गया| 1920 से 1932 में भारत पाकिस्तान विभाजन की नीव राखी गई| प्रथम बार मुस्लिम राष्ट्र की मांग अलामा इकबाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में किया था| 1930 में ही मो. जिन्नाह ने सारे अखंड भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में ले लिया और कहा की भारत के मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस मुस्लिम हितोंकी अनदेखी कर रही है|
इसके बाद 1932 से 1942 तक में विभाजन की बात बहुत आगे तक निकल गई थी, हालाँकि हिंदूवादी संगठन हिंदू महासभा देश का विभाजन नही चाहते थे परन्तु वह हिंदू और मुस्लिम के बिच के फर्क को बनाये रखना चाहते थे| सन 1937 में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेसन में वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा की भारत के साजातीय एवं एकजुट राष्ट्र हो सकता है अपितु दो अलग-अलग हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्र के|इन सब कोशिशों के बावजूदभी 1940 में मुस्लिम लीग के लाहोरे अधिवेशन में जिनाह ने स्पष्ट कर दिया की उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए और इस मुद्दे पर लीग ने बिना किसी हीचकीचाहट के बोला की हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धर्म है, अलग रीती-रिवाज, अलग संस्कृति है और ऐसे में दो अलग राष्ट्रों को एकजुट रखना खासकर तब जब एक धर्म अल्पसंख्यक हो और दूसरा धर्म बहुसंख्यक, यह सब कारण अल्पसंख्यक समाज में असंतोष पैदा करेगा और राष्ट्र में और सकारों के कार्य में अवरोध पैदाकरेगा|
सन 1942 से 1946 विभाजन की बात चरमसीमा पर थी और विभाजन की तयारी आखिरी दौर में| 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा “Direct Action Day” बुलाएजाने पर जो हुआ उस घटना से सारे राजनितिक एवं दोनों समुदाय के नेता घबरा गयेथे| इस घटना के कारण उत्तर भारत और खास कर बंगाल ,में आक्रोश बढ़ गया और राजनितिक पार्टियों पर दोनों राष्ट्र के विभाजन का खतरा बढ़ गया| 16 अगस्त 1946 के “Direct ActionDay” को “Great kolkataRiot” के नाम से भी जाना जाता है| 
16 अगस्त 1946को मुस्लिम लीग ने आम हड़ताल बुलाई थी जिसमे मुख्य मुददा था था कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार और अपनी अलग राष्ट्र की मांग की दावेदारी को और मजबूत करना| “Direct Action Day” के हड़ताल के दौरान कलकत्ता में दंगा भड़क गया जिसमे मुस्लिम लीग समर्थकों ने हिन्दुओं एवं सिखों को निशाना बनाया जिसके प्रतिरोध में कांग्रेस समर्थकों ने भी मुस्लिम लीग कर्यकर्तों के ऊपर हमला बोल दिया| उसके बाद यह हिंसा बंगाल से बहार निकल बिहार तक में फ़ैल गई|
 केवल कलकत्ता के अन्दर में 72 घंटे के अन्दर में 4000 लोग मारे गए ओर करीब 1 ,00,000 लोग बेघर हो गए| इन सब के बाद बहुत से कांग्रेसी नेता भी धर्म के नाम पर भारत विभाजन के विरोध में थे| महात्मा गाँधी ने विभाजन का विरोध करते हुए कहा मुझे विश्वास हैकि दोनों धर्म के लोग (हिंदू और मुस्लमान) शांति और सोहार्द बना करएक साथ तेरा सकते हैं| मेरी आत्मा इस बात को अस्वीकार करती है कि हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म दोनों अलग संस्कृति और सिधान्तों का प्रतिनिधित्व करते हैं| मुझे इस तरह के सिधांत अपनाने के लिए मेरा भगवन अनुमति नही देता| 
पर अबतक अंग्रेज अपने मकसद में कामयाब होचुके थे| “Direct ActionDay” के हादसे के बाद सबको लगने लगा था कि अब अखंड भारत का विभाजन कर देना चाहिए| दो नए राज्यों/राष्ट्रों का विभाजन माउन्टबेटेन प्लान के अनुसार किया गया| जुलाई 18, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा “Indian Independence Act” पास किया गया जिसमे विभाजन कि रूप रेखा तैयार कि गई थी, और अंत 1947 में इस ACT को ब्रिटिश संसद अधिकारिक तौर पर पारित किया गया और भारत एवं पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया|

Saturday, 16 September 2017

"चेखव" ने एक कहानी लिखी थी।
एक गांव में एक आदमी इतना "मूर्ख" था, इतना मूढ़ था कि सारा गांव यही मानता था कि अगर कभी पूरे संसार मूर्खो की प्रतिस्पर्धा होगी तो यह आदमी ही प्रथम आएगा।
वह स्वयं भी आश्वस्त था कि वह "महामूर्ख" है। इसीलिये वह लोगों के बीच बात करने से भी डरता था! लोग उसका मुंह खुलते ही बोलते थे, "क्या मूर्खों वाली बात कर दी"!!
बेचारे मुर्खराज बड़े उदास होकर, एक फकीर के पास गए और उनसे पूछा "मैं क्या करूँ?? मैं ऐसा प्रसिद्ध मूर्ख हूं कि मैं कहीं भी एक शब्द नहीं बोल पाता। कुछ बोलते ही लोग चुप करा देते हैं और कहते हैं, "क्या मूर्खता कर रहा है बीच में मत बोला कर, चुप रहा कर!! इस तरह मुझे चुप करा देते हैं।"
फकीर ने कहा, "तुम एक काम करो, आज से किसी भी बात के लिए हां मत कहना। जो भी तुम देखो, उसकी 'निंदा' करना।"
उस मूर्ख ने कहा, "लेकिन वे लोग मेरी सुनेंगे ही नहीं।"
फकीर ने कहा, "तुम इस बात की चिंता ही मत करो। यदि वे कहें कि यह चित्र बड़ा सुंदर है। तो तुम कहना, यह चित्र और सुंदर?? इससे ज्यादा असुंदर चित्र पहले कभी नहीं देखा। यदि वे कहें ये उपन्यास बड़ा मौलिक है। तो तुम कहना, यह सिर्फ पुनरुक्ति है। हजारों बार यही कहानी लिखी जा चुकी है। इसे सिद्ध करने की कोशिश मत करना। सिर्फ हर चीज को इंकार करना, यही आधारभूत दर्शन बना लो। यदि कोई कहे, ये रात बड़ी सुंदर है, चांद बड़ा सुंदर है तो तुम कहना, इसको तुम सुंदरता कहते हो?? वे इसका खण्डन नहीं कर पायेंगे। याद रखना, वे खण्डन को प्रमाणित नहीं कर सकते!!!"
वह आदमी लौट कर वापस गांव गया। उसने हर बात के लिए ना' कहना शुरू कर दिया। एक सप्ताह, में गांव में खबर फैल गई!!
"हम लोग बहुत गलत थे। वह आदमी तो मूर्ख नहीं है। वह तो बड़ा भारी आलोचक है। वह तो प्रतिभावान व्यक्ति है।"
'ना' कहने के लिए किसी "बुद्धिमत्ता" की जरूरत नहीं है।
यदि आप महान प्रतिभाशाली कन्हैया कुमार, उमर खालिद, बुरखा दत्त, रविश कुमार, केजरीवाल या ऐसे ही कामरेड, कम्युनिस्ट, वामी, कांगी .. जैसा बनना चाहते हैं। तो केवल हिंदू धर्म का विरोध करिये, इंकार करिए, "आलोचक" बन जाइए।
किसी भी बात के लिए "हां" कहने की सोचा ही मत करिए।जो कुछ भी कोई "दूसरा" कहे, उसे पूरी तरह से नकार दीजिए।
कोई भी इस बात के विरुद्ध साबित नहीं कर सकता, क्योंकि किसी बात को साबित करना बड़ा कठिन है।
नकार देना सबसे सरल युक्ति है।

असली गुजराती वो होता है .. जो काम के साथ साथ बिजनस भी प्रमोट कर दे ...
मित्रो .. नरेंद्र मोदी रिवरफ्रंट पर शिंजो आबे के साथ जिस कलात्मक सोफे पर बैठे थे .. उसे शंखेडा फर्नीचर बोलते है ...
शंखेडा गुजरात के आदिवासी बहुल जिले छोटा उदयपुर का एक कस्बा है .. जहाँ कई आदिवासी परिवार खराद पर लकड़ी को तराशकर फिर उसपर हाथो से रंगो की खुबसूरत डिजाइन बनाकर सोफे कुर्सी झूले डांडिया आदि बनाने का कार्य करते है ...
एक जमाने में शंखेडा के ये लकड़ी के खराद और खूबसूरत चित्रों से बने फर्निचर काफी बिकते थे .. लेकिन आधुनिकता की दौड़ में ये कला बेहद संकट में आ गयी थी .. अत्याधुनिक इम्पोर्टेड फर्नीचर के आने के बाद शंखेडा का ये कला विलुत्प्त के कगार पर था ..
मोदी ने इसे प्रमोट करने के लिए ये एक अच्छा अवसर चुना और आज शिंजो आबे और मोदी के इस शंखेडा सोफे पर बैठने से देश विदेश में इस कला में लोगो की काफी दिलचस्पी हुई और आज एक लोकल टीवी चैनेल पर देखा की शंखेडा फर्नीचर का काम करने वाले आदिवासी परिवार बेहद खुश है क्योकि उन्हें अब खूब आर्डर मिल रहे है .. जापान की एक कम्पनी ने सैकड़ो सोफे का आर्डर दिया है
सच है .. गुजराती लोग हर मौके को एक बिजनस ओपोर्चुयुनिटी के तौर पर लेते है
Jitendra Pratap Singh 

काला पहाड़ बांग्लादेश

काला पहाड़ बांग्लादेश ! यह नाम स्मरण होते ही भारत के पूर्व में एक बड़े भूखंड का नाम स्मरण हो उठता है ! जो कभी हमारे देश का ही भाग था ! जहाँ कभी बंकिम के ओजस्वी आनंद मठ, कभी टैगोर की हृद्यम्य कवितायेँ, कभी अरविन्द का दर्शन, कभी वीर सुभाष की क्रांति ज्वलितहोती थी ! आज बंगाल प्रदेश एक मुस्लिम राष्ट्र के नाम से प्रसिद्द है ! जहाँ हिन्दुओं की दशा दूसरे दर्जें के नागरिकों केसमान हैं ! क्या बंगाल के हालात पूर्व से ऐसे थे ? बिलकुल नहीं ! अखंड भारतवर्ष की इस धरती पर पहले हिन्दू सभ्यता विराजमान थी! कुछ ऐतिहासिक भूलों ने इस प्रदेश को हमसे सदा के लिए दूर करदिया ! एक ऐसी ही भूल का नाम कालापहाड़ है ! बंगाल के इतिहास में काला पहाड़ का नाम एक अत्याचारी के नाम से स्मरण किया जाता है ! काला पहाड़ का असली नाम कालाचंद राय था ! कालाचंद राय एक बंगाली ब्राहण युवक था ! पूर्वी बंगाल के उस वक्त के मुस्लिम शासक की बेटी को उससे प्यार हो गया ! बादशाह की बेटी ने उससे शादी की इच्छा जाहिर की ! वह उससे इस कदर प्यार करती थी कि उसने इस्लाम छोड़कर हिंदू विधि से शादी करने को तैयार हो गई ! हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को जब पता चला कि कालाचंद राय एक मुस्लिम राजकुमारी से शादी कर उसे हिंदू बनाना चाहता है ! तो उन्होंने कालाचंद का विरोध किया! उन्होंने उस मुस्लिम युवती के हिंदू धर्म में आने का न केवल विरोध किया, बल्कि कालाचंद राय को भी जाति बहिष्कार की धमकी दी ! कालाचंद राय को अपमानित किया गया! अपने अपमान से क्षुब्ध होकर कालाचंद गुस्से से आग बबुला हो गया और उसने इस्लाम स्वीकारते हुए उस युवती से निकाह कर उसके पिता के सिंहासन का उत्तराधिकारी हो गया ! अपने अपमान का बदला लेते हुए राजा बनने से पूर्व ही उसने तलवार के बल पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाना शुरू किया ! उसका एक ही नारा था मुसलमान बनो या मरो! पूरे पूर्वी बंगाल में उसने इतना कत्लेआम मचाया कि लोग तलवारके डर से मुसलमान होते चले गए ! इतिहास में इसका जिक्र है कि पूरे पूर्वी बंगाल को इस अकेले व्यक्ति ने तलवार के बल पर इस्लाम में धर्मांतरित कर दिया ! यह केवल उन मूर्ख, जातिवादी, अहंकारी व हठधर्मी हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को सबक सिखाने के उददेश्य से किया गया था ! उसकी निर्दयता के कारण इतिहास उसे काला पहाड़ के नाम से जानती है ! अगर अपनी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर कुछ हठधर्मी ब्राह्मणों ने कालाचंद राय का अपमान न किया होता तो आज बंगाल का इतिहास कुछ ओर ही होता !सन्दर्भ - भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण-1989 (हिन्दी),भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 91संस्कृति के चार अध्याय: रामधारीसिंह दिनकरपाकिस्तान का आदि और अंत: बलराज मधोक कश्मीर का इस्लामीकरणकश्मीर: शैव संस्कृति के ध्वजावाहक एवं प्राचीन काल से ऋषि कश्यप की धरती कश्मीर आज मुस्लिम बहुल विवादित प्रान्त के रूप में जाना जाता हैं ! 1947 के बाद से धरती पर स्वर्ग सी शांति के लिए प्रसिद्द यह प्रान्त आज शांत नहीं रहा ! इसका मुख्य कारण पिछले 700 वर्षों में घटित कुछ घटनाएँ हैं जिनका परिणाम कश्मीर का इस्लामीकरण होना हैं ! कश्मीर में सबसे पहले इस्लाम स्वीकार करने वाला राजा रिंचन था ! 1301 ई. में कश्मीर केराजसिंहासन पर सहदेव नामक शासक विराजमान हुआ ! कश्मीर में बाहरी तत्वों ने जिस प्रकार अस्त व्यस्तता फैला रखी थी, उसे सहदेव रोकने में पूर्णत: असफल रहा ! इसी समय कश्मीर में लद्दाख का राजकुमार रिंचन आया, वह अपने पैत्रक राज्य से विद्रोही होकर यहां आया था ! यह संयोग की बात थी कि इसी समय यहां एक मुस्लिम सरदार शाहमीर स्वात (तुर्किस्तान) से आया था ! कश्मीर के राजा सहदेव ने बिना विचार किये और बिना उनकी सत्यनिष्ठा की परीक्षा लिए इन दोनों विदेशियों को प्रशासन में महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिये ! यह सहदेव की अदूरदर्शिता थी, जिसके परिणाम आगे चलकर उसी के लिए घातक सिद्घ हुए ! तातार सेनापति डुलचू ने 70,000 शक्तिशाली सैनिकों सहित कश्मीर पर आक्रमण कर दिया ! अपने राज्य को क्रूर आक्रामक की दया पर छोडक़र सहदेव किश्तवाड़ की ओर भागगया ! डुलचू ने हत्याकांड का आदेशदे दिया ! हजारों लोग मार डाले गये ! कितनी भयानक परिस्थितियों में राजा ने जनता को छोड़ दिया था, यह इस उद्घरण से स्पष्ट हो गया ! राजा की अकर्मण्यता और प्रमाद के कारण हजारों लाखों की संख्या में हिंदू लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया ! जनता की स्थिति दयनीय थी ! राजतरंगिणी में उल्लेख है-‘जब हुलचू वहां से चला गया, तो गिरफ्तारी से बचे कश्मीरी लोग अपने गुप्त स्थानों से इस प्रकारबाहर निकले, जैसे चूहे अपने बिलों से बाहर आते हैं ! जब राक्षस डुलचू द्वारा फैलाई गयी हिंसा रूकी तो पुत्र को पिता न मिला और पिता को पुत्र से वंचित होना पड़ा, भाई भाई से न मिल पाया! कश्मीर सृष्टि से पहले वाला क्षेत्र बन गया ! एक ऐसा विस्तृत क्षेत्र जहां घास ही घास थी और खाद्य सामग्री न थी ! सन्दर्भ - राजतरंगिणी,जोनाराज पृष्ठ 152-155 इस अराजकता का सहदेव के मंत्री रामचंद्र ने लाभ उठाया और वह शासक बन बैठा , परंतु रिंचन भी इस अवसर का लाभ उठाने से नही चूका ! जिस स्वामी ने उसे शरण दी थी उसकेराज्य को हड़पने का दानव उसके हृदय में भी उभर आया और भारी उत्पात मचाने लगा ! रिंचन जब अपनेघर से ही बागी होकर आया था, तो उससे दूसरे के घर शांत बैठे रहने की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी ? उसके मस्तिष्क में विद्रोह का परंपरागत कीटाणु उभर आया, उसने रामचंद्र के विरुद्ध विद्रोह कर दिया ! रामचंद्र ने जबदेखा कि रिंचन के हृदय में पाप हिलोरें मार रहा है, और उसके कारणअब उसके स्वयं के जीवन को भी संकटहै तो वह राजधानी छोडक़र लोहर के दुर्ग में जा छिपा ! रिंचन को पता था कि शत्रु को जीवित छोडऩा कितना घातक सिद्ध हो सकता है ? इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम किया और अपने कुछ सैनिकों को गुप्त वेश में रामचंद्र को ढूंढने के लिए भेजा ! जब रामचंद्रमिल गया तो उसने रामचंद्र से कहलवाया कि रिंचन समझौता चाहता है ! वार्तालाप आरंभ हुआ तो छल करते हुए रिंचन ने रामचंद्र की हत्या करा दी ! इस प्रकार कश्मीर पर रिंचन का अधिकार हो गया ! यह घटना 1320 की है ! उसने रामचंद्र की पुत्री कोटा रानी सेविवाह कर लिया था ! इस प्रकार वह कश्मीर का राजा बनकर अपना राज्य कार्य चलाने लगा ! कहते है कि अपने पिता के हत्यारे से विवाह करने के पीछे कोटा रानी का मुख्य उद्देश्य उसके विचार परिवर्तन कर कश्मीर की रक्षा करना था ! धीरे धीरे रिंचन उदास रहने लगा ! उसे लगा कि उसने जो किया वह ठीक नहीं था ! उसके कश्मीर के शैवों के सबसे बड़े धर्मगुरु देवास्वामी के समक्ष हिन्दू बनने का आग्रह किया ! देवास्वामी ने इतिहास की सबसे भयंकर भूल करी और बुद्ध मत से सम्बंधित रिंचन को हिन्दू समाज का अंग बनाने से मना कर दिया !(सन्दर्भ - राजतरंगिणी, जोनराजा पृष्ठ 20-21 )रिंचन के लिए उत्पन्न हुई परिस्थितियां बहुत ही अपमानजनक थी ! जिससे उसे असीम वेदना और संताप ने घेर लिया ! देवास्वामी की अदूरदर्शिता ने मुस्लिम मंत्री शमशीर को मौका दे दिया ! उसने रिंचन को सलाह दी की अगले दिन प्रात: आपको जो भी धर्मगुरु मिले ! आप उसका मत स्वीकार कर लेना ! अगले दिन रिंचन जैसे ही सैर को निकला, उसे मुस्लिम सूफी बुलबुल शाह अजान देते मिला ! रिंचन को अंतत: अपनी दुविधा का समाधान मिल गया ! उससे इस्लाम मेंदीक्षित होने का आग्रह करने लगा !बुलबुलशाह ने गर्म लोहा देखकर तुरंत चोट मारी और एक घायल पक्षी को सहला कर अपने यहां आश्रय दे दिया ! रिंचन ने भी बुलबुल शाह का हृदय से स्वागत किया ! इस घटना के पश्चात कश्मीर का इस्लामीकरण आरम्भ हुआ जो लगातार 500 वर्षों तक अत्याचार, हत्या, धर्मान्तरण आदि के रूप में सामने आया !यह अपच का रोग यही नहीं रुका ! कालांतर में महाराज गुलाब सिंह के पुत्र महाराज रणबीर सिंह गद्दी पर बैठे ! रणबीर सिंह द्वारा धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर हिन्दू संस्कृति को प्रोत्साहन दिया ! राजा के विचारों से प्रभावित होकर राजौरी पुंछ के राजपूत मुसलमान और कश्मीर के कुछ मुसलमान राजा के समक्ष आवदेन करने आये कि उन्हें मूल हिन्दू धर्म में फिर से स्वीकार कर लिया जाये ! राजा ने अपने पंडितों से उन्हें वापिसमिलाने के लिया पूछा तो उन्होंनेस्पष्ट मना कर दिया ! एक पंडित तो राजा के विरोध में यह कहकर झेलम में कूद गया की राजा ने अगर उसकी बात नहीं मानी तो वह आत्मदाह कर लेगा ! राजा को ब्रह्महत्या का दोष लगेगा ! राजा को मज़बूरी वश अपने निर्णय को वापिस लेना पड़ा ! जिन संकीर्ण सोच वाले लोगों ने रिंचन को स्वीकार न करके कश्मीर को 500 वर्षों तक इस्लामिक शासकों के पैरों तले रुंदवाया था, उन्हीं ने बाकि बचे हिन्दू कश्मीरियों को रुंदवाने के लिए छोड़ दिया ! इसका परिणाम आज तक कश्मीरी पंडित भुगत रहे हैं !सन्दर्भ - व्यथित कश्मीर; नरेंदर सहगल पृष्ठ 59 पाकिस्तान के जनक जिन्ना और इक़बाल पाकिस्तान ! यह नाम सुनते ही 1947 के भयानक नरसंहार और भारत होना स्मरण हो उठता हैं ! महाराज राम के पुत्र लव द्वारा बसाई गई लाहौर से लेकर सिख गुरुओं की कर्मभूमि आज पाकिस्तान के नाम सेएक अलग मुस्लिम राष्ट्र के रूप में जानी जाती हैं ! जो कभी हमारे अखंड भारत देश का भाग थी ! पाकिस्तान के जनक जिन्ना का नाम कौन नहीं जानता ! जिन्ना को अलग पाकिस्तान बनाने का पाठ पढ़ाने वाला अगर कोई था तो वो थासर मुहम्मद इक़बाल ! मुहम्मद इक़बाल के दादा कश्मीरी हिन्दू थे ! उनकानाम था तेज बहादुर सप्रु ! उस समय कश्मीर पर अफगान गवर्नर अज़ीम खानका राज था ! तेज बहादुर सप्रु, खानके यहाँ पर राजस्व विभाग में कार्य करते थे ! उन पर घोटाले का आरोप लगा ! उनके समक्ष दो विकल्प रखे गए ! पहला था मृत्युदंड का विकल्प दूसरा था इस्लाम स्वीकार करने का विकल्प ! उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण कर लिया, और अपना नाम बदल कर स्यालकोट आकर रहने लगे(सन्दर्भ -R.K. Parimu, the author of History of Muslim Rule in Kashmir, and Ram Nath Kak, writing in his autobiography, Autumn Leaves ) इसी निर्वासित परिवार में मुहम्मद इक़बाल का जन्म हुआ था ! कालांतर में यही इक़बाल पाकिस्तान के जनक जिन्ना का मार्गदर्शक बना !मुहम्मद अली जिन्ना गुजरात के खोजा राजपूत परिवार में पैदा हुआथा ! कहते हैं उनके पूर्वजों को इस्लामिक शासन काल में पीर सदरुद्दीन ने इस्लाम में दीक्षित किया था ! इस्लाम स्वीकार करने पर भी खोजा मुसलमानों का चोटी, जनेऊ आदि से प्रेम दूर नहीं हुआ था ! इस्लामिकशासन गुजर जाने पर खोजा मुसलमानों के द्वारा भारतीय संस्कृति को स्वीकार करने की उनकी वर्षों पुरानी इच्छा फिर सेजाग उठी ! उन्होंने उस काल में भारत की आध्यात्मिक राजधानी बनारस के पंडितों से शुद्ध होने की आज्ञा मांगी ! हिन्दुओं का पुराना अपच रोग फिर से जाग उठा ! उन्होंने खोजा मुसलमानों की मांग को अस्वीकार कर दिया ! इस निर्णय से हताश होकर जिन्ना के पूर्वजों ने बचे हुए हिन्दू अवशेषों को सदा के लिए तिलांजलि दे दी, एवं उनका मन सदा के लिए हिन्दुओं के प्रति द्वेष और घृणासे भर गया ! इसी विषाक्त माहौल में उनके परिवार में जिन्ना का जन्म हुआ ! जो स्वाभाविक रूप से ऐसे माहौल की पैदाइश होने के कारण पाकिस्तान का जनक बना !(सन्दर्भ - युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे- वीरेंदर संधु। वीरेंदर संधु अमर बलिदानी भगत सिंह जी की भतीजी है)अगर हिन्दू धर्म के ठेकेदारों नेशुद्ध कर अपने से अलग हुए भाइयों को मिला लिया होता तो आज देश की क्या तस्वीर होती ! आप स्वयं अंदाजा लगा सकते है ! अगर सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में ऐसी ऐसी अनेक भूलों को जाना जायेगा तो मन व्यथित होकर खून के आँसू रोने लगेगा ! संसार के मागर्दर्शक, प्राचीन ऋषियों की यह महान भारत भूमि आज किन हालातों में हैं, यह किसी से छुपानहीं हैं ! क्या हिन्दुओं का अपच रोग इन हालातों का उत्तरदायी नहीं हैं ? आज भी जात-पात, क्षेत्र- भाषा, ऊंच-नीच, गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा आदि के आधार पर विभाजित हिन्दू समाज क्या अपने बिछुड़े भाइयों को वापिस मिलाने की पाचक क्षमता रखता हैं? यह एक भीष्म प्रश्न है ? क्यूंकि देश की सम्पूर्ण समस्यायों का हल इसी अपच रोग के निवारण में हैं !एक मुहावरा की "बोये पेड़ बबुल के आम की चाहत क्यों" भारत भूमि पर सटीक रूप से लागु होती हैं !

chintan

"राष्ट्रहित में ही राजनीति की सार्थकता है पर अगर राजनीति राष्ट्रहित का निर्धारण करने लगे तो यह समाज के लिए समस्या होगी; यही वर्त्तमान का संकट है।
राष्ट्र कोई मानचित्र में रेखाओं की परिधि द्वारा परिभाषित भूखंड मात्र नहीं बल्कि सभ्यता, संस्कृति व् संस्कार के सूत्र से बंधे एक समाज को प्रतिबिंबित करती व्याख्या है, ऐसे में, राजनीति का उद्देश्य समाज के विकास में रचनात्मक योगदान होना चाहिए, पर दुर्भाग्यवश, वर्त्तमान की वास्तविकता कुछ अलग है।
भारत विविधताओं का देश है, ऐसे में, अगर व्यवस्था तंत्र का उपयोग समाज में व्याप्त विविधताओं के तुस्टीकरण के लिए होने लगे तो स्वाभाविक है की सामजिक एकता कमज़ोर होंगी। आवश्यकता है की व्यवस्था तंत्र का ध्यान व् प्रयास सामाजिक विविधताओं के बजाये सामाजिक एकता पर केंद्रित हो;
व्यवस्था तंत्र का उपयोग राजनैतिक उद्देश्य और व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं के लिए करना एक नैतिक अपराध से कम नहीं। समाज जब तक सस्ती लोकप्रियता के आधार पर नेतृत्वा क्षमता का निर्धारण करेगा वह कुशल नेतृत्व से वंचित रहेगा।
दिशाहीन राजनीति की दशा एक जागृत समाज ही बदल सकती है, इसीलिए, लोगों का जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि तभी विकास की समझ आर्धिक लाभ तक सीमित न रहकर मानवीय व नैतिक मूल्यों के महत्व को भी सम्मिलित करेगा।"
कांग्रेस देश पर 55 लाख 87 हजार 149 करोड़ का कर्ज छोड़ के गई है...
जिसका 1 वर्ष का ब्याज भरना पड़ रहा है = 4 लाख 27 हजार करोड़ !
यानि 1 महीने का = 35 हजार 584 करोड़ !
यानि 1 दिन का = 1 हज़ार 186 करोड़ !
यानि 1 घंटे का = 49 करोड़ !
यानि 1 मिनट का 81 लाख !
यानि 1 सेकेंड का 1,35,000!
जरा सोचिए ! 

 लूटेरी कांग्रेस की मेहरबानी से प्रति सेकेंड 1 लाख 35 हजार रूपये का तो सिर्फ पुराने कर्जे का ब्याज भर रहा है तो देश के अच्छे दिन आसानी से कैसे आएंगे और फिर भी कुछ लोगों को पेट्रोल टमाटर सस्ते चाहिए
 भले भारत फिर गुलाम हो जाये..
कुमार अवधेश सिंह
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Friday, 15 September 2017

हिन्दू पेट्रोल का दाम देख रहा है.......। 
मोदी को कोस रहा है।
उधर ,,,,,,,,,,
मुसलमान 
रोहिंग्या मुसलमान के लिए मोदी को कोस रहा है ।
.....बस यही अन्तर है ।
डेड़ सयाने हिन्दू और कट्टर मुसलमानों में ।
 Kumar Joshi
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Nishant Singh is feeling crazy.
55 mins
जिस देश की जनता को शौचालय का महत्व समझने में 70 साल लग गए साहब ,उसको देश हित के बाकी महत्व समझाना चींटी की नाक में नकेल डालने के बराबर है हुजूर ।

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