Friday, 17 November 2017

 खुशखबरी !

 'निशाने पर नरेंद्र मोदी: साजिश की कहानी-तथ्यों की जुबानी' को नये रूप में सामने लाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक के साथ अभी-अभी एग्रीमेंट साइन किया है। यह बिल्कुल नयी और इससे भी वृहत किताब होगी, जिसका कालखंड, विषयवस्तु और खुलासे आपको चौंका देंगे!

पहली बार किसी पुस्तक के जरिये गांधी परिवार-न्यायपालिका-NGO-Media-इंटरनेशनल फंडिंग व इंटेलिजेंस एजेंसी के गठजोड़ को दस्तावेजों के जरिए आम जनता के समक्ष रखा जाएगा। इसका कालखंड पीएम नेहरू के कार्याकाल से लेकर पीएम मोदी के कार्यकाल का फैला होगा। हिंदी के साथ यह पुस्तक अंग्रेजी में भी होगी ताकि देश सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को बर्बाद करने वालों का चेहरा बेनकाब हो सके।

 जुलाई-अगस्त तक यह पुस्तक आपके हाथों में होगी। देखिए, मैंने अपनी सरवाइकल की दर्द की परवाह न करते हुए आपके द्वारा लगातार गांधी परिवार व उनके चाकरों द्वारा की गई साजिशों का खुलासा करती पुस्तक की मांग का ख्याल रखा है, अब आपको 2019 चुनाव से पहले इस लुटियन बिरादरी की आगामी साजिशों को बेनकाब करने के लिए इसे हर घर पहुंचाना होगा।

क्या आप इसे 10 लाख लोगों तक ले जाने के अभियान में अपना योगदान देंगे ? 10 लाख लोग यानी 5-6 करोड़ राष्ट्रवादी वोटर ! तात्पर्य समझ रहे हैं न आप? अभी के 17 करोड़ वोटर + 6 करोड़ वोटर यानी 'लुटियंस साजिश' धड़ाम... 

Mission2019

Sandeep Kumar Deo
जौहर पर लांछन लगा दिया है गुंडे नीच मवाली ने
पद्मिनी की मर्यादा को .. ...ललकारा है भंसाली ने
जहाँ स्त्रियों की लज्जा ही गरिमा की परिचायक है
खिलजी संग पदमा का जुड़ना सच में पीड़ादायक है
चलचित्रों पर दिखने वाले बस घर के मूषक होते हैं
नीच, निकम्मे, चरित्रहीन सब भांड विदूषक होते हैं
जाकर अपनी माँ - बहनों पर फिल्में बनाये भंसाली
खूब नचाये नग्न दीपिका, रणवीर से बजवाये ताली
यूँ भी भांड नचनियां सब सम्मान का सौरभ क्या जानें
खुद बाप भगोड़ा हो जिसका वो स्त्री गौरव क्या जानें
जोधा अकबर का झूठ गढ़ा फिर भी हिन्दू खामोश रहा
हर द्रोही को पूज्य दिखाया फिर भी ठंडा जोश रहा
बहुत सह लिया हमनें पर अब प्रतिकार जरूरी है
गद्दारों की छाती पर चढ़ कर करना वार जरूरी है
सारी दुनियां को याद रहे हम मर्यादा के रक्षक हैं
पर यदि अपनी पर आ जाएँ तो कालों के भक्षक हैं
अब हम अपने गौरव का ...अपमान नहीं होने देंगे
राजपूत अब हिजड़ों का मिथ्यागान नहीं होने देने
भांड-नचनियों को अपना इतिहास नहीं छलने देंगे
चाहे जान चली जाये पर फिल्म नहीं चलने देंगे
हिन्दू गौरव है अमर, इसे अभिशाप नहीं होने देंगे
सुनो समीक्षा कहती है ....अब पाप नहीं होने देंगे
सौगंध तुम्हें है राखी की अब मत सुनना गाली को
मिले जहाँ सौ जूते मारो, हर फ़िल्मी भंसाली को
_______________©® समीक्षा सिंह जादौन

kya is bakavas ko bhi sach banaenge..?

 सहारनपुर देवबंद के एक मौलाना के उस बयान सुनकर होश ही उड़ गया जिसमें वह बहुत ही बेशर्मी से कह रहा था कि- "बद्रीनाथ हिंदूओं का मंदिर नही ब्लकि मुसलमानों का मजार है-" ...बद्रीनाथ हिन्दुओ का नहीं है, नाथ लगा देने से वो हिन्दू नहीं हो जाता, बद्रीनाथ असल में बदरुद्दीन शाह की मजार है  क्या यह बयान किसी भी दृष्टि से क्षम्य हो सकता है.? 
अगर बद्रीनाथ बदरूद्दीन के नाम पर रहता तो फिर फिर स्कंदपुराण में--" कृते मुक्तिप्रदाप्रोक्ता, त्रेतायां योग सिद्धिदा। विशाला द्वापरे प्रोक्ता, कलौ बद्रिकाश्रम।" और वाराह पुराण में --श्री बदर्याश्रमं पुण्यं यत्र यत्र स्थितः स्मरेत।स यति वैष्णवम स्थानं पुनरावृत्ति वर्जितः --का उल्लेख रहता ? जिस बद्रीनाथ का भारत के कई पुराण और महाभारत में बद्रीनाथ का भुगोल और नाम के साथ उल्लेख है उस बद्रीनाथ पर इतना बड़ा लांक्षण...?.सच तो यह है कि बद्रीनाथ महाभारत काल से ही भारत का महान तिर्थ है जो महाभारत के इस श्लोक से ज्ञात होता है---"
अन्यत्र मरणामुक्तिः स्वधर्म विधिपुर्वकात।
बदरीदर्शनादेव मुक्तिः पुंसाम करे स्थित।
 वह मौलाना बताए पहाड़ पर इस्लाम कब पहुंचा ? इतिहास इस बात का साक्षी है --"पहाड़ पर भारतीय राजा राज्य करते रहें।इसे विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी कभी जीत ही नही सकें।
एक बार मोहम्मद तुगलक ने पहाड़ जीतने का प्रयास किया था। तुगलक ने 1337-38 में कूर्माचल-कुमायु -गढवाल जैसे पहाड़ी राज्य को जितने के लिए खुसरो मलिक के नेतृत्व में 1 लाख सेना भेजी किंतु क्षत्रीय राजा त्रिलोकचन्द्र चन्द्रवंशी ने चतुर नीति अपना कर घाटीयों,संकरे मार्ग और गुफाओं मे अपने छिपे अपने सैनिकों से तुगलक के 90 हजार सैनिकों को मार डाला था तब खुसरो मलिक बचे हुए 10 हजार सैनिकों के साथ जान बचाकर भागा था।
मोहम्मद तुगलक के इस करारी हार को इब्नबतूता बरनी और एसामी तदा जैसे मुस्लिम इतिहासकारों ने ही अच्छा खासा वर्णन किया है।इस करारी हार के बाद किसी भी मुस्लिम आक्रमणकारी ने उत्तराखंड के पहाड़ की ओर देखने तक की हिम्मत नही की।
मंदिर का वर्तमान स्वरूप जो है उसे आदि शंकराचार्य जी ने बनाया है। उनका समय ईसा से 500-550 वर्ष पहले रहा है जबकि इस्लाम 6 ठी सदी में पैदा हुआ है। शंकराचार्य के समय तो इस्लाम मजहब अपने मां के गर्भ में भी नही था। इस्लाम देवभूमि के पहाड़ पर पहुंचा ही नही तो वहां मजार कैसे आ गया ?

नक्सलियों की धमकी:

 पत्रकारों और वन मंत्री गागड़ा को जान से मार देंगे...

बीजापुर। जिले के आवापल्ली थाना क्षेत्र में एक नक्सली पर्चा और बैनर बरामद हुआ है जिसमें पत्रकारों को जान से मारने का फरमान जारी किया गया है। माओवादियों के दक्षिण बस्तर सचिव हिड़मा के नाम से जारी इस पर्चे मे पुलिस-नक्सल मुठभेड़ों की मीडिया कव्हरेज पर आपत्ति दर्ज करते हुए नक्सलियों ने पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी है।
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लंदन की बसों पर लगे
‘आजाद बलूचिस्तान’ के पोस्टर ...


आजाद बलूचिस्तान के लिए अभियान चला रहे कार्यकर्ताओं ने लंदन की बसों पर विज्ञापन अभियान का एक नया दौर शुरू किया है. उनका उद्देश्य इस अशांत प्रांत में पाकिस्तान सरकार द्वारा मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के खिलाफ जागरूकता फैलाना है. ‘वर्ल्ड बलूच आर्गेनाइजेशन’ ने कहा है कि ताजा अभियान में लंदन की 100 से अधिक बसों पर ‘आजाद बलूचिस्तान’, ‘बलूच लोगों को बचाओ’ और ‘जबरन लोगों को लापता करना रोको’ - जैसे नारे वाले विज्ञापन देखने को मिलेंगे.

 बलूच लोगों की दलील है कि वे लोग मूल रूप से और सांस्कृतिक रूप से शेष पाकिस्तान से अलग हैं और बरसों से एक आजाद राष्ट्र के लिए अभियान चला रहे हैं. वहीं, पाकिस्तान ‘आजाद बलूचिस्तान’ के किसी विचार को संप्रभुता पर हमला बताता है...संगठन के प्रवक्ता भवल मंगल ने बताया, ‘‘बलूचिस्तान में पाकिस्तान के मानवाधिकार उल्लंघन और बलूच लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को लेकर हमारे लंदन अभियान का यह तीसरा चरण है. हमने टैक्सी में विज्ञापनों से शुरूआत की, फिर सड़कों के किनारे बिलबोर्ड लगाए और अब लंदन की बसों पर प्रचार कर रहे हैं.’’ मंगल ने दावा किया कि पाकिस्तान सरकार ने ‘ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन’ पर इस बात को लेकर दबाव डाला कि वह लंदन परिवहन पर विज्ञापनों पर पाबंदी लगाए, लेकिन उसकी धौंस पट्टी नाकाम रही. उन्होंने कहा कि यह शांतिपूर्ण विज्ञापन अभियान है.

ब्रिटिश मानवाधिकार कार्यकर्ता पीटर टैशेल ने समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि उन्हें रोकने की पाकिस्तान की कोशिश ‘सेंसरशिप’ और ‘ लोकतंत्र विरोधी’ है. उन्होंने आरोप लगाया कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान का सख्त शासन इतना निर्मम है कि यह पत्रकारों, मानवाधिकार निगरानीकर्ताओं और राहत सहायता एजेंसियों को क्षेत्र में जाने की इजाजत नहीं देगा.
(इनपुट - भाषा)

एक थे मुस्तफा अक्कड ! जन्म तो सिरिया मे लिया था लेकिन कहलाते सिरियन-अमेरिकन थे |
1976 मे इस्लाम पर एक फिल्म बनाने की सोची | लेकिन इतनी हिम्मत तो थी नही | पुरी स्टोरी लेके के जगह जगह घूमते रहे |
अल-अझार विश्वविद्यालय , मिस्र ने सायद स्टोरी पढी और फिल्म बनाने की अनुमति कुछ शर्तो पर दे दी | लेकिन विश्व मुस्लिम लीग , सऊदी अरब ने अनुमति नही दी |
तमाम आर्थिक कठिनाईयों के बावजूद आखिर मे फिल्म तैयार की गई | फिल्म का नाम रखा गया " अल-रिसाला ( अंग्रेजी मे " द मैसेज ) |
फिल्म का प्लाट पैगम्बर मुहम्मद साहब के जन्म से लेकर उनके मक्का विजय तक थी |
इस फिल्म मे भारत के ए.आर. रहमान ने संगीत दिया था |
फिल्म का निर्माण जिन शर्तो पर था वो ये थी कि , पैगम्बर मुहम्मद , उनकी पत्नियों , बेटी , दामाद , व प्रथम खलीफा अबू बकर के शक्ल और संवाद नही होंगे | यानी कोई कलाकार इन लोगो किरदार को चित्रित नही करेगा नही इन्हे दिखाया जायेगा |
🚫और ऐसा हुआ भी | कोई भी विवास्पद कंटेंटस नही थे । इस्लामिक निर्देशों के अनुसार ही फिल्म बनी थी ! 🚫
खैर फिल्म बन गई और रिलीज हो गई । योरोप अमेरिका सहित मुस्लिम देशों मे फिल्म दिखाई जाने लगी |
2008 मे किसी ने "अल- रिसाला " फिल्म को हिंदी व उर्दू मे डब करके भारत मे रिलीज करने की सोची | हैदराबाद मे एक थियेटर मे स्क्रीनिंग रखी गई लेकिन हैदराबाद मे शान्ति दूतों का हंगामा शुरू हो गया | जम के हंगामा हुआ | हाँ इस बीच वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लडने वाले सिकुलर - लिबरल योद्धा कही बिल मे छुप गये । बुरके मे ही सायद घर से मिकलते थे ?
मजलिस-ए-इत्तेहादुल मसलमीन के नेता अकबरूद्दीन ओवैसी भी कहाँ पीछे रहते | मामले को राज्य की विधान सभा मे उठा दिया |
राज्य के गृह मंत्री के.जेना रेड्डी ने सदन मे वादा किया कि " फिल्म के विषय वस्तु का अध्ययन किया जायेगा और फिल्म की तब तक स्क्रीनिंग नही की जायेगी जब तक मुस्लिम धर्म गुरू और मुस्लिम नेता इसे देख नही लेते और अनुसमर्थन नही दे देते |


फिर क्या था अंधेरी के एक थियेटर ने प्राईवेट स्क्रीनिंग रखी गई । तमाम मुस्लिम नेता , उलेमा आदि बुलाये गये और फिल्म देखा | मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष ने भी देखा ....एप्रूव किया | इसके बाद फिल्म की स्क्रीनिंग हुई 
पता नही कितने लोगो ने देखी थी इस फिल्म को लेकिन मैने तो C.D ला के देखी थी | अब ये नही बता सकता कि C.D. पाईरेटेड थी या नही |
अब प्रश्न ये है कि जब फिल्म को पहले ही इस्लामिक राष्ट्रो मे अनुमति दी जा चुकी थी ..और मिस्र के विश्वविद्यालय के एप्प्रूवल से बनाई गई थी तो ..भारत मे स्क्रीनिंग होने के पहले हंगामा क्यु ? 
और उस समय ये लिबरल , सिकुलर और वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पुरोधा किस बिल मे छुप गये थे ??
फिर सैंसर बोर्ड तो उस समय भी था ...?
" रानी पद्ममावती " फिल्म के विवाद के मूल मे बस यही है कि ..राजपूत मांग कर रहे है कि फिल्म की रिलीज के पहले कम से कम राजपूत के कुछ नेताओं या राज घरानों को फिल्म दिखा दिया जाये ..??
संजय लीला भंसाली व उनके समर्थक बस एक तर्क दे रहे है कि ..हम सैंसर बोर्ड के प्रति जबाव देह है ? प्राईवेट स्क्रीनिंग नही करेंगे ?
जब "अल-रिशाला " जैसी फिल्मों की प्राईवेट स्क्रीनिंग के लिये राज्य के गृह मंत्री सदन मे तैयार हो जाते है ...डिस्ट्रीब्युटर तैयार हो जाते है ..तो " पद्मावती " की क्यु नही ?
जब एक बार विवाद सुलझाने के लिये कोई "प्रथा " चला दिया तो ...दूसरी बार क्यु नही ??
अब जब प्रथा चला दिया राजकीय संस्थाओ के सहयोग से , तो इसे भी विधि का बल प्राप्त होगा ही ? तो पद्मावती का भी कराईये प्राईवेट स्क्रीनिंग !?
य़े धर्म के आधार पर भेद भाव क्यु ?
और राज्य मे शांति बहाली के लिये गृह मंत्री लोग अब क्या कर रहे है ?? क्यु नही के.जेना. रेड्डी की तरह राजपूत नेताओ को अश्वासन देते ?? प्राईवेट स्क्रीनिंग करा कर विवाद खत्म करे ?
और अगर भंसाली प्राईवेट स्क्रीनिंग के लिये तैयार नही होते तो ...शान्ति भंग के लिये वो खुद जिम्मेदार होंगे ?
और ये जो कथित सिकुलर लिबरल लोग है "अल-रिशाला " के समय पर बिल मे क्यु छुप जाते है ?
बेहतर है वो इस बार भी मुद्दे से दूर रहे ..क्युकि तुम्हारा सुविधा जनक विरोध ही क्ट्टरता का कारण है ..?
{Kumar Pawan -Sabhar}

Thursday, 16 November 2017

आपको मालूम चला ??... केरल के मुसलमानों को वहाँ के वामपंथी सरकार के सानिध्य मे , केरल के हीं एक मुस्लिम संगठन #PFI के जरिये #ISIS का संदेशा आया है -- और वो संदेश कुरान के आदेशानुसार गैर मुसलमानों को मार डालने का है ।....... इन गद्दार भारतीय मुसलमानों को वहाँ से अलग-अलग उपाय बताए गए हैं #जेहाद के । #साभार : - #Zee_News
....................... और इस बार निशाना है #कुंभ_मेला के दौरान पानी में जहर मिला देना , #ट्रक_जेहाद मे ट्रक लेकर भीड़ में घुस जाना , चाकू-छूरी कैसे भी करके हिन्दुओं को मारना ।
...................................... जो भारतीय मुसलमान खुद की पीठ थपथपाते हैं ,,, किसी मुस्लिम संगठन ने उस #पीएफआई नामक जेहादी संगठन का विरोध किया ?? .... किसी सेक्यूलर गैंग वालों ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया दी ??
.................... देंगे भी नहीं ,, क्योंकि वे तो हमेशा से यही करते आए हैं ,, आगे भी यही करते रहेंगे।.... क्योंकि सेक्युलरिज्म की ये अनिवार्य कसौटी है।
जो भारतीय मुसलमान इस जेहादी संगठन का विरोध करने की जुर्रत करेगा वो पहले तो काफिर कहलाया /ठहराया जायेगा और साथ न देने पर पहले उसे ही सल्टा दिया जायेगा । ऐसा ही चल रहा है कब से ।
.............. चूंकि आप और हम मुर्ख हैं ,, वे हमारी मुर्खता का जमकर फायदा उठाते हैं ।.... हम पता नहीं किन दरिंदों से भाईचारे की उम्मीद पाले बैठे हैं ।..................................... अगर नहीं समझें तो आपको और हमको इसकी कीमत चुकानी हीं पड़ेगी ।
#आज_ना_कल...✍️
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस को केवल इसलिए विदेशी फंडिंग होती थी कि वह 
दुनिया में भारत को कम्युनल कंट्री साबित करे ..!



रिपब्लिक टीवी का स्टिंग ऑपरेशन ने न्याय पालिका में छोटे छोटे स्तर पर व्याप्त भ्रस्टाचार का खुलासा किया है ऐसा नहीं कि भ्रस्टाचार की जड़ें अभी उगी है बल्कि यह न्यायव्यस्था में गहरी पैठ बना चुकी है!

जस्टिस आलम इस कड़ी में पहला नाम है जिन्हे केवल इसलिए विदेशी फंडिंग होती थी कि वह दुनिया में भारत को कम्युनल कंट्री साबित करे और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सजा दे! सिर्फ इतना नहीं अपने पद की गरिमा को ताख पर रख अपनी बेटी को भी आर्थिक मदद दिलवाई और सुप्रीम कोर्ट को उनके इस कृत्य पर माफ़ी मांगनी पड़ी।http://www.indiaspeaksdaily.com/curruption-and-justice-in-indian-judiciary-system/

Wednesday, 15 November 2017


#शहीद_बिरसा_मुंडा
(15 नवंबर 1875 से 9 जून 1900)
बिरसा मुंडा 19वीं सदी के एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में मुंडाओं के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजते हैं।
#आरंभिक जीवन
सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म १५ नवम्बर १८७५ को झारखंड प्रदेश मेंराँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। साल्गा गाँव में प्रारम्भिक पढाई के बाद वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने आये। इनका मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। उन्होंने मुंडा लोगों को अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिये अपना नेतृत्व प्रदान किया। १८९४ में मानसून के छोटा नागपुर में असफल होने के कारण भयंकर अकाल और महामारी फैली हुई थी। बिरसा ने पूरे मनोयोग से अपने लोगों की सेवा की।
#मुंडा विद्रोह का नेतृत्‍व
1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।
#विद्रोह में भागीदारी और अन्त
1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं।
जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये।
बिरसा ने अपनी अन्तिम साँसें 9 जून 1900 को राँची कारागार में लीं। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है।
बिरसा मुण्डा की समाधि राँची में कोकर के निकट डिस्टिलरी पुल के पास स्थित है। वहीं उनका स्टेच्यू भी लगा है। उनकी स्मृति में रांची में बिरसा मुण्डा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा भी है।
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।। हम बिरसा को भगवान क्यों मानते हैं ।।
15 नवम्बर 1875 में झारखंड क्षेत्र में एक साधारण जनजाति परिवार में जन्म लेकर बकरियाँ चराने में बिरसा का बचपन बीता । बिरसा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके मन में भी पढ़ने की ललक जगी और वहीं चाईबासा के ईसाई मिशन स्कूल में दाखिला ले लिया । परंतु स्कूल में बिरसा के पहनावे को लेकर पादरियों ने मजाक उड़ाया । इस पर बिरसा ने भी पादरियों और उनके धर्म का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया । ईसाई धर्म प्रचारक इसको कहाँ सहन करने वाले थे, उन्होंने बिरसा को स्कूल से निकाल दिया ।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बिरसा के पिता सुगना मुंडा तथा उनके चाचा, ताऊ सभी ईसाई धर्म ग्रहण कर चुके थे और जर्मन ईसाई धर्म प्रचारकों के सहयोगी के रूप में काम करते थे । ऐसे में बिरसा के अंदर मिशनरियों के विरुद्ध रोष पैदा होना किसी चमत्कार से कम नहीं था ।
स्कूल छोड़ने के बाद बिरसा के जीवन में नया मोड़ आया । स्वामी आनन्द से उनका संपर्क आया और उसके बाद बिरसा ने महाभारत और हिन्दू धर्म का ज्ञान हुआ । यहीं से 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएं घटी कि बिरसा के स्पर्श मात्र से लोगों के रोग दूर होने लगे ।
किसानों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाकर बिरसा ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध बिगुल फूँक दिया । लोगों को मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी । जन सामान्य में बिरसा के प्रति दृढ़ विश्वास और अगाध श्रद्धा ने उन्हें भगवान का अवतार बना दिया ।
सही भी था । लोगों को शोषण और अन्याय से मुक्त कराने का काम ही तो भगवान करते हैं, वही काम विरसा ने किया । बिरसा भगवान के उपदेशों का असर समाज पर होने लगा और और जो #मुंडा ईसाई बन गए थे वे पुनः हिन्दू धर्म में लौटने लगे ।
ईसाई प्रचारकों को ये कहाँ सहन होने वाला था, उन्होंने ब्रिटिश सरकार को कहकर बिरसा को भीड़ इकट्ठी कर उन्हें आन्दोलन करने से मना कर दिया । लैकिन बिरसा नहीं माने और उन्होंने शोषण के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा । उन्हें गिरफ्तार कर लिया और दो साल तक #हजारीबाग जेल में रखा । समाज में गुस्सा बढ़ते देख उन्हें यह कहकर छोड़ा गया कि वे ईसाइयों के खिलाफ प्रचार नहीं करेंगे ।
बिरसा नहीं माने, उन्होंने संगठन बनाकर अपने धर्म का प्रचार जारी रखा । परिणामस्वरूप स्वरूप उन्हें फिर गिरफ्तार करने के आदेश जारी हुए, किन्तु बिरसा इस बार हाथ नही आये और उन्होंने अपने नेतृत्व में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंककर नए राज्य की स्थापना का निश्चय कर लिया ।
24 दिसम्बर 1899 में उन्होंने सीधा आंदोलन प्रारम्भ कर दिया । अंग्रेजी शासन के कई पुलिस थानों में आग लगा दी । सेना से सीधी मुठभेड़ हो गई । खूब संघर्ष किया, परंतु तीर कमान कब तक गोलियों का सामना कर पाते । बिरसा के कई साथी शहीद हो गए ।
और वही दुर्भाग्य ....समाज के ही दो लोगों ने धन के लालच में बिरसा को गिरफ्तार करवा दिया । जहाँ जेल में अंग्रेजों ने उन्हें भोजन में जहर देकर मार दिया ।
बिरसा वीरगति को प्राप्त हुए और पूरे झारखंड क्षेत्र तथा बाद में उनकी वीरता के किस्से सारे देश भर में साहित्य और लोकगीतों के माध्यम से गूँजने लगे ।
बोलो #बिरसा_भगवान की जय ।
#भारत_भारती में आज बिरसा भगवान की जयन्ती मनाई गई ।


Tuesday, 14 November 2017

महाराज रणजीत सिंह जी और उनकी धर्मपरायणता
यह महाराजा रणजीत सिंह जी की सेना का ध्वज है। रक्त वर्ण के ध्वज के मध्य में अष्टभुजा जगदम्बा दुर्गा, बायें हनुमान जी और दायें कालभैरव विराज रहे हैं। पठानों की छाती फ़ोड़ कर अक्टूबर 1836 को ख़ैबर के जमरूद के किले पर यही पवित्र ध्वज फहराया गया था।
यह ध्वज कुछ समय पूर्व शायद सिदबी द्वारा लंदन में नीलाम किया गया था। अब किसी के व्यक्तिगत कलेक्शन का हिस्सा है।
ये स्थापित सत्य है, महराजा रणजीत सिह हिन्दू देवी देवताओं मे अगाध श्रद्धा रखते थे, अपनी वसीयत मे उन्होंने कोहिनूर हीरा जगन्नाथ मन्दिर मे चढाने की इच्छा जतायी थी
स्वर्ण मंदिर नाम है ..स्वर्ण गुरुद्वारा नहीं .... इसी में बहुत कुछ निहित है
1984 से पहले स्वर्ण मंदिर में भी दुर्गा जी की प्रतिमा रखी थी।
परिक्रमा में अनेकों देवी-देवताओं की प्रतिमाएं थीं। हरि मंदिर तब महंत सम्हालते थे मगर यह 70-80 वर्ष से अधिक पुरानी बात है
इससे दो बाते सामने आती एक माहारजा रणजीत सिंह जी सनातनी तो थे हि और अगर सिख थे तो तब तक सिख हिन्दु सनातन संसकृती को मानते थे ज़िस्से पता चलता है की सिख हिन्दु धर्म का हि एक पंथ है ज़िस्से खालिस्तानियो ने बिगाड दिया है
महाराजा रंजीत सिंह जी को सिख संगत सिख बताती हैं। सत्य यह है कि महाराजा रंजीत सिंह जी केवल सिखों के नहीं अपितु समस्त हिन्दू समाज के रक्षक थे। महाराजा रंजीत सिंह जी के झंडे में शूरता की प्रतीक चंडी देवी, बल और ब्रह्मचर्य के प्रतीक वीर हनुमान बजरंग बली और शत्रुओं को रुलाने वाले काल भैरव का चित्र अंकिता था। अफगानिस्तान के शासक शाहशुजा ने महाराजा रंजीत सिंह के समक्ष अपने राज्याधिकार को वापिस दिलाने की जब अपील की थी तब महाराजा रंजीत सिंह जी ने दो शर्तें उनके समक्ष रखी थी। पहली की वे अपने राज्य में गौहत्या पर प्रतिबन्ध लगाए। दूसरी की सोमनाथ मंदिर से लूटे गए विशालकाय कवाड़ वापिस किये जाये। रणजीत सिंह जी ने जहां अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को स्वर्ण से मंडित किया था वहीं पूरी के जगन्नाथ मंदिर और बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दान देकर अपने कर्त्तव्य का निर्वाहन भी किया था।
आज के अलगाववादी सिखों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

क्या है इल्लुमिनाती का रहस्य, क्या ये धरती पर राज करते हैं ?

सेक्रेट सोसाइटीज पर जब भी चर्चा होती है उसमें इल्लुमिनाती का नाम अवश्य लिया जाता है, कई विद्वान इल्लुमिनाती को ही दुनिया की सभी समस्याओं की जड़ मानते हैं, कईयों का कहना है कि, आधुनिक विज्ञान और खोजों के पीछे काफी हद तक इल्लुमिनाती से जुड़े लोगों का ही हाथ था, कई फिल्मों में भी इल्लुमिनाती का जिक्र हुआ है ...
आजकल ये नाम काफी सुनने को मिलता है. दुनिया भर के कई विद्वान पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान को लेकर हुयी चमत्कारिक तरक्की एवं दुनिया की ज्यादातर समस्याओं के लिए काफी हद तक ‘इल्लुमिनाती’ को जिम्मेदार मानते हैं. हालाँकि इल्लुमिनाती या इससे जुड़े प्रभावों को मानने वालों की संख्या काफी नगण्य है. ज्यादातर लोग इसे Conspiracy Theorists की गप मानकर चलते हैं.अगर बात करें ‘इल्लुमिनाती’ की तो इल्लुमिनाती के बारे में बताया कम बल्कि डर और भ्रम ज्यादा फैलाया गया है. ऐसा भी देखा गया है जहाँ Conspiracy Theorists को किसी साजिश के सबूत नहीं मिलते वहां वे ‘इल्लू’ का नाम लेकर काम चला लेते हैं. जिस कारण सत्य थोड़ा दूर हो जाता है और उनकी विश्वसनीयता घटती है.

इल्लुमिनाती को ज्यादातर लोग एक सेक्रेट सोसाइटी मानते हैं. हालांकि वो गलत नहीं हैं लेकिन फिर भी सत्य से जरा दूर हैं. इल्लुमिनाती कोई सेक्रेट सोसाइटी या संस्था नहीं है बल्कि एक ‘माहौल’ का नाम है. जिसके लिए दुनिया की अनेक संस्थाएं और ग्लोबल माफिया काम करते हैं.

Illuminati शब्द लैटिन के Illuminatio से लिया गया है. Illuminati = Illumination अर्थात प्रकाशित (ज्ञात हो कि हमारे देश भारत का अर्थ भी ‘प्रकाशित’ ही होता है) लेकिन फर्क यह है कि Illuminati दानवी शक्तियों का प्रकाश है और भारत दैवीय शक्तियों का.

इल्लुमिनाती नामक सेक्रेट सोसाइटी को बल देने में उपन्यासों और फिल्मों का भी काफी योगदान रहा है. डा विंची कोड, एंजेल्स एंड डेमांस और इन्फर्नो जैसी फिल्मों में इल्लुमिनाती के बारे में काफी कुछ बताया गया है. इन फिल्मों की माने तो आधुनिक विज्ञान के पीछे इल्लुमिनाती से जुड़े लोगों का हाथ है. महान लेखक Dan Brown जैसे ज्यादातर विद्वान इल्लुमिनाती को वैज्ञानिकों की ही गुप्त संस्था मानते हैं.

Dan Brown अपने उपन्यास में बताते हैं, इल्लुमिनाती के लिए कार्य रहे लोगों का मुख्य लक्ष्य हमेशा से ही प्राचीन संस्कृतियों को समाप्त कर विज्ञान को स्थापित करना रहा है. एंजेल्स एंड ड़ेमोंस में जो की Dan Brown के उपन्यास पर ही आधारित है उसमें बताया गया है कि, महान वैज्ञानिक गैलीलियो भी एक इल्लुमिनाती थे जो चर्च के पाखंडो के विपरीत विज्ञान और तर्क को स्थापित करने में लगे थे.

चूँकि भारत जैसे देश धर्म और अध्यात्म की धरती रहे हैं जहाँ विज्ञान एवं भौतिकतावाद की कोई जगह नहीं रही है इसलिए कहा जाता है की भारत को समाप्त करना इल्लुमिनाती के मुख्य लक्ष्यों में से एक रहा है जिसके लिए वे सैकड़ों वर्षों से कार्यरत हैं और काफी हद तक सफल भी हो चुके हैं.

दानवी शक्तियों ने लगभग पूरी दुनिया में कब्जा जमाया और हर जगह सफलता प्राप्त की, आस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका में करोड़ों लोगों का नरसंहार किया और वहां के मूलनिवासियों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया क्योंकि वो ऐसे लोग थे जो इल्लुमिनाती के वैज्ञानिक समाज में फिट नहीं बैठते थे. यही कारण है कि, कुछ लाख यहूदियों के नरसंहार की चर्चा आज पूरी दुनिया में होती है लेकिन करोड़ों आदिवासियों के नरसंहार के बारे में कोई बात तक करना नहीं पसंद करता.कारण पता किया जाय अगर कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया तो सब कुछ साफ़ हो जाता है. लेकिन वो भारत के साथ ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि भारत की बाजुएँ इतनी मजबूत थीं कि आमने सामने की लड़ाई में इस धरती पर कोई उनसे नहीं टकरा सकता था. भारतीय धर्म और अध्यात्म के साथ ही विज्ञान का भी अद्भुत संगम थे. जबकि भारत में भी करोड़ों लोगों का मात्र ब्रिटिशकाल में ही नरसंहार हो गया था फिर भी आजतक वे कभी भारत की रीढ़ नहीं तोड़ पाए.

इस कारण दानवी शक्तियों ने नई ‘स्ट्रेटेजी’ अपनाई. तरह तरह की युक्तियाँ लगाकर भारत को बर्बाद करने की. ब्रिटिश और यूरोपीय आक्रांता भी एक ख़ास साजिश के तहत भारत आये. अगर उन्हें भारत को मात्र लूटना होता या भारत के संसाधनों का दोहन करना होता तो वे कभी भी भारत की जड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाते.

लेकिन उन्होंने पहले भारत की संस्कृति खत्म की, शिक्षा व्यवस्था खत्म की, गरीबी भुखमरी को जन्म दिया, भारत के उद्दोग धंधे बर्बाद किये, इतिहास खत्म किया, फर्जी इतिहास प्लांट किया, बॉलीवुड, क्रिकेट, शोषणकारी बैंकिंग एवं मुद्रा प्रणाली, लोकतंत्र व चुनावी नाटक, हिन्दुओं-मुस्लिमों को बांटने जैसे कई ऐसे कार्य किये जिससे भारत अगले सैकड़ों वर्षों में भी ना उबर सके.

ब्रिटिशों के ही सिस्टम की देन है की, कुकुरमुत्तो की भांति भारत में हर साल हजारों नेता उगते हैं लेकिन सभी अपना हित साधकर साइड हो लेते हैं. इन सब व्यर्थ की चीजों में भारतीयों को ऐसा व्यस्त कर दिया गया की भारतीय उससे आगे का कभी सोच ही नहीं सकते.

सोचने वाली बात है जो लोग मुफ्त में किसी को अपना बुखार नहीं देते आज वो दुनिया को अपनी टेक्नोलॉजी दिए जा रहे हैं. फ्री में दुनिया को पोर्न दिया जा रहा है. गरीब देशों को मदद दी जा रही है. जो देश रोटी जुटाने में और रोजगार जुटाने में भी अक्षम हैं उन्हें खरबों के हथियार दिए जा रहे हैं.

जिन लोगों की दो वक्त की रोटी जुटाने की ताकत नहीं वो आज एके 47 और एसएलआर चला रहे हैं. हम इसे ‘इल्लुमिनाती’ का प्रभाव कहें या कुछ और लेकिन यह तो स्वीकारना ही होगा कि आज दुनिया ‘दानवी शक्तियों’ की जद में है जिसने मानव जाति को अपना गुलाम बना लिया है.

हमारा खान-पान, रहन-सहन, जीने का तरीका सब बदल गया है. हमारे जीवन में मशीनों ने चमत्कारिक रूप से ऐसी घुसपैठ कर ली है कि हमें मानवों से ज्यादा मशीनों व गैजेटो से प्रेम हो गया है जहां हम पहले जिया करते थे वहीं अब हमारा जीवन नोट कमाने में सीमित रह गया है और जितना कमाओ उतना ही कम.

गरीब तो खाने के लिए कमाता ही है जबकि अमीर और अमीर होने के लिए कमाता है. जिस चक्कर में ना गरीब अपना जीवन जी पाता है ना अमीर. रोटी कपड़ा और मकान ऐसी चीजें हैं जिसे प्रकृति ने पूरे प्राणी जगत को प्रदान किया हुआ है. फिर भी धरती पर गुजर बसर करने के लिए मनुष्यों को उसका मूल्य चुकाना पड़ता है.धरती पर कोई भी जीव भूखा नहीं मरता सिवाय मनुष्य के, धरती पर कोई भी जीव खाने के लिए पैसे नहीं कमाता और ना ही घर बनाने के लिए मिटटी खरीदता है. दुनिया का परिदृश्य ऐसा बदल दिया गया है लोग कुछ भी सोचने लायक नहीं बचे हैं.

अपने देश का ही उदाहरण लें. हमारा देश ऐसे देशों में आता था जो भोगवाद या उपभोक्तावाद के मायाजाल में फंसाने के के बजाय जीवन जीने की कला सिखाता था लेकिन आज हम भी अन्य की तरह वही कर रहे हैं जो हमसे कोई करवाना चाहता था.

पर आज भी हमें पता नहीं है हमारे भीतर चल क्या रहा है, हम कहाँ जा रहे हैं ? आज दुनिया का हर देश नियमों में बंधा है, कि वो सिर्फ ये कर सकता है इससे ज्यादा नहीं. अगर कोई देश अपनी मनमर्जी करता है या इन शक्तियों की राह में बाधा बनता है तो उसका क्या हाल होता है हम कुछ देशों को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं.

दुनिया के सबसे अमीर देश भी कर्जे में, दुनिया के सबसे गरीब देश भी कर्ज में फिर साहूकार कौन ? पहले हम कहीं भी आ जा सकते थे ना वीजा की जरूरत ना पासपोर्ट की लेकिन अब पचास तरह की कागजी कार्यवाही. आखिर इन नियमों ने जन्म कहाँ से लिया और किस नियति से इन्हें बनाया गया था ?

इसलिए निष्कर्ष रूप से कहें तो Illuminati कोई सेक्रेट सोसाइटी या ख़ुफ़िया संगठन नहीं बल्कि एक माहौल है, एक मायाजाल है, एक प्रकाश है जिसका आसीमित प्रभाव आज हर मनुष्य के जीवन पर है. इस विषय पर विचार करना आवश्यक हो गया है, इस वैश्विक समस्या का समाधान क्या है या फिर इससे निजात कैसे पाया जाय इस पर गहन अध्ययन एवं शोध की आवश्यकता है.
हार्प टेक्नोलॉजी : जिसके जरिये की जा सकती है मौसमों से छेड़छाड़


विज्ञान अब मात्र इंसान की जरूरत भर नहीं रह गया है. बल्कि अब इसका प्रयोग बड़ी-बड़ी साजिशें रचने के लिए भी किया जाने लगा है. पिछले कुछ वर्षों से दुनिया में पर्यावरणीय रूप से बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं जिसका कारण काफी रहस्यमय है ...
By Team Agnimitra
-June 13, 2017

पिछले कुछ दशकों से दुनिया ने कई बड़े बदलाव देखे हैं. ना ही मात्र दुनिया के सोचने का नजरिया बदला है बल्कि प्रकृति और प्राकृतिक क्रियाकलापों में भी भारी बदलाव आया है. बादल फटने जैसी नयी-नयी प्राकृतिक आपदाएं तो अस्तित्त्व में आयी ही हैं इसके साथ ही मौसम चक्र में भी भारी बदलाव आये हैं. सूखे जैसी स्थितियां तो वर्तमान में आम हो गयी है.विज्ञान इतना आगे निकल चुका है कि अब बारिश करवाना हो या बारिश रोकना हो या फिर किसी स्थान पर बर्फ पड़वाना हो यह सब आम हो गया है. इन सब के पीछे जो तकनीकि कार्य करती है वह आज हमारी सोच से कहीं ज्यादा आगे निकल चुकी है. आज हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही एक तकनीकि हार्प के बारे में :

HAARP क्या है

हार्प यानी ‘हाई फ्रीक्वेंसी एक्टिव एरोरल रिसर्च प्रोग्राम’ 1993 में अमेरिकी वायुसेना, नौसेना, अलास्का विश्वविद्यालय, अमेरिकन डिफेन्स रिसर्च संस्थान एवं दुनियाभर के अमेरिका में काम करने वाले वैज्ञानिकों के संयुक्त अभियान द्वारा अलास्का के गाकोन में बनाया गया एक ऐसा वैज्ञानिक प्रोग्राम हैं जिसे धरती के आयनमंडल पर शोध करने के लिए स्थापित किया गया था.

आयनमंडल क्या होता है

पृथ्वी से लगभग 8० किलोमीटर के बाद का सम्पूर्ण वायुमंडल आयनमंडल कहलाता है व पृथ्वी से प्रेषित होने वाली सभी रेडियो तरंगे इसी मंडल से परावर्तित होकर पुनः पृथ्वी पर लौट जाती हैं, हम शुरू से ही विज्ञान की किताबों में पढ़ते आये हैं कि आयनमंडल की उपयोगिता रेडियो तरंगो (विद्युत् चुम्बकीय तरंगो) के प्रसारण में सबसे अधिक मानी जाती है. धरती पर परिवर्तित होने वाले मौसमों एवं सूर्य से धरती पर आने वाली धूप की तीव्रता में भी आयनमंडल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. अगर आयनमंडल पर कोई प्रभाव पड़े तो उसका सीधा असर धरती पर होता है. अगर आयनमंडल पर नियंत्रण पा लिया जाय तो पृथ्वी पर भारी बदलाव लाये जा सकते हैं जो कि अब संभव हो गया है.

HAARP कैसे काम करता है

दरअसल हार्प को अस्तित्व में लाने वाले वैज्ञानिकों ने पहले प्रकृति को समझा व प्रकृति कैसे काम करती है इस विषय पर गहन शोध करने के बाद उन्होंने ऐसे-ऐसे साधन विकसित किये जो बिलकुल प्रकृति की तरह ही काम करते है बस अंतर है तो समय का क्योंकि प्रकृति हर कार्य अपने समय पर ही करती है अचानक कुछ भी नही लेकिन हार्प द्वारा किसी भी समय किसी भी मौसम में कुछ भी किया जा सकता है. भूकंप, बारिश, सूखा या फिर चक्रवात यह सब हार्प की सहायता से लाये जा सकते हैं.
अगर वैज्ञानिक रूप से कहा जाय तो ‘HAARP उच्च छमता वाले उर्जा संयोजन केंद्र है जिसे संचयित करने के लिए हार्प संस्थान में बड़े-बड़े इलेक्ट्रो मैग्नेटिक टावर व एंटीना (arrey) लगाये गये हैं जहां पर हार्प विज्ञानी  ‘विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा’ (Electro Magnetic Energy) का भंडारण करके उसे आवश्यकतानुसार कहीं पर भी छोड़ा जा सकता है.
इस तकनीकि में विद्युत् चुंबकीय तरंगें वायुमंडल के आयनमंडल वाले हिस्से में छोड़ी जाती है जिससे आयनमंडल का एक सीमित हिस्सा नियंत्रित किया जा सकता है. फिर एक सीमित क्षेत्र में आयनमंडल पर नियंत्रण प्राप्त करने के बाद उससे मनचाहा काम लिया जा सकता है जैसे : बारिश करवाना, लगातार बारिश करवाकर बाढ़ लाना व बादलों में उपस्थित वाष्प को सोखकर सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न करना.इस प्रकार से मौसमों में मनचाहा परिवर्तन किया जा सकता हैं. प्रकृति से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की जा सकती है. कहीं पे कभी भी बारिश करवाई जा सकती है. बारिश रुकवाई जा सकती है. बाढ़ व सूखे जैसे हालात पैदा किये जा सकते हैं. कहीं पर बर्फ गिरवा सकते हैं रुकवा सकते हैं. भीषण चक्रवात, भूकम्प व सुनामी लाई जा सकती है अर्थात अगर संक्षेप में कहा जाय तो इसी तरह की अन्य प्राकृतिक क्रियाकलापों को वैज्ञानिकों ने अब अंजाम देना बखूबी सीख लिया है.
रूस की सेना द्वारा प्रकाशित किये जाने वाले एक जर्नल ने यहाँ तक दावा किया था कि, HAARP के आयनमंडल परीक्षण के द्वारा भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉन्स के झरने बहाकर धरती के चुंबकीय ध्रुवों को भी झटका दिया जा सकता है.
अलास्का के सीनेटर रहे Mark Begich के भाई Nick Begich Jr. के अनुसार, हार्प का प्रयोग ना ही मात्र भूकंप लाने के लिए किया जा सकता है बल्कि इसका प्रयोग लोगों के दिमाग को नियंत्रित करने के लिए भी किया जा सकता है.

निकोला टेस्ला की तकनीकि का प्रयोग

हार्प तकनीकि विज्ञान के जिन नियमों पर कार्य करती है उसका सबसे पहले अविष्कार धरती के सबसे महान वैज्ञानिकों में शुमार किये जाने वाले निकोला टेस्ला ने सन 1900 के आसपास किया था. उन्होंने एक Mechanical Osscilator भी बनाया था जो वाइब्रेशन तकनीकि पर चलता था तथा उसकी फ्रीक्वेंसी शक्ति इतनी ज्यादा थी कि उससे भूकम्प तक लाया जा सकता था. कहा जाता है टेस्ला का उस आविष्कार जैसा ही कुछ हार्प वैज्ञानिकों के पास भी है जिसे अपग्रेड करके उन्होंने बड़े लेवल पर ऐसे Osscilator बनाये जिससे किसी भी स्थान पर भूकम्प व सुनामी लायी जा सकती है.

विश्व का एकमात्र "स्वाभाविक" राष्ट्र भारत ::- और बाकी फर्जी

विश्व का एकमात्र "स्वाभाविक" राष्ट्र भारत ::- और बाकी फर्जी

Written by रविवार, 12 नवम्बर 2017 07:16

अक्सर आपने कुछ "कथित इतिहासकारों" के मुँह से यह सुना होगा, कि "भारत तो कभी एक राष्ट्र था ही नहीं...", "यह तो टुकड़ों में बंटा हुआ एक भूभाग है, जिसे जबरन राष्ट्रवाद के नाम पर एक रखने का प्रयास किया जाता है...".

जब JNU में "खा-लीद" जैसे लोग भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते हैं, तो उसके पीछे इन्हीं "नकली इतिहासकारों" (Fake Historians of India) का दिमाग होता है. अंग्रजों, मुस्लिम लीग तथा काँग्रेस ने अपनी तरफ से पूरा प्रयास करके 1947 में आखिरकार भारत के कुछ टुकड़े कर दिए, परन्तु वास्तविकता यही है कि भारत सदैव "एक स्वाभाविक राष्ट्र" था, "एक स्वाभाविक राष्ट्र" (Natural Nation State) है, और इसके कई ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं. यह आज हमें पता है कि भारत का वर्तमान स्वरूप 15 अगस्त 1947 की देन है। आज अखंड भारत की कल्पना में हम केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ते हैं। परंतु हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि एक समय पर बर्मा (Myanmar), श्रीलंका (Sri Lanka), अफगानिस्तान (Afghanistan) आदि भी भारत के ही भाग रहे हैं। चलिए थोड़ी देर के लिए "पालतू बुद्धिपिशाचों" (Distorted History of India by Paid Historians) की बात को मानकर, यदि हम केवल 15 अगस्त 1947 के बाद के भारत को ही लें... तो भी इस समय विश्व में केवल छह नेशन स्टेट या राष्ट्र ऐसे हैं जो आकार में भारत से बड़े हैं और ये छहों के छहों "अस्वाभाविक राष्ट्र" हैं। आईये एक एक कर सभी पर विचार करते हैं।
पहला राष्ट्र है आस्ट्रेलिया। आस्ट्रेलिया क्या है? उसके केवल तटीय इलाकों में लोग बसे हैं। दिल्ली के बराबर आबादी है। इस नाम का भी कोई इतिहास नहीं है। यह बीसवीं शताब्दी में बना एक अस्वाभाविक राष्ट्र है। दूसरा बड़ा राष्ट्र है यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका। अमेरिका तो इस इलाके का नाम भी नहीं है। आज भी यूनाइटेड स्टेट्स किसी अमेरिगो नामक आदमी के नाम से जाना जाता है। इसे वेस्ट इंडिया ही कह दिया होता या वेस्ट इंडियन सबकोंटिनेंट ही कह दिया होता। यदि आपको किसी स्थान को उनके मूल नाम से नहीं बुलाना है, तो कुछ पहचाना सा नाम तो रखना चाहिए था। किसी को पता ही नहीं है कि अमेरिगो कौन था। अमेरिका का मूल नाम तो टर्टल कोंटीनेंट यानी कि कच्छप महाद्वीप है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तो उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में अस्तित्व में आया है। इसके टूटने का रुदन सैमुएल हंटिंगटन अपनी पुस्तक क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में कर रहे हैं। भारत में इस पर काफी बहस चल रही है, परंतु बहस करने वालों ने ठीक से उसकी प्रस्तावना तक नहीं पढ़ी है। प्रस्तावना में ही वह कह रहा है कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका टूट रहा है। क्यों? क्योंकि उसके नीचे मैक्सिको उसे धक्का दे रहा है। मैक्सिको वहाँ का मूल है। वे वहाँ के मूलनिवासी हैं। उनका अपना क्षेत्र है। दीवार बनाने से क्या होगा? दीवार तो चीन ने भी बनाई थी। फिर भी उसे मंगोल, हूण, शक, मांचू सभी पराजित करते रहे।
इस कड़ी में तीसरा राष्ट्र है कैनेडा। नक़्शे में संयुक्त राष्ट्र के ऊपर कैनेडा है। यहाँ कुछ फ्रांसीसी लोग हैं, कुछ अंग्रेज हैं और इन्होंने एक राष्ट्र बना लिया। यहां का पूरा इतिहास खंगाल डालिये, कैनेडा नाम नहीं मिलेगा। अस्वाभाविक राष्ट्र है। चौथा राष्ट्र है ब्राजील। यह नाम भी आपको इतिहास में नहीं मिलेगा। उन्नीसवीं शताब्दी तक ब्राजील का कोई अस्तित्व नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से भगाए गए कुछेक फ्रांसीसी, अंग्रेज और जर्मन लोगों की रचना है। ये कृत्रिम सीमाएं हैं।
पाँचवां बड़ा राष्ट्र है जिसे हम पहले यूएसएसआर के नाम से जानते रहे हैं सोवियत संघ। उससे टूट कर सोलह राष्ट्र अलग हो गए, अब बचा है रूस। रूस के तीन चौथाई हिस्से के बारे में उसे स्वयं ही उन्नीसवीं शताब्दी तक पता नहीं था। यह हिस्सा था रूस का एशियायी हिस्सा। यह तो प्राचीन काल से भारत का हिस्सा रहा है। साइबेरिया का उच्चारण बदलें तो सिबिरिया होता है यानी शिविर का स्थान। इतालवी लोग स्थानों को स्त्रीलिंग से बुलाते हैं। इसलिए शिविर शिविरिया बन गया जिसे हम आज साईबेरिया कहते हैं। यह रूस का हिस्सा नहीं था। यह हिस्सा रहा है भरतवंशी शकों का, भरतवंशी मंगोलों का। इसे आप नक्शों में आसानी से देख सकते हैं। कब तक रहा है? उन्नीसवीं शताब्दी तक। यह कोई प्राचीन इतिहास नहीं है, जिसे ढूंढना पड़े। यह आधुनिक इतिहास है। फ्रांसीसी क्रांति या पुनर्जागरण के काल के बाद के इतिहास को आधुनिक काल माना जाता है। परंतु यह तो उससे भी कहीं नई घटना है। उन्नीसवीं शताब्दी तक रूस इस इलाके को जानता भी नहीं है। वह स्वयं उसे क्या बतलाता है, इसे देख लीजिए। 18वीं  शताब्दी तक रूस अपनी सीमाएं क्या बता रहा है, देख लीजिए। जैसे हम कहते हैं न कि हमारी सीमाएं गांधार तक रही हैं, रूस अपनी सीमाओं के बारे में क्या कहता है? इसलिए यह भी स्वाभाविक राष्ट्र नहीं है। कृत्रिम देश है। शीघ्र ही अपनी स्वाभाविक सीमाओं में आ जाएगा। इसकी स्वाभाविक सीमाएं क्या हैं? आज के यूक्रेन में एक स्थान है कीव। कीव के उत्तर में एक नदी चलती है। उस नदी के आस-पास का इलाका ही वास्तविक रूस है। और कीव सहित यूक्रेन आज रूस से बाहर है।
पाँच विशाल देशों के बाद अगला देश है चीन। चीन का वर्तमान आकार तो पंडित नेहरू का दिया हुआ है। तिब्बत तो कभी उसका था ही नहीं। जिसे भारत के यूरोपीय चश्मेवाले बुद्धिजीवी पूर्वी तूर्कीस्तान या फिर चीनी तूर्कीस्तान कहते हैं, वह भी उसका नहीं रहा है। इसे भी वर्ष 1949 में जवाहरलाल नेहरू ने चीन के लिए छोड़ दिया। यह तो महाकाल के उपासकों का स्थान रहा है। महाकाल के उपासक रहे महान मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ ने चीन को पराजित किया था। चीन में मंगोलिया और मंचूरिया का हिस्सा मिला हुआ है। ये दोनों इलाके साम्यवादी चीन का हिस्सा 1949 के बाद रूस और चीन की सहमति से बने। रूस में लेनिन, स्टालिन जैसे कुछ तानाशाह लोग सत्ता में आ गए थे। उन्हें दुनिया भर में मित्र चाहिए था। कहा जाता है दुनिया भर में परंतु उसका वास्तविक अर्थ होता है यूरेशिया में। शेष चारों महादेश तो गिनती में होते ही नहीं हैं। तो साम्यवादी रूस को केवल एक सहयोगी मिला माओ के नेतृत्व वाला साम्यवादी चीन। साम्यवादी रूस ने मंगोलिया और मंचुरिया को चीन का हिस्सा मान लिया।
दूसरा विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की रचना हुई जिसमें यूएसएसआर स्थायी सदस्य था। दूसरा स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव भारत को मिला था, परंतु जवाहरलाल नेहरू ने कूटनीतिक मूर्खता में वह प्रस्ताव चीन को दिलवा दिया। इन दोनों साम्यवादी देशों ने मिल कर बंदरबाँट की। परंतु आज चीन टूट रहा है। तीन हिस्सों में। यह अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट है। मंचुरिया और मंगोलिया, दोनों ही चीन को अपने कब्जे में रखने वाले देश हैं। वर्ष 1914 तक मंचुरिया का गुलाम रहा है। यह तो हमें कहीं पढ़ाया नहीं जाता कि तेरहवीं शताब्दी से लेकर वर्ष 1914 तक चीन भरतवंशी मंगोलों तथा मंचुओं का गुलाम रहा है।
हमने देखा कि 15 अगस्त 1947 के भारत से दुनिया के छह नेशन-स्टेटों का क्षेत्रफल अधिक है और वे छहों अस्वाभाविक राष्ट्र हैं और ये छहों अतिशीघ्र टूट जाएंगे। आज के दिन भी भारत क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा स्वाभाविक राष्ट्र है। हम जानते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का जन्म कैसे हुआ है। अक्सर यह कहा जाता है कि हम पड़ोसी रोज नहीं बदल सकते। परंतु हमने हर रोज पड़ोसी ही तो बदला है। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी कब था, वह तो हमारा घर था। हमारा पड़ोसी अफगानिस्तान भी कब था, वह भी हमारा घर ही था। चीन भी आपका पड़ोसी कब था, नेपाल कब था हमारा पड़ोसी? हमने तो घरवालों को ही पड़ोसी बना दिया है।
याद करें कि युद्ध अपराध के कारण संयुक्त राष्ट्र ने ट्रीटी ऑफ वर्साई के कारण जर्मनी के दो हिस्से कर दिए, वह जर्मनी एक हो गया। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत एक हो गया। ऐसे में पाकिस्तान और भारत क्यों एक नहीं हो सकते? भारत का नक्शा देखिए, नीचे पेनिनसुलर भारत है, परंतु ऊपर विराट हिमालय है। अफगानिस्तान तो दुर्योधन का ननिहाल गाँधार ही तो था। शकुनि यहीं का था, और निकट इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह का राज्य गाँधार तक था। वर्ष 1905-10 में पंडित दीनदयालू शर्मा काबुल और कांधार में संस्कृत पर भाषण देने जाते हैं, सनातनधर्मरक्षिणी और गौरक्षिणी सभाएं करते हैं। गाँधी जी के जाने पर वायसराय खड़ा नहीं होता, पंरतु पंडित दीनदयालू शर्मा से मिलने के लिए इंग्लैंड का राजा भी खड़ा होता है। वर्ष 1910 में अफगानिस्तान नाम का कोई देश था ही नहीं। वर्ष 1922 में अंग्रेजों ने इसे बनाया रूस और उनके ब्रिटिश इंडिया के बीच बफर स्टेट के रूप में।महाभारत में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ढेर सारे राजा आते हैं। वे राजा जो युधिष्ठिर को कर देते हैं, वे सभी आते हैं। जो प्रदेश भारत के चक्रवर्ती सम्राट को कर देते हैं, वे भारत ही कहलाएंगे न? यह भारत कहाँ से कहाँ तक है? यवन प्रांत जिसे आज ग्रीक कहते हैं। परंतु ग्रीक स्वयं को ग्रीक नहीं कहते। वे स्वयं को एलवंशीय कहते हैं। उनके देश का नाम आज भी ग्रीस नहीं एलेनिक रिपब्लिक है। एलवंश मतलब बुद्ध और इला की संतान। यह भारतीय ग्रंथों में मिल जाएंगे। राजसूय यज्ञ के बाद युद्ध के वर्णन में स्पष्ट वर्णन है कि कौन-कौन सी सेनाएं पांडवों के साथ हैं और कौन-कौन कौरवों के साथ। वहाँ 250 जनपदों का उल्लेख है जिसमें दरद, काम्बोज, गाँधार, यवन, बाह्लीक, शक सभी नाम आते हैं। जिसे आज हम इस्लामिक देश के रूप में जानते हैं, यह पूरा इलाका शिव. ब्रह्मा, दूर्गा का पूजक सनातन धर्मावलम्बी चक्रवर्तीं भारतीय सम्राट के जनपद रहे हैं।
यह एक रोचक सत्य है कि अंग्रेजों को वर्ष 1910 तक पता नहीं था कि अशोक, देवानां पियदासी कौन है? वे महाभारत को नकार देते हैं। यदि हम महाभारत को गलत भी मान लें तो वायुपुराण, विष्णुपुराण, रामायण, कालीदास का रघुवंश, पाणिनी के अष्टाध्यायी आदि में किए गए भारतसंबंधी वर्णनों को देखें। यदि इन भारतीय संदर्भों से हमारी तुष्टि न हो तो फिर एक मुस्लिम लेखक का संदर्भ देखिए। अल बिरुनी का भारत पुस्तक को पढि़ए। अल बिरुनी की पुस्तक में भारत की सीमाओं और लोगों का वर्णन है। इसमें एक वर्णन है कि भारत के लोगों ने चारों दिशाओं में चार नगरों से आकाशीय गणना की है। उसकी आज तो जाँच की जा सकती है। वह कह रहा है कि इन चारों स्थानों पर भारत के लोग रहते हैं। ये चारों स्थान हैं – उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव, और पूरब तथा पश्चिम के शहरों का अक्षांश और देशांतर गणना दी हुई है। अल बिरुनी का कहना है कि ये गणनाएं तभी सही हो सकती हैं, जब आप वहाँ लगातार जा रहे हों।
पिरी राइस का नक्शा दुनिया का एक नक्शा है। यह फटी-पुरानी अवस्था में किसी विद्वान को मिला। उसने उसे देखा। उस नक्शे की विशेषता है कि उसमें दक्षिणी ध्रुव दिखाया गया है। दक्षिणी ध्रुव पर दो किलोमीटर मोटी बर्फ की परत जमी हुई है। वर्ष 1966 में इंग्लैंड और स्वीडेन ने एक सिस्मोलोजिकल सर्वेक्षण किया और उसके आधार पर दक्षिणी ध्रुव का नक्शा बनाया। यह नक्शा पिरी राइस के नक्शे के एकदम समान है। तो प्रश्न उठा कि पिरी राइस का नक्शा इतना पहले कैसे बना? उस विद्वान ने उस नक्शे को अमेरिका के एयर फोर्स के टेक्नीकल डिविजन के स्क्वैड्रन लीडर को भेजा। स्क्वैड्रन लीडर ने उत्तर लिखा कि नक्शा तो सही है, परंतु उस समय जब बर्फ नहीं थी, जब जानने के लिए जो यंत्र और तकनीकी ज्ञान चाहिए, वह नहीं रहा होगा। वह कहता है कि इस दो किलोमीटर की बर्फ की तह जमने में कई दशक लाख वर्ष लगे। यह नक्शा लगभग तबका बना हुआ है। यह उद्धरण मैप्स ऑफ एनशिएंट सी किंग्स के हैं। पिरी राइस तूर्क का डकैत था। तूर्कों को आमतौर पर हम मुसलमान मान लेते हैं। परंतु ध्यान दें कि ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक इसे यूरोप अनातोलिया बोलते थे। तूर्क लोग जब वर्तमान तूर्किस्तान पहुँचे, तब उसका नाम तूर्किस्तान रखा। वे वास्तव में दूर्गा और शिव के उपासक रहे हैं।
पिरी राइस लिख रहा है कि उसने यह नक्शा पुराने नक्शों के आधार पर बनाया है। अमेरिकन नक्शा बनाने वाले विद्वान लिखते हैं कि इस रास्ते पर लगातार समुद्री यात्राएं होती रही हैं। दक्षिणी ध्रुव पर यात्राएं हो रही हैं व्यापारिक और सैन्य कारणों से। अलग-अलग हिमयुगों में नक्शे बनाए गए हैं। इसे बनाने वाले और यात्रा करने वाले वे लोग हैं, जिनके नाम से एक महासागर का नाम ही रख दिया गया है। हिंद महासागर। दूसरे किसी भी देश के नाम पर महासागर का नाम नहीं रखा गया है, क्यों? इस हिंद महासागर में हिंद का तटीय प्रदेश छोटा सा ही है। फिर भी इसका नाम हिंद महासागर इसलिए है कि इसमें भारतीय ऐसे चलते हैं जैसे कनॉट प्लेस में दिल्ली पुलिस और जनता चलती है। इसी प्रकार हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी और उनकी रक्षा के लिए चतुर्गिंणी सेना चलती है। चतुर्गिंणी में चौथा अंग कौन है? चार प्रकार की सेना है नौसेना। इसका प्रमाण है अजंता में बड़े-बड़े जहाजों का चित्रण है जिसमें हाथी-घोड़े और हथियार लदे होते हैं। ऐसे ही भित्तिचित्र भारत के उत्तर में स्थित पाँच स्थानों में भी मिले हैं।
इस प्रकार हम पाते हैं कि भारत एक स्वाभाविक राष्ट्र है और अत्यंत विशाल राष्ट्र रहा है। इसके ढेरों प्रमाण मिलते हैं। इस लेख में तो कुछ ही प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं।
(बृहदीश्वर मंद्दिर के बारे में इसी से मिलता-जुलता एक लेख और है... उसे भी पढ़िए...)
http://www.desicnn.com/blog/brihadishwara-temple-classic-indian-architechture

Monday, 13 November 2017


 “हम गैर मुस्लिम महिलाओ का इस्लाम में धर्मान्तरण करते ही रहेंगे
चाहे कोई कितना भी विरोध कर ले शोर मचा ले”... अबूबकर मुस्लियर 

, ये है केरल के सबसे बड़े इस्लामिक धर्मगुरु अबूबकर मुस्लियर
ये केरल में मुस्लिमो के सबसे बड़े गुरु है, और कांग्रेस के बेहद ही करीबी है,केरल में कांग्रेस इनके इशारों पर नाचती है, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तो अबूबकर की पहुच सीधे प्रधानमंत्री के घर तक थी

अबूबकर मुस्लियर ने कहा की,“महिलाओ और पुरुष की समानता गैर इस्लामिक और हराम है, महिलायों को अल्लाह ने केवल बच्चा करने के लिए बनाया है, महिलाएं पुरुष के बराबर नहीं हो सकती महिलाओं का दिमाग भी कमजोर होता है और वो केवल घर में रहने लायक होती है”

 अबूबकर मुस्लियर इस्लामिक स्टेट के भी समर्थक है, केरल में वामपंथी हो चाहे कांग्रेसी दोनों को ये अपने इशारे पर चलाते है 
कैसे समाप्त होगी पाकिस्तान परस्त सोच ?
ये वो सोच है जो कुरान की कुशिक्षाओं पर टिकी है । पाकिस्तान नाम का एक मात्र कोई देश ही नहीं बल्कि अरब देश की गुलामी से युक्त एक विचारधारा है । जिसे भारतीय भूखंड पर रहने वाला हर मुसलमान मानता है । अरबों की गुलामी तक करने को उतारू हर भारत का मुसलमान इसी जमीन पर पैदा होने के बावजूद भी इस जमीन से कटा हुआ है वो इस बात को मानने के लिये तैयार ही नहीं है कि जिन अरबों के जूते चाटते हुए वो भारत के अन्य धर्म के लोगों का रक्त तक बहाने को तैयार है और अरबी मानसिकता से पोषित वो जिहादी जुनून में पागल हुआ फिरता है वे अरबी ही उसे मुसलमान मानने तक को तैयार नहीं हैं । भारत से मुसलमानों का खून का रिश्ता है और अरब से पानी का । हम मानते हैं कि खून का रिश्ता पानी के रिश्ते से ज्यादा वजन रखता है ।
जो भी मनुष्य किसी विदेश में पनपे किसी मज़हब को मानता है वो वैसे ही भारतीयता से कट जाता है । उसकी वफादारी पहले उन देशों के प्रति होती है जिनसे उसके मज़हब का सम्बन्ध होता है । इसी कारण हर मुसलमान को भारतीयता से जोड़ने के लिये ये आवश्यक है कि उसके सबसे पहले अरबों से जुड़े तार काट दिए जाएँ । और ये तब संभव है जब शुद्धि यज्ञ चलाकर वैदिक धर्म से तुल्नात्मक दृष्टिकोण से इस्लाम की बुद्धिमतापूर्वक समीक्षा करना । आर्य समाज इसी शैली को मानता है क्योंकि विचारों का युद्ध विचारों से ही जीता जा सकता है ।
कुरान की विषैली और अमानवीय विचारधारा को केवल वैदिक विचारधारा ही समाप्त कर सकती है । क्योंकि वैदिक विचारधारा ही मनुष्यता की पोषक और सभी प्रकार के सुखों को देने वाली है ।
-- कुमार आर्य
आदर्श शासक महाराजा रणजीत सिंह
(आज 13 नवम्बर उनके जन्म दिवस पर विशेष)
वे साँवले रंग का नाटे कद के मनुष्य थे। उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी। परंतु यह होते हुए भी वह तेजस्वी थे। आत्मबल का उदाहरण देखना हो तो महाराजा रणजीत सिंह मे देखना चाहिए
महाराजा रणजीत सिंह जी जीतने बड़े योद्धा था उतने ही बड़े उदार महामानव
उनके जीवन के 3 अलभ्य प्रकरण
1- एक बार एक कवि उनके दरबार मे कविता सुनाना चाहता था।
द्वारपाल ने अंदर जाने देने के लिए शर्त रखी कि तुम्हारी कविता मे राजा की एक आँख का जिक्र जरूर हो। (उनकी एक आँख शीतला के प्रकोप से चली गई थी)
अंदर जाकर कवि ने कविता सुनाई -
ओरों की दो दो भली ते केहि के काज
तेरी एक ही आँख मे कोटि आँख की लाज
महाराजा रणजीत सिंह जी ने उसे बहुत पुरस्कार दिया।
2- एक बार उन्होने सेना के साथ जंगल मे पड़ाव डाला
भोजन पकाते समय पता चला कि नमक लाना भूल गए।
तब किसी ने कहा कि निकट के गाँव मे से जाकर नमक ले आए।
जब सैनिक नमक लेकर आए तो महाराजा रणजीत सिंह जी ने पूछा
क्या नमक का मूल्य दे आए ?
सैनिको ने कहा - नमक का भी क्या मूल्य देना।
तभी महाराजा ने कहा तत्काल नमक का मूल्य दे कर आओ।
यदि राजा मुफ्त मे नमक लेगा तो उसके सिपाही तो पूरा गाँव ही लूट लेंगे
3- एक बार महाराजा कहीं जा रहे थे
तभी उनके माथे पर पत्थर आकार लगा
उनके माथे पर से खून बहने लगा।
तभी सैनिक एक बुढ़िया को पकड़ लाए जिसने पत्थर फेंका था।
बुढ़िया ने हाथ जो कर कहा कि वह अपने पोते के लिए फल तोड़ने के लिए पत्थर फेंका था जो गलती से उनके माथे पर लग गया।
महाराजा ने उस बुढ़िया को तत्काल कुछ धन दिया।
सैनिको को बहुत आश्चर्य हुआ।
तभी महाराजा ने कहा कि एक पेड़ पत्थर मारने पर फल देता है तो मैं क्या पेड़ से भी गया गुजारा हूँ?
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महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे।
अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।
बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया।
उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।
वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।
महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे।

सन 1805 में महाराजा ने भेष बदलकर लार्ड लेक शिविर में जाकर अंग्रेजी सेना की कवायद, गणवेश और सैन्य पद्दति को देखा और अपनी सेना को उसी पद्दति से संगठित करने का निश्चय किया. प्रारम्भ में स्वतन्त्र ढंग से लड़ने वाले सिख सैनिको को कवायद आदि का ढंग बड़ा हास्यापद लगा और उन्होंने उसका विरोध किया पर महाराजा रणजीत सिंह अपने निर्णय पर दृढ रहे.
महान इतिहासकार जे. डी कनिंघम ने कहा था-
” निःसंदेह रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ महान थी. उसने पंजाब को एक आपसी लड़ने वाले संघ के रूप में प्राप्त किया तथा एक शक्तिशाली राज्य के रूप में परिवर्तित किया ”.

12 सालों तक मुफ्त बिजली देगी ये भारतीय मशीन

मोबाइल फोन से भी कम है कीमत ...

दिल्‍ली के एक इवेंट में हाल ही में एक ऐसा ही पावरबैंक देखने को मिला, जिसका रिजल्‍ट चौंकाने वाला है। उद्योगति मनोज भार्गव ने दिल्‍ली के इस इवेंट में लोगों को एक डॉक्‍यूमेंटरी फिल्‍म दिखाई।
बिलियन्स इन चेंज 2 नाम की इस शॉर्ट फिल्‍म में कुछ ऐसे प्रोडक्‍ट और सॉल्‍यूशन दिखाए गए हैं, जिनके इस्‍तेमाल से आम लोगों की रोजमर्रा की तमाम जरूरतें आसानी से पूरी हो सकती हैं।इसी इवेंट के दौरान पोर्टेबल सोलर डिवाइस हंस 300 पावरपैक और हंस सोलर उपकरण के लॉंच की घोषणा की गई। मनोज भार्गव की कंपनी द्वारा बनाए गए ये प्रोडक्‍ट सच में एक सोलर पावर स्‍टेशन हैं।
जो सोलर ऊर्जा से भारी मात्रा में बिजली बनाकर उसे लंबे समय के लिए स्‍टोर कर सकते हैं। इसकी लाइफ 12 साल की है। जिससे तमाम लोगों को या कहें कि किस के घर में बिजली की सभी जरूरतों को बहुत कम खर्चे में काफी समय तक पूरा किया जा सकता है।
यह छोटा सा सोलर पावर बैंक इतनी ज्‍यादा बिजली बनाता और स्‍टोर करता है, जिससे घर की लाइटें, पंखे, टीवी वगैरह कई घरेलू उपकरण मजे से चलाए जा सकते हैं। आपको बता दें कि यह शक्‍तिशाली पावरपैक किसी आम सोलर बैटरी सिस्‍टम से बहुत ज्‍यादा पावरफुल है।
यह उपकरण 130 घंटे और 300 घंटे के पावर बैकअप वाले दो मॉडल्‍स में पेश किया गया है। जिनकी कीमत क्रमश: 10 हजार और 14 हजार है। जो कि एक बढिया मोबाइल फोन से भी कम है।
यही नहीं इस उपकरण पर पूरे 12 साल की वारंटी है। कहने का मतलब यह है कि एक बार घर पर लगाने के बाद आपको 2 सालों तक बिजली के बिल से आजादी मिल सकती है।बिलियन्स इन चेंज 2 कंपनी की अपने दो पावरबैंक ‘हंस पावरपैक और हंस सोलर ब्रिफकेस’ को अगले साल मई में मार्केट लॉन्‍च की योजना है।
मनोज भार्गव बताते हैं कि इस हाईटेक 21वीं सदी में भी दुनिया भर के लाखों करोंड़ो लोग गावों में बिना बिजली के ही रहने को मजबूर हैं। उनके ये सोलर उपकरण शहरों से ज्‍यादा गांवों के लिए वरदान हैं।

ये है वीरांगना पद्मावती का जौहर स्थल, जहां 

आज भी गूंजती है चीखें...

चित्तौड़ का गौरवशाली इतिहास न सिर्फ राजपूतों की बहादुरी का साक्षी रहा है बल्कि मेवाड़ की इस धरती पर ऐसी वीरांगनाएं भी पैदा हुई हैं जिन्होंने धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए बेधड़क धधकती अग्नि में खुद को स्वाहा कर डाला, यही वो स्थल है, जहां आज भी लोग श्रद्धा से अपना सिर झुकाते हैं। इसी कुंड में महारानी पद्मावती (पद्मिनी) ने 16 हजार स्त्रियों के साथ जौहर किया था।

चित्तौड़गढ़ के किले में उस कुंड की ओर जाने वाला रास्ता आज भी उस भयानक कहानी का गवाह है। यह रास्ता बेहद अंधेरे वाला है जिस पर आज भी कोई जाने का साहस नहीं करता। इस गलियारे की दीवारों तथा कई गज दूर भवनों में आज भी कुंड की अग्नि के चिन्ह और उष्णता का अनुभव किया जा सकता है। साफ दिखाई देता है कि विशाल अग्निकुंड की ताप से दीवारों पर चढ़े हुए चूने के प्लास्टर जल चुके हैं। इस चित्र में कुंड के समीप जो दरवाजा दिख रहा है कहा जाता है कि चितौड़ की आन-बान और शान के लिए वीरांगना पद्मावती वहीं से अपनी साथी महिलाओं के साथ कुंड में कूद गई थीं। कहते हैं कि यह जौहर इतना विशाल था कि कई दिनों तक इस कुंड में अग्नि धधकती रही। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि सैकड़ों वीरांगनाओं की आत्माएं आज भी इस कुंड में मौजूद हैं और यहां इस कुंड से अक्सर औरतों की चीखें सुनाई पड़ती हैं।
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गोवर्धन मठ पूरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने भी पद्मावती के विकृत इतिहास को लेकर अपना कड़ा विरोध प्रस्तुत किया है।
महारानी पद्मावती हमारी गौरव हैं। हमारे गौरव के साथ किसी को छेड़ने का कोई अधिकार नहीं।
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इतिहासकारों के पास खिलजी का प्रमाण है, पद्मिनी का नही। ऐसे इतिहासकारों को चुल्लू भर पानी दे देना चाहिये।
पद्मावती खिलजी की कल्पना हो सकती है ये भी माना जा सकता है; किंतु उस कल्पना का सीधा सम्बंध आप चितौड़ से दिखा रहे हो और फिर ये भी कह रहे हो कि वो काल्पनिक है। काल्पनिक चीजों का किसी वंश विशेष से सम्बंध कैसे हो दिखाया जा सकता है ?? ये शुद्ध झोल नही तो और क्या है !

                                                         चीन  किन-किन तरीको को अपनाकर गरीब देशो को लूट रहा है ...

जानिए कितनी जोखिम से भरी है चीन की "वन बेल्ट, वन रोड" परियोजना और चीन अपने जाल में जकड़ कर किन-किन तरीको को अपनाकर विभिन्न गरीब देशो को लूट रहा है या लूटेगा! कर्ज लेने वाले देश यदि कर्ज नही लौटा पाए तो क्या होगा?
हर देश चीन के भारी कर्ज से अपने देश में सड़कें, रेलवे लाइनें, कोयले से चलने वाले बिजली घर आदि बनवायेंगे. लेकिन इनका ठेका चीनी कंपनियों को ही मिलेगा. कर्जा लेने वाले देश चीनी कंपनी का बिल चुकाएंगे. ऊपर से सूद समेत कर्ज भी चीनी बैंको को लौटाएंगे. जाहिर है मि चीन सूद समेत कर्ज भी वसूलेगा और उसकी कंपनियों को निर्माण के दौरान होने वाला फायदा भी मिलेगा.
चीन गरीब देशों को अरबों डॉलर का कर्ज देगा. इस कर्ज से गरीब देश अपने यहां सड़कें, पुल, पोर्ट और हवाई अड्डे बनाएंगे. लेकिन अगर कर्जा डूबने लगा तो क्या होगा?
चीन के "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट को लेकर ऐसे सवाल भी पूछे जा रहे हैं. कर्ज देने वालों में चीन के दो प्रमुख बैंक हैं, चाइना डेवलपमेंट बैंक और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ चाइना. दोनों एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कई देशों को 200 अरब डॉलर का कर्ज दे चुके हैं.
बीजिंग में सम्पन्न दो दिन के वन बेल्ट, वन रोड सम्मेलन के दौरान एलान किया गया था कि सैकड़ों अरब डॉलर का कर्ज और दिया जाएगा. लेकिन जैसे जैसे प्रोजेक्ट आगे बढ़ने, वैसे वैसे जोखिम भी बढ़ता जाएगा. बैंक, लेनदार और देनदारों के बीच का समीकरण बेहद अहम हो जाएगा. एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ चाइना चाहता है कि हर देश के लिए कर्ज की सीमा निर्धारित की जाए. बैंक के उप गर्वनर सुन पिंग कहते हैं, "कुछ देशों को अगर हमने बहुत ज्यादा कर्ज दिया तो ऋण की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं."
फिलहाल चीन के पास काफी पैसा है. वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट को फिलहाल चीन की सरकार अन्य देशों की सरकारों के साथ मिलकर तय कर रही है. कागजों से निकलकर प्रोजेक्ट जैसे ही जमीन पर शुरू होगा, वैसे ही व्यावहारिक परेशानियां सामने आएंगी. वन रोड, वन बेल्ट के तहत आने वाले 1,676 प्रोजेक्ट्स को चीन के सरकारी इदारे फाइनेंस कर रहे हैं.
इस प्रोजेक्ट के तहत बहुत ही बड़ा ठेका चीन कम्युनिकेशन कंस्ट्रक्शन ग्रुप को मिला है, अकेले 40 अरब डॉलर का ठेका. ग्रुप को 10,320 किलोमीटर लंबी सड़कें, 95 गहरे बंदरगाह, 10 एयरपोर्ट, 152 पुल और 1.080 रेलवे प्रोजेक्ट्स पूरे करने हैं. यानि चीन सूद समेत कर्ज भी वसूलेगा और उसकी कंपनियों को निर्माण के दौरान होने वाला फायदा भी मिलेगा.
इंडोनेशिया को चाइना डेवलपमेंट बैंक ने 40 साल की मियाद पर कर्ज दिया है. कर्जे की कोई गारंटी नहीं है. चीन 5.29 अरब डॉलर वाले जकार्ता-बानडुंग रेलवे प्रोजेक्ट को 75 फीसदी फाइनेंस कर रहा है. इंडोनेशिया में यह पहला हाई स्पीड रेलवे प्रोजेक्ट है. लोन की शर्तों के तहत 10 साल का ग्रेस पीरियड है. 60 फीसदी कर्ज दो फीसदी की ब्याज दर से अमेरिकी डॉलरों में चुकाना होगा. बाकी का 40 फीसदी कर्ज 3.4 फीसदी ब्याज दर पर युआन में चुकता करना होगा.
चीन के सेंट्रल बैक के गर्वनर झोउ शियानचुआन जोखिम और समस्याओं की चेतावनी दे चुके हैं. उन्हें डर है कि कहीं वेनेजुएला जैसा संकट फिर सामने न आ जाए. वित्तीय रूप से खस्ताहाल वेनेजुएला में चीन के 65 अरब डॉलर फंस चुके हैं. शंघाई में फिच रेटिंग के बैंक समीक्षक जैक युआन कहते हैं, "जिन जगहों पर ये कर्ज जा रहा है, वे ऐसी जगहें हैं जिन्हें पश्चिम के कारोबारी बैंकों से कर्ज मिलने में मुश्किल हुई. उनकी क्रेडिट रेटिंग बहुत अच्छी नहीं या फिर उनके प्रोजेक्ट्स के व्यावसायिक रूप से फलदायी होने पर सवाल उठे हैं. चिंता यह है कि चीनी बैंकों की पूंजी गलत ढंग से न बंट जाए."
चीन के सबसे बड़े व्यावसायिक बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "हकीकत यह है कि व्यावसायिक बैंक बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं."
दक्षिण पूर्वी एशिया के देश लाओस की गिनती दुनिया के सबसे गरीब देशों में होती है. चीन-लाओस रेलवे प्रोजेक्ट के लिए देश को 7 अरब डॉलर का कर्ज दिया गया है. यह कर्ज लाओस की जीडीपी का आधा है. इस कर्ज को लाओस को 5 फीसदी से ब्याज दर पर लौटाना होगा. पाकिस्तान की सड़क और रेल परियोजनाओं पर चीन 56 अरब डॉलर निवेश करना चाहता है. 2022 तक पाकिस्तान को इस कर्ज के बदले प्रत्येक वर्ष 5 अरब डॉलर की किश्त का भुगतान करना पड़ेगा.
कर्ज लेने वाले देशों ने यदि कर्ज वापस नही किया तो चीन उस देश की भूमियो/बंदरगाहों/हवाई अड्डा पर कब्जा कर उन्हें अपने उपयोग में लाएगा। भूमियो से वह खनिज लवण, कोयला और सोना आदि की खुदाई अथवा गेँहू, चावल आदि की फसल उगाएगा...
उमा शंकर सिंह