Saturday, 31 October 2015


श्रीमती Ifa Sudewi , इस्लामिक मुल्क इण्डोनेशिया की पहली महिला जज जिन्हे 2002 Bali bombings केस में मुख्य जज बनाया गया। 2002 Bali bombings trials के दौरान गिरफ्तार 5 मुस्लिम आतंकवादियों ने जब बताया की आतंक की शिक्षा-प्रेरणा उन्हें कुरान से मिली, तो मुस्लिम होने के नाते Ifa Sudewi चौंक उठी।
आम भारतीय मुसलमानों की तरह Ifa Sudewi ने भी यह मानने से इंकार कर दिया की कुरान में अल्लाह ने गैर-मुसलमां के क़त्ल का आदेश दिया है। तुरंत Ifa Sudewi ने एक कमिटी गठित की और कुरान पर आतंकवादियों द्वारा लगाये गए तोहमत की पड़ताल शुरू हुई। 27 दिनों तक सरकारी वकील, धर्मगुरु और आतंकवादी पक्ष के वकीलों ने इस बाबत साक्ष्य प्रस्तुत किये। 28 वें दिन आतंकवादियों को सजा सुनाने से पहले ही खुद जज साहिबा Ifa Sudewi ने इस्लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपना लिया।
पढ़ा-लिखा मुसलमान तभी तक मुसलमान है, जब तक की उसने आसमानी किताब को समझा नहीं। कोई भी इन्सान एकबार बस इस किताब को पढ़ ले वह तुरंत यह मजहब छोड़ देगा। दरअसल 99% लोग सिर्फ आसमानी किताब का रट्टा लगाते हैं, समझने का प्रयास कोई करता ही नहीं। जिसने इसे समझ लिया वो या तो दहशतगर्द बन जाता है या मजहब ही छोड़ देता। न्यूज़ लिंक :

Friday, 30 October 2015

प्रेरणा लो भारत की इस महान बेटी से...

जुड़वां बेटियों को मां ने ठुकराया, अविवाहित डॉक्टर ने अपनाया !
डॉ. कोमल वर्तमान में फर्रुखाबाद के एक निजी अस्पताल में तैनात हैं। डॉक्टर कोमल के मुताबिक उनकी ड्यूटी के दौरान 10 दिन पहले एक महिला ने अस्पताल में जुड़वां बेटियों को जन्म दिया था।
जन्म देते ही जुड़वां बेटियों को मां ने ठुकरा दिया तो उसका इलाज करने वाली अविवाहित महिला डॉक्टर ने उन्हें अपना लिया। अस्पताल प्रबंधन ने समझाया लेकिन उसने एक नहीं सुनी।
औपचारिकताएं पूरी कर सोमवार को वह दोनों बेटियों को लेकर अपने गांव पहुंची तो पूरे गांव ने उसे हाथोंहाथ लिया। बेटी बचाने की यह मिसाल पेश की गुलावठी के गांव ईसेपुर निवासी सीताराम यादव की 29 वर्षीय अविवाहित बेटी डॉ. कोमल ने।

आतंक की शिक्षा-प्रेरणा उन्हें कुरान से मिली,

श्रीमती Ifa Sudewi , इस्लामिक मुल्क इण्डोनेशिया की पहली महिला जज जिन्हे 2002 Bali bombings केस में मुख्य जज बनाया गया। 2002 Bali bombings trials के दौरान गिरफ्तार 5 मुस्लिम आतंकवादियों ने जब बताया की आतंक की शिक्षा-प्रेरणा उन्हें कुरान से मिली, तो मुस्लिम होने के नाते Ifa Sudewi चौंक उठी।
आम भारतीय मुसलमानों की तरह Ifa Sudewi ने भी यह मानने से इंकार कर दिया की कुरान में अल्लाह ने गैर-मुसलमां के क़त्ल का आदेश दिया है। तुरंत Ifa Sudewi ने एक कमिटी गठित की और कुरान पर आतंकवादियों द्वारा लगाये गए तोहमत की पड़ताल शुरू हुई। 27 दिनों तक सरकारी वकील, धर्मगुरु और आतंकवादी पक्ष के वकीलों ने इस बाबत साक्ष्य प्रस्तुत किये। 28 वें दिन आतंकवादियों को सजा सुनाने से पहले ही खुद जज साहिबा Ifa Sudewi ने इस्लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपना लिया।
पढ़ा-लिखा मुसलमान तभी तक मुसलमान है, जब तक की उसने आसमानी किताब को समझा नहीं। कोई भी इन्सान एकबार बस इस किताब को पढ़ ले वह तुरंत यह मजहब छोड़ देगा। दरअसल 99% लोग सिर्फ आसमानी किताब का रट्टा लगाते हैं, समझने का प्रयास कोई करता ही नहीं। जिसने इसे समझ लिया वो या तो दहशतगर्द बन जाता है या मजहब ही छोड़ देता। न्यूज़ लिंक :-https://en.wikipedia.org/wiki/Ifa_Sudewi
मिस थाइलैंड चुनी गई इस कन्या का ये है संस्कार |
इसकी माता कुड़ा बिनती है| ये कन्या जब मिस थाइलैंड चुनी गई फिर जब घर लौटी तो अपनी माँ के पाँव छु लिए | ये संस्कार है जो इसे बचपन से आजतक मिले हैं |
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जयपुर.  इस परिवार के 31 सदस्य डॉक्टर हैं और 32वां सदस्य भी डॉक्टर बनने की तैयारी में जुट चुका है। इस घर से 32वां डॉक्टर बनने जा रही है राजस्थान पीएमटी में 107वी रैंक हासिल करने वाली विनम्रता पाटनी। 
विनम्रता ने जब अपने एमबीबीएस कोर्स की पढ़ाई शुरू की तो वह मेडिकल प्रफेशन अपनाने वाली इस परिवार की 32वीं सदस्य बन गई थी। राजस्थान में फैमिली को "जयपुर का डॉक्टर परिवार" के नाम से भी जाना जाता है। 
इसमें दिलचस्प बात ये भी इस फैमिली के करीब 20 सदस्य जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में काम कर रहे हैं।

1 लीटर पेट्रोल में 200 किमी का सफर

महेसाणा (गुजरात)। आपने अब तक दुनिया में एक से बढ़कर एक और अनोखी साइकिलें देखी होंगी, लेकिन क्या आपने ऐसी साइकिल के बारे में सुना है, जो सिर्फ 1 लीटर पेट्रोल में 200 किमी का सफर तय कर सके। जी हां, यह सच है। माउंट आबू में सरकारी नौकरी करने वाले एक युवक राजकमल ने ऐसी ही अनोखी
साइकिल डिजाइन की है।

mediya

ये 20 लाख का इनामी आतंकी अबु कासिम का जनाजा है।  देश के बफादार मुल्लों की बफादारी देख लो किसके साथ है। पूरी जमात ही आतंकवादी है। मुस्लिम सिर्फ मुस्लिम होता है, चाहे आतंकी हो या मौलवी, अच्छा हो या बुरा इन्सान हो या हैवान !!
आतंकी अबू कासिम सुरक्षा बालो के हाथो मुठभेड़ में मारा गया,  अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो आतंकवादी के ये समर्थक किस धर्म के हैं??

Wednesday, 28 October 2015

युवराज-सहवाग नहीं इस बल्लेबाज़ को देखें, 6 मैच 4 शतक और 2 बार 90+
हाल में चल रही रणजी ट्रॉफी मुकाबले में सबकी नज़रें उन स्टार्स पर हैं जो टीम इंडिया में आ सकते हैं या वापसी करने की कोशिश में लगे हुए हैं. लेकिन इस सीज़न में एक ऐसा बल्लेबाज़ भी है जिसमें मात्र 23 साल की उम्र में महज़ 5 मैचों में ऐसा प्रदर्शन कर दिया है जिसे देखर हर कोई कहेगा कि इस खिलाड़ी को ब्लू कैप मिलनी चाहिए.
मध्यप्रदेश के युवा बल्लेबाज़ आदित्य श्रीवास्तव की. आदित्य ने अपने फर्स्ट-क्लास करियर में खेले 6 मैचों की 7 पारी में 4 शतक और दो अर्धशतकों के साथ 120 से ज्यादा के औसत से 740 रन बना लिए हैं. हाल ही में पंजाब के साथ खेले जा रहे मुकाबले की पहली पारी में आदित्य ने अपने छोटे करियर का चौथा शतक लगाया.
इतना ही नहीं ये बल्लेबाज 6 में से 4 पारी में शतक और 2 में नाइंटीज़ वाले अर्धशतक भी जमा चुका है. यानी अगर वो 10 रन और बनाता तो उसके नाम 6 शतक होते. जबकी 7 में से एक पारी में आदित्य शून्य पर भी आउट हुआ है.
आदित्य के पिता आदित्य के बचपन का एक किस्सा बताते हुए कहते हैं कि, "भोपाल में मशहूर कोच जीएस पठानिया का बेटा अंडर-19 टीम में फास्ट बॉलर था। जब वह बॉल करता तो महज़ 10 साल के आदित्य क्रीज से बाहर भागने लगता। क्योंकि वह फास्ट बॉल से डरता था. इस डर को दूर करने के लिए पठानिया प्रैक्टिस के दौरान उसके पैर बांध देते। कुछ ही दिनों में आदित्य खुद से काफी सीनियर पठानिया साहब के बेटे की बॉल पर बेखौफ होकर हिट करने लगा.''

9महीने 9दिन गर्भ मे बच्चा क्यो रहता है?

Nisha Dwivedi
9महीने 9दिन गर्भ मे बच्चा क्यो रहता है?

9 महीने 9 दिन गर्भ मे बच्चा क्यो रहता है क्या है बच्चे को महान बनाने का वैज्ञानिक उपाय ?
लोग ज्योतिष पर बहुत कम विश्वास करते है क्योकि ज्योतिषियों ने ही ज्योतिष का विनाश किया है । उनके अधूरे ज्ञान के कारण ऐसा हुआ है ।
गर्भ मे बच्चा 9 महीने और 9 दिन ही क्यो रहता है । इसका एक वैज्ञानिक आधार है । हमारे ब्रह्मांड के 9 ग्रह अपनी अपनी किरणों से गर्भ मे पल रहे बच्चे को विकसित करते है ।
हर ग्रह अपने स्वभाव के अनुरूप बच्चे के शरीर के भागो को विकसित करता है । अगर कोई ग्रह गर्भ मे पल रहे बच्चे के समय कमजोर है तो उपाय से उसको ठीक किया जा सकता है ।
गर्भ से 1 महीने तक शुक्र का प्रभाव रहता है । अगर गर्भावस्था के समय शुक्र कमजोर है तो शुक्र को मजबूत करना चाहिए । अगर शुक्र मजबूत होगा तो बच्चा बहुत सुंदर होगा ।
और उस समय स्त्री को चटपटी चीजे खानी चाहिए । शुक्र का दान न करे । अगर दान किया तो शुक्र कमजोर हो जाएगा ।
कुछ अनाड़ी ज्योतिषी अधूरे ज्ञान के कारण शुक्र का दान करा देते है ।
दान सिर्फ उसी ग्रह का करे जो पापी और क्रूर हो और उसके कारण गर्भपात का खतरा हो ।
दूसरे महीने मंगल का प्रभाव रहता है । मीठा खा कर मंगल को मजबूत करे ।तथा लाल वस्त्र ज्यादा धारण करे ।
तीसरे महीने गुरु का प्रभाव रहता है । दूध और मीठे से बनी मिठाई या पकवान का सेवन करे तथा पीले वस्त्र ज्यादा धारण करे ।
चौथे महीने सूर्य का प्रभाव रहता है । रसों का सेवन करे तथा महरून वस्त्र ज्यादा धारण करे ।
पांचवे महीने चंद्र का प्रभाव रहता है । दूध और दही तथा चावल तथा सफ़ेद चीजों का सेवन करे तथा सफ़ेद ज्यादा वस्त्र धारण करे ।
छटे महीने शनि का प्रभाव रहता है । कशीली चीजों कैल्शियम और रसों के सेवन करे तथा आसमानी वस्त्र ज्यादा धारण करे ।
सातवें महीने बुध का प्रभाव रहता है । जूस और फलों का खूब सेवन करे तथा हरे रंग के वस्त्र ज्यादा धारण करे ।
आठवें महीने फिर चंद्र का तथा नौवें महीने सूर्य का प्रभाव रहता है । इस दौरान अगर कोई ग्रह नीच राशि गत भ्रमण कर रहा है तो उसका पूरे महीने यज्ञ करन चाहिए ।
जितना गर्भ ग्रहों की किरणों से तपेगा उतना ही बच्चा महान और मेधावी होगा । जैसी एक मुर्गी अपने अंडे को ज्यादा हीट देती है तो उसका बच्चा मजबूत पैदा होता है ।
अगर हीट कम देगी तो उसका चूजा बहुत कमजोर होगा । उसी प्रकार माँ का गर्भ ग्रहों की किरणों से जितना तपेगा बच्चा उतना ही मजबूत होगा ।
जैसे गांधारी की आँखों की किरणों के तेज़ से दुर्योधन का शरीर वज्र का हो गया था ।

ग्रीक हमलावर सिकंदर या अलक्षेन्द्र


आज तक भारतीयो को इतिहास में पढ़ाया गया है और आज भी पढ़ाया जा रहा है कि ग्रीक हमलावर सिकंदर या अलक्षेन्द्र ने भारतीय सीमान्त राजा पुरु या पोरस को हरा दिया और फिर उससे पूछ कि बोलो तुम्हारे साथ क्या सलूक किया जाये, तो पोरस ने जवाब दिया कि “वही जो एक राजा दुसरे राजा के साथ करता है” !! बड़े कमाल की बात है, मैसेडोनिया का यह अत्यंत महत्वाकांक्षी शासक जिसने अपने पिता फिलिप्स द्वितीय तक को, जिसने अपनी पांचवी रानी ओलम्पिया के पुत्र के लिए समूचे विश्व का सपना देखा था, भरी सभा में (पौसैनियस द्वारा) मरवा डाला था,… उस पिता को जिसने आठ रानियों के कई पुत्रो में मात्र अलक्षेन्द्र के लिए महास्वप्न देखा.. वो पुत्र जो विश्वप्रसिद्ध शिक्षकों अरस्तू, प्लेटो, इत्यादि द्वारा शिक्षित हुआ था, जिसने १६ वर्ष कि उम्र में ही युवराज बन, थ्रेस में खून कि नदियां बहा अपना साम्राज्य मजबूत बनाया, जिसने ग्रीस की प्राचीन महान सभ्यता और यूनानी नस्ल को विध्वंस करने में जरा भी शिकन नहीं दिखायी I वो जिसने परसिया या पारशीय राष्ट्र या फारस को वीभत्स रूप में विध्वंस किया, जिसने एशिया माइनर और मिश्र में अपने झंडे गाड़े और जो तात्कालिक विश्व के महानतम व सर्वाधिक ऐश्वर्यवान साम्राज्यों के समूह महा-राष्ट्र यानि राष्ट्रो के महाराष्ट्र — भारत वर्ष को पूरी लालसा से लीलने के लिए ही अपनी राजधानी पेल्ला, मैसेडोन से सिंधु की तरफ चला था .. उसने बैक्ट्रिया की ईंट से ईंट बजा दी .. बस सामने सिन्दुस्थान या भारतवर्ष ही था उसके विजय के लिए …फिर क्या हुआ ऐसा? वो सिकंदर, जिसने पारसियों की दस लाख की पैदल सेना को कुछ हजार सैनिक खोकर और यूनानियों की २०,००० की सेना को १२० सैनिक खोकर ही प्राप्त कर लिया था ..वो, जिसके जैसा रक्तपिपासु कमसेकम उसके देश के आसपास तो नहीं ही था, अपनी यूनानियों, मिस्रियों, बाल्कन (वाह्लीक),
इलियरिन लडाको से भरी विशाल सेना से लैस यह अतिअकांक्षी आक्रांता, कैसे सिंधु नदी पार कर भारतवर्ष की भूमि पर उतरते ही अचानक बदल गया ? यदि ऐसी सेना जिसने मैसेडोन यानि आज का इटली से लेकर सिंधु नदी या आज के पाकिस्तान तक अपनी सल्तनत बिछायी तो फिर अचानक ही कैसे भारत के एक छोटे से राजा पर मेहरबान हो दयालुता से अभिभूत हो अपने देश वापस चला गया ? वो महान आक्रान्ता, जिसने आँख और हाथ खोलते ही १६ साल के उम्र से मानवी सिरो को धड़ से अलग करने का ही काम किया, अचानक कैसे २६ वर्ष की उम्र में साधू बन अपने देश को चला गया? क्योंनहीं आज पूरा भारत यूनानी भाषा बोलता है और कच्छा पहनता है? वो सिकंदर जिसकी घुड़सवार सेना विश्व की सबसे खूंख्वार सेना थी, जिसने भारत वर्ष के सीमावर्ती प्रदेशो में अभिसार को तटस्थ बना अम्भी को पूर्व राज्य का लालच दे एकमात्र भारतीय शूरवीर राजा पुरु को हराकर भारतभूमि पर कब्ज़ा करने का सपना संजोया था, ऐसा ह्रदय परिवर्तन कैसे हुआ उसका? क्या गंगा किनारे शीर्षासन मुद्रस्थ हिन्दू साधू की संसार की मोहमाया त्यागने की घटना ने उसको बदल दिया? आखिर क्यों राजा पुरु को हराने के बाद उस महान सिकंदर का मन पुरु की बात “मेरे साथ वो व्यव्हार करो जो एक राजा दुसरे राजा के साथ करता है” मानने को कर गया? हमारी हर इतिहास की पुस्तक इसी प्रकार की कहानियां हमें सिखाती रहती हैं .. हम भी सिकंदर को सिकंदर महान कहते हैं ..क्यों?! मालूम नहीं … हम पूछते भी नहीं. … १३०० वर्षों के मुगलई और अंग्रेजी शासन ने हमारी बुद्धि भी कुंद कर दी … यूनान या यवनदेश, जिससे उत्पन्न हुआ आजका पश्चिमी समाज और खासकर अंग्रेजो का खड़ा किया गया झूठा वैश्विक साम्राज्य अपने को मानता है, वास्तव में मेडिटेरेनियन या “मध्य-धरातल” सागर के किनारे बसा ये छोटा सा जनसमुदाय भारतवर्ष से बाह्य सीमा पर स्थित म्लेच्छ राज्यों(भारतीय प्राचीन साहित्य में) में आता था .. वास्तव में इन स्थानो और आसपास के स्थानो को भारतीय आसुरी राज्य कहते थेI अलक्षेंद्र, मैसेडोन के सक्षम शासक का अत्यंत महत्वकांक्षी पुत्र था ..वह निस्संदेह कुशल लडाका था पर ये भी है के उसे पहले से ही एक बड़ा साम्राज्य विरासत में मिला था और खुद सिकंदर अत्यंत दुर्बुद्धि और आत्मकेंद्रित युवा था और इसी के कारन उसका वंश भी अपना राज्य उस सीमा तक बढ़ाया पाया I वह साम्राज्य, जो उनके स्वयं के लिए तो कलपनातीत था पर उन्हें विश्व के अधिकांश तात्कालिक विश्व पर स्थित हिन्दू साम्राज्य कि कोई जानकारी नहीं थीI हो भी नहीं सकती थी I यवन भौगोलिक इतिहासकार टॉलमी और उसी कि तरह भारत के महान राज्यो के बारे में बस सुनते ही रहते थे , जैसे “पॉलीबोथरा” कि कल्पना गंगा किनारे स्थित महान भारतीय साम्राज्य के शक्ति केंद्र पाटलिपुत्र के रूप में करना !उसी गलती को मेंस्थानीज एवं फिरसे अट्ठारहवी शतब्दी में विलियम जोन्स इत्यादि ने दुहराया और जिसे सारे अंग्रेज, जिन्होंने एक तथाकथित महान साम्राज्य बनाया, आज तक गा रहे हैं! भारत से इतर म्लेच्छों के लिए वह साम्राज्य काफी बड़ा हो सकता था पर, भारत के लिए तो वह मामूली ही कहा जायेगा! पर वास्तव में यवन कालातीत के कई दर्जन आक्रमणो (और कुछवर्षो के शासन) के बाद भी भारत के बारे में कल्पनाएँ ही करते थे ! पर, सन ३२७ ईसापूर्व में क्या हुआ था? सिकंदर के बारे में विश्व के कई लोग जानते थे और हैं, पर हम आज तक नहीं जानते उसके हश्र का पता भी कइयों को है !! सिकंदर कि सेना अपने अश्व सेना के लिए प्रसिद्ध थी और यही सेना और अपनी धूर्तता लेकर भारत को खा जाने के लिए आया था.. उसने सीमावर्ती राज्यों को अपनी तरफ भी मिला लिया और जो नहीं मिला उसको रास्ते से हटाने के लिए अपने क्रूर सेनापतियों जिसमे मेसेडोनियन लड़ाकों के साथ उसके वाह्लीक,मिश्री और पर्शियन सहयोगी भी थेI भारत की सीमा में पहुँचते ही पहाड़ी सीमाओं पर भारत के अपेक्षाकृत छोटे राज्यों अश्वायन एवं अश्वकायन की वीर सेनाओं ने कुनात, स्वात, बुनेर,पेशावर (आजका) में सिकंदर सेनाओंको भयानक टक्कर दीI मस्सागा ‘मत्स्यगराज’ राज्य में तो महिलाएं तक उसके सामनेखड़ी हो गयीं पर धूर्त यवनी ने मत्स्यराज को हत करने के बाद संधि का नाटक करके रात में हमला करके उस राज्य की राजमाता सहित पूरे राज्य को उसने तलवार से काट डाला उसमे कोई नहीं बचा.. एक बच्चा भी नहीं!! यही काम उसने दुसरे समीपी राज्य ओरा में भी किया, इसी लड़ाई में सिकंदर की एड़ी में तीर लगा, जिसको आधार बनाकर अतियुक्त सिकंदर के बड़बोले प्रशस्तिकारो ने अकाइलिस की कथा बनाई! अब इसके आगे पौरव राज्य था जिसके राजा महाभारत कालीन कुरु वंशी के सम्बन्धी पुरु वंश के राजा पुरु थे जिसे यवन पोरस बोलते थे और सिंधु तट पर उनके विनाश के लिए यवनी सेना करीब १०-१२ प्रमुख सेनापतियों के साथ बस तैयार ही थीI अपने जासूसों और धूर्तता के बल पर सिकंदर के सरदार युद्ध जीतने के प्रति पूर्णतः विश्वस्त थे, पर युद्ध शुरू होते ही उसी दिन यह विदित हो गया की पौरव कौन हैं और क्या हैं? राजा पुरु के शत्रु लालची अम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने करीब ३७००० की सेना, जिसमे ७००० घुड़सवार थे, राजा पुरु की सेना जिसमे २०,००० की सेना के खिलाफ, जिसमे २००० घुड़सवार थे और कई नागरिक योद्धा थे, निर्णायक युद्ध के लिए तैयार था और जिसमे जीत के प्रति वो आश्वस्त था I सिकंदर की सेना में कई युद्धो के घुटे योद्धा थे जिसमे कई उसके विजित प्रदेशो के सैनिक भी थे जिन्हे विजित राज्यो को विद्रोह से रोकने के लिए भी सुदूर तक ले जाया गया था, भारतीय सीमावर्ती राज्यों से संघर्ष में ही सिकंदर (के सेनापतियों) को अनुमान हो गया था की आगे क्या हो सकता हैI पर सनकी सिकंदर अपने ही घमंड में इस भारतीय राज्य को नेस्तनाबूद करने को उद्दत था क्योंकि उसे भारतवर्ष पर राज्य करना था!! अपनी सनक में वो बहुत कुछ नहीं देख पाया जनता तो वो और भी कम था .. राजा पुरु के पास करीब २०० की गजसेना थी ! यहाँ जानने वाली बात है की हाथी मात्र अफ्रीका एवं भारत में ही पाये जाते हैं, यवनो ने हाथी सेना क्या हाथी तक कभी नहीं देखे थे ! यवनी कुशल घुड़सवारी के महारथी थे और अधिकतर युद्ध उन्होंने इसी सेना और अपने युद्धक हथियारो जैसे कैटापल्ट इत्यादि के बल पर ही जीते थे .. वर्षो तक यवनी स्वयं को ही समूचे विश्व के स्वामी समझते रहे थे, और यही सब उन्होंने अपने इतिहास में भी रचा. ! पहले से ही क्षतिप्राप्त यवनी सेना ने अगले दिन जो झेला उसने उनके दिमाग ठीक कर दिए .. राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी सात फूट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े! इसके पहले झेलम नदी पर दोनों सेनाओं के बीच कई दिनों तक सतर्क आशंकित निगाहो का आदानप्रदान होता रहा ! भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफूटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई कई शत्रु सैनिको और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिको भी मार गिरा सकता था ! इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिलीI यवनी सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए, यवनी सरदारो के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अन्तः प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया ! कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उनतक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है! राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत- भवकपाली ) को अपने भले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया, ऐसा मैसेदैनियन सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था, कोई आजतक सिकंदर, सिकंदर के अश्व क्या उसकी विशिष्ट अन्तः टुकड़ी तक को खरोंच नहीं दे पाया था ! सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था, मैसेडोनिअ का महान विश्वविजेता बस पल भर का मेहमान था की तभी राजा पुरु ठिठक गया ! यह डर नहीं था, शायद यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, बहरहाल तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहाँ से भगा ले गए I भारत में शत्रुओं के उत्तरपश्चिम से घुसने के दो ही रास्ते रहे हैं जिसमे सिंधु का रास्ता कम खतरनाक माना जाता था! क्यों? सिकंदर सनक में आगे तक घुस गया जहाँ उसकी पलटन को भरी क्षति उठानी पड़ी, पहले ही भारी क्षति उठाकर यवनी सेनापति अब समझ गए थी की अगर युद्ध और चला तो सारे यवनी यहीं नष्ट कर दिए जायेंगे, यह निर्णय पाकर सिकंदर वापस भागा पर उस रास्ते से नहीं भाग पाया जहाँ से आया था और उसे दुसरे खतरनाक रास्ते से गुजरना पड़ा जिस क्षेत्र में प्राचीन क्षात्र या जाट निवास करते थे (आज भी करते हैं) उस क्षेत्र को जिसका पूर्वी हिस्सा आजके हरयाणा में स्थित था और जिसे “जाटप्रदेश” कहते थे !! इस प्रदेश में पहुँचते ही सिकंदर का सामना जाट वीरों से (और पंजाबी वीरों से सांगल क्षेत्र में) हो गया और उसकी अधिकतर पलटन का सफाया जाटो ने कर दिया, भागते हुए सिकंदर पर एक जाट सैनिक ने बरछा फेंका जो उसकी वक्ष कवच को बींधता हुआ पार हो गया I यह घटना आजके सोनीपत नगर के पास हुआ था (मैं उस वीर की पहचान जानने का प्रयास कर रहा हु) I इस हमले में सिकंदर तुरंत नहीं मरा बल्कि आगे जाकर जाटप्रदेश की पश्चिमी सीमा गांधार में जाकर उसके प्राणपखेरू उड़ गए!! (यवनी इतिहासकारों ने लिखा– सिकंदर बेबीलोन (आधुनिक इराक) में बीमारी से मरा!- ३२६ ई. पू.) महान यवनराज्य के बड़बोले इतिहासकारों के लिए ये अत्यंत अपमानजनक एवं असहनीय था !! सिकंदर के दरबारियों एवं रक्षकों ने इस अपमान से बचने के लिए वो कथा बनायीं जो सिकंदर की महिमामंडित छवि से मेल खा सके! और उन्होंने पोरस और सिकंदर की अतिश्योक्तिपूर्ण नाटकीय गाथा बनायीं !! पर हर विदेशी ने पूरा गप्प नहीं लिखा प्लूटार्क ने लिखा — सिकंदर राजा पुरु की २०, ००० की सेना के सामने तो ठहर नहीं पाया आगे विश्व की महानतम राजधानी की विशालतम सम्राट धनानंद की सेना ३ ५० ००० की सेना उसका स्वागत करने के लिए तैयार थी जिसमे ८०,००० घुड़सवार, ८००० युद्धक रथ एवं ७०००० विध्वंसक हाथीसेना थी उसके सैनिक मुर्गी- तीतर जैसे काट दिए जाते ..I उस महान सिकंदर की महान सेना में किसने वापस लौटे ये तो बस सोचने वाली ही बात है!! पर, आज हम वो क्यों जानते हैं जो सभी यवनी- ग्रीक अपनी स्वमुग्धता में मानते हैं? ग्रीको की शिक्षा यूरोपियनों ने ली और अंग्रेजों ने ग्रीक-रोमनों की सभ्यता से प्रेरणा ली और वही इतिहास अपने निवासियों को पढ़ाया !! व इतिहास अंग्रेजों के साथ भारत में आ गया और अंग्रेजी गुलामी के साथ हम आज भी सिकंदर को महान और प्रथम भारतीय वीरो में से एक राजा पुरु को पराजित एवं लज्जित मानते हैं…. शर्म नाक है, पर उससे भी अधिक शोचनीय है की हम आज भी नहीं जानतेI हम आज भी अपने नायको को नहीं जानते, क्योंकि गुलामी हमारी मानसिकता में रचबस गयी है, हमारी पहचान मुगलो और अंग्रेजो की गुलामी से अधिक नहीं है आज भी कई, या शायद सभी भारत को विदेशी इतिहास से समझ रहे हैं, ग्रीक और रोमन सभ्यता को महानतम समझ रहे हैं.. और उसी ग्रीको-रोमन साम्राज्य से विशुद्ध अनुचर की तरह अंग्रेजो को वापस इस देश पर शासन करने का आमंत्रण देने के लिए अपने प्रधानमत्री को भेजते हैं!! कदाचित, हम अभी जिन्दा नहीं हुए हैं !

Tuesday, 27 October 2015

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कुछ समय पहले जापान में आये भूकंप के बाद बचाव कार्य का एक दल एक महिला के पूर्ण रूप से ध्वस्त हुए घर की जांच कर रहा था. बारीक दरारों में से महिला का मृत शरीर दिखा, लेकिन वो एक अजीब अवस्था में था. महिला अपने घुटनों के बल बैठी थी. ठीक वैसे ही जैसे मंदिर में लोग भगवान के सामने नमन करते है. उसके दोनों हाथ किसी चीज़ को पकडे हुए थे और भूकंप से उस महिला की पीठ और सर को काफी क्षति पहुंची थी.
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काफी मेहनत के बाद दल के सदस्य ने बारीक दरारों में कुछ जगह बनाकर अपना हाथ महिला की तरफ बढ़ाया. बचाव दल को उम्मीद थी कि शायद महिला जिंदा हो, लेकिन महिला का शरीर ठंडा हो चूका था और बचाव दल समझ गया की महिला मर चुकी है.
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बचाव दल उस घर को छोड़ दूसरे मकानों की ओर चल पड़ा. बचाव दल के प्रमुख का कहना था कि, 'पता नहीं क्यूँ मुझे उस महिला का घर अपनी तरफ खींच रहा था. कुछ था जो मुझसे कह रहा था कि मैं इस घर को ऐसे छोड़ कर न जाऊं और मैंने अपने दिल की बात मानने का फैसला किया.'
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उसके बाद बचाव दल एक बार फिर उस महिला के घर की तरफ पहुंचा. दल प्रमुख ने मलबे को सावधानी से हटा कर बारीक दरारों में से अपना हाथ महिला की तरफ बढ़ाया. महिला के शरीर के नीचे की जगह को हाथों से टटोलने लगा. तभी उनके मुंह से निकला, 'बच्चा... यहाँ एक बच्चा है.'
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अब पूरा दल काम में जुट गया. सावधानी से मलबा हटाया जाने लगा. तब उन्हें महिला के मृत शरीर के नीचे एक टोकरी में रेशमी कम्बल में लिपटा हुआ 3 माह का एक बच्चा मिला. दल को समझ में आ चुका था कि महिला ने अपने बच्चे को बचाने के लिए अपने जीवन का त्याग किया है.
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भूकंप के दौरान जब घर गिरने वाला था तब उस महिला ने अपने शरीर से सुरक्षा देकर अपने बच्चे की रक्षा की थी. डॉक्टर भी जल्द ही वहां आ पहुंचे. दल ने जब बच्चे को उठाया तब बच्चा बेहोश था.
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बचाव दल ने बच्चे का कम्बल हटाया तब उन्हें वहां एक मोबाइल मिला, जिसके स्क्रीन पर सन्देश लिखा था, "मेरे बच्चे अगर तुम बच गए तो बस इतना याद रखना कि तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्यार करती थी."
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Monday, 26 October 2015

राधिका श्रीकृष्णा 
हल्दीघाटी का युद्ध--
1576 में हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच ऐसा युद्ध हुआ, जो पूरी दुनिया के लिए आज भी एक मिसाल है.......... महाराणा प्रताप ने शक्तिशाली मुगल बादशाह अकबर की 85000 सैनिकों वाले विशाल सेना के सामने अपने 20000 सैनिक और थोड़े-से संसाधनों के बल पर स्वतंत्रता के लिए वर्षों संघर्ष किया......... 30 वर्षों के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी न बना सका....
हल्दीघाटी का युद्ध याद अकबर को जब आ जाता था ,
कहते है अकबर महलों में, सोते-सोते जग जाता था
प्रताप की वीरता ऐसी थी कि उनके दुश्मन भी उनके युद्ध-कौशल के कायल थे.......... माना जाता है कि इस योद्धा की मृत्यु पर अकबर की आंखें भी नम हो गई थीं। उदारता ऐसी कि दूसरों की पकड़ी गई बेगमों को सम्मानपूर्वक उनके पास वापस भेज दिया था............. इस योद्धा ने साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया और जंगल के कंद-मूल खाकर लड़ते रहे..
26 फीट का नाला एक छलांग में लांघ गया था प्रताप का चेतक
कहते हैं कि जब कोई अच्छाई के लिए लड़ता है तो पूरी कायनात उसे जीत दिलाने में लग जाती है........ ये बात हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि उनका घोड़ा चेतक भी उन्हें जीत दिलाने के लिए अंतिम समय तक लड़ता रहा। चेतक की ताकत का पता इस बात से लगाया जा सकता था कि उसके मुंह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी........... जब मुगल सेना महाराणा प्रताप के पीछे लगे थी, तब चेतक प्रताप को अपनी पीठ पर लिए 26 फीट के उस नाले को लांघ गया, जिसे मुगल पार न कर सके....
208 किलो का वजन लेकर लड़ते थे प्रताप
महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था। उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो… और लम्बाई 7 फीट 5 इंच थी। यह बात अचंभित करने वाली है कि इतना वजन लेकर प्रताप रणभूमि में लड़ते थे.....
I Support Giriraj Singh ने 2 नई फ़ोटो जोड़ी.
इसे पढकर जानिये क्या है छोटा राजन और दाउद इब्राहिम के बीच की HiSTORY -
दाउद इब्राहिम का सारा साम्रज्य खड़ा करने के पीछे जिस व्यक्ति का दिमाग और मैनेजमेंट का कमाल था वो था छोटा राजन ,दाउद भी उस पर काफी भरोसा करता था .....ड़ी कम्पनी को बनाने और ताकतवर बनाने में छोटा राजन ने अपनी सारी उर्जा लगा दी थी और दाउद के बाद वो नम्बर 2 कहलाया जाने लगा था ,इसलिए गैंग के बाकी सदस्य शरद शेट्टी ,छोटा शकील आदि उससे जलते थे और उसके खिलाफ दाउद के कान भरते रहते थे की भाई छोटा राजन के पर कतरों वरना वो एक दिन आपको भी पीछे छोड़ देगा ,वो आपसे भी ज्यादा ताकतवर होता जा रहा है आदि आदि
जब पाकिस्तान की एजेंसी ISI ने दुबई में हिन्दुस्तान से भागे हुए सभी मुसलमान माफिया Dons को बम्बई में बम-धमाके करने के लिए एक मंच पे आमंत्रित किया था और अनेक बैठकें बुलाई थी तब दाउद इब्राहिम और गैंग के अन्य सदस्यों द्वारा छोटा राजन को उन बैठकों में जानबुझकर शामिल नहीं किया गया जिससे छोटा राजन हैरान था की ऐसा क्यों है और ये कौन लोग हैं जिनके साथ भाई आजकल घंटो-२ बैठकों में व्यस्त रहता है
जब उसने मालुम करने की कोशिश की तो छोटा शकील ने राजन के आदमियों को झिड़क कर ये कहते हुए भगा दिया था की उससे कहो की वो अपने काम से काम रखे ,ये बैठक सिर्फ मुसलमानों के लिए हैं ,किसी काफिर को इनमें शामिल नहीं किया जा सकता .....ये काफिर वाला तर्क छोटा राजन को बहुत चुभा और रही-सही कसर तब पूरी हो गयी जब मुंबई में बम-धमाके हुए और छोटा राजन को तब उन बैठकों की असलियत पता चली और उसे बेहद दुःख पहुंचा की दाउद इब्राहिम ने हिन्दुस्तान का होते हुए भी पाकिस्तान के साथ मिलकर इन धमाकों को हिन्दुस्तान में सिर्फ मुस्लिम होने के कारण मुमकिन करवाया और फिर राजन ने विरोध में कम्पनी के सभी कामों से अपने हाथ खींच लिए
और जब एक रात उसे सूचना मिली की दाउद गैंग अब उससे छुटकारा पाने की सोच रहा है और छोटा शकील उसे मरवाने वाला है तो वह दुबई से उनका साथ छोडकर भाग निकला और फिर कुछ छोटे देशों जैसे थाईलैंड,मलेशिया आदि में बस गया और अपना खुद का गैंग खड़ा करना शुरू किया
मुंबई में हुए बम-धमाकों का जो जबर्दस्त रिएक्शन हुआ उससे एक बार तो दाउद भी हिल गया ,उसे इतने कड़े रिस्पोंस की उम्मीद नहीं थी ,सब मीडिया में उसे देश का गद्दार और देशद्रोही कहा जाने लगा ,उसके अपने गैंग में शामिल बहुत से हिन्दुओं ने उसे धिक्कारते हुए गैंग छोड़ दी ......रोज-२ की मिल रही लानतों से तंग आकर उसने कोशिश की खुद का हाथ इसमें से हटाने की और सारा दोष मेमन परिवार पर डालने की असली हाथ मेरा नहीं इनका है मैंने तो बस छोटी सी मदद उपलब्ध करवाई थी लेकिन उसके खिलाफ माहौल इतना अधिक गुस्से में था की उसकी अपना चेहरा बचाने की ये कोशिश नाकाम साबित हुई
छोटा राजन द्वारा बिना बताये अचानक दुबई छोडकर जाने की खबर दाउद इब्राहिम और कम्पनी को लगी तो उनके होश उड़ गये ,वो जानते था की बिना भारतीय एजेंसियों RAW,IB आदि की मदद के छोटा राजन दुबई छोडकर नहीं जा सकता था क्योंकि उसका पासपोर्ट दाउद ने अपने पास रखा हुआ था ,अब उन्हें दुबई के अपने ठिकानों पर खतरा मंडराता नजर आया क्योंकि छोटा राजन उनके दुबई तथा भारत में भी फैले सारे नेटवर्क के बारे में अच्छे से जानता था और उसकी बदौलत भारतीय एजेंसियां बड़ी आसानी से दाउद एंड कम्पनी तक पहुँच सकती थी ,इसलिए दाउद ने दुबई से अपना बोरिया बिस्तर बांधकर पाकिस्तान में जाने का निश्चय किया ,पाकिस्तान ने बिना किसी क़ानूनी या अन्य भय के हर प्रकार की मदद और इन्तेजाम का भरोसा दिया और इस तरह उसने अपना साम्राज्य और ठिकाना दुबई से पाकिस्तान के कराची में शिफ्ट कर दिया
उसके बाद मुंबई में शुरू हुई दाउद इब्राहिम और छोटा राजन के गैंग्स के बीच में प्रसिद्ध गैंगवार जिसमें दोनों ने एक दुसरे के कई आदमियों और गुर्गों को मरवाया
हमारे देश में मुंबई में धमाके हजारों निर्दोष लोगों को मारने वाले कमीनों को जिन्हें हमारा कानून ना तो पकड़ पाया और ना ही सजा दे पाया उनमें से बहुतों को छोटा राजन ने मरवाया और देश का बदला लिए ,इसलिए दाउद ने छोटा राजन पर भी कई बार जानलेवा हमले करवाए
जनवरी 2005 में जब इस खबर का पता लगा की दुबई में दाउद इब्राहिम की बेटी और पाकिस्तानी क्रिकेटर जावेद मियाँदाद के बेटे की आपस में शादी होने वाली है तब भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के एक अधिकारी ने निश्चय किया इस मौके पर हिन्दुस्तान के दुश्मन दाउद इब्राहिम को वहीँ पर खत्म करने का ,उस भारतीय अधिकारी और छोटा राजन के बीच बातचीत हुई ,छोटा राजन ने अपने दो ख़ास और माहिर शूटर भेजे इस ऐतिहासिक कार्य के लिए और उस भारतीय सुरक्षा अधिकारी ने पूरा प्लान तैयार किया ,जानते हैं उस अफसर का नाम क्या था ?? वो अफसर था वर्तमान में मोदी जी द्वारा देश की सुरक्षा एजेंसियों का प्रमुख बनाये जाने वाले सर अजित डोवाल
अजित डोवाल ने सारी प्लानिंग कर ली थी दाउद को खत्म करने की किन्तु आखिरी समय में दाउद को इसकी भनक लग गयी और उसने महाराष्ट्र की उस समय की सत्ता में बैठी कोंग्रेस सरकार में मौजूद अपने परिचित नेताओं से सम्पर्क किया और उन्हें इसकी जानकारी दी और तुरंत महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कुछ पुलिस अधिकारी उस जगह पहुंचें जहाँ छोटा राजन के वे शूटर सुरक्षा एजेंसियों और अजित डोवाल के संरक्ष्ण में पूरी प्लानिंग कर रहे थे और उन दोनों को ये कहके हिरासत में ले लिए की ये दोनों अपराधी हैं और अपराधी को अपराधी के खिलाफ नहीं लगाया जा सकता और ना ही उन पर भरोसा किया जा सकता है
कितने दुःख की बात है की जिस प्रकार से पाकिस्तान खुलकर हमारे देश के दुश्मन दाउद इब्राहिम की खुल के हर प्रकार की मदद करता है वैसी खुल के मदद हमने देश के प्रति अपना प्रेम और वफादारी होने के कारण दाउद से पंगा लेकर अपनी जान खतरे में डालने वाले गैंग्स्टर छोटा राजन को कभी नहीं की frown इमोटिकॉन
Mohan Bhagwat ji
"ईश्वर ही किसी भी कर्म का प्रयोजन है और ईश्वर ही किसी भी कर्ता का प्रेरक भी , व्यक्ति केवल निमित मात्र होता है ; जिन्हें न तो ईश्वर का ज्ञान हो और न ही स्वयं का बोध वही मिथ्याभिमान से ग्रसित होते हैं जो अंततः उनके अंत का कारन बनता है।
हमारे जीवन की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए हमें हमारे अस्तित्व के प्रभाव से उसके उत्पत्ति के कारन तक पहुंचना होगा पर यह तभी संभव है जब हम अपनी वास्तविकता को स्पष्ट रूप से पहचानें एवं स्वीकार करें ; जब तक हमारा परिचय भौतिकवाद पर आधारित होगा स्वाभाविक है की हम स्वयं को नश्वर रूप में ही जानेंगे।
जो अपने सीमित दृष्टि से समस्याओं एवं उनके सन्दर्भ को देखते हैं उन्हें लगता है की वर्त्तमान की समस्त समस्याओं का आध्यात्मिकता से कोई सम्बन्ध ही नहीं और न ही उनका समाधान उससे संभव है पर जब तक हम परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न समस्याओं के प्रभाव से विचलित होकर प्रतिक्रिया करते रहेंगे हमारे लिए समस्याओं के मूल तत्व तक पहुँच पाना संभव ही नहीं।
केवल समस्याएं ही नहीं बल्कि समाधान भी एक दुसरे से परस्पर-निर्भर व् आश्रित हैं, ऐसे में, अगर व्यक्ति की सोच ही वर्त्तमान के किसी भी समस्या का कारण है तो स्वाभाविक है की व्यक्ति के विवेक के विकास से ही समाधान की सम्भावना भी संभव है ; वर्त्तमान के परिदृश्य के सन्दर्भ में जीवन के लिए आध्यात्मिकता का यही महत्व है।
विज्ञानं भी मानता है की पहले मनुष्यों के पास भी बंदरों की ही तरह पूछ होती थी. पर प्रकृति द्वारा प्रदत्त जिन अंगों का प्रयोग मनुष्य के लिए आवश्यक न रहा और मनुष्यों ने उसका प्रयोग बंद कर दिया उसे प्रकृति ने वापस ले लिया। हमारे शरीर में ऐसे कई अंग है जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। एक शोध के अनुसार गत २०,००० वर्षों के मानवीय उत्क्रांति की प्रक्रिया के अध्यन में विज्ञानं ने पाया है की मानवीय मस्तिष का आकार भी छोटा हो गया है ; क्या यह पर्याप्त प्रमाण नहीं की हम धीरे धीरे मनुष्य से मशीन बनते जा रहे हैं ?
जीवन निश्चित रूप से अनिश्चित है और मृत्यु अनिश्चित पर निश्चित, ऐसे में, जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्या होना चाहिए ? निश्चित मृत्यु की संतुष्टि या फिर अनिश्चित जीवन के सुख, सुविधा व् संसाधन ? निर्णय के सही होने के लिए निर्णय के आधार का सही होना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब हम अपनी वास्तविकता को पहचाने जो आध्यात्म से ही संभव है ;
सफल जीवन हो सकता है की सुखमय हो पर जीवन की सफलता कई कारकों पर आश्रित होती है पर संतुष्ट जीवन और उसकी तृप्ति के लिए संसाधन नहीं बल्कि प्रयोग के माध्यम से जीवन की उपयोगिता निर्णायक होती है ;
आवश्यकता है हमें भौतिकवाद से ऊपर उठकर संवेदनशील बनने की ताकि हम समस्याओं को महसूस कर सकें और समाधान सोच सकें, यही जीवन के उत्क्रांति की आदर्श प्रक्रिया है; और यही समझदारी भी होगी। "
महर्षि वाल्मीकि जी की कहानी बडी अर्थपूर्ण है । सत्पुरुषों की संगति में आकर लोगों की उन्नति कैसे होती है, महर्षि वाल्मीकि इसका एक महान उदाहरण हैं । नारदमुनि के संपर्क में आकर वे एक महान ऋषि, ब्रम्हर्षि बने, तथा उन्होंने ‘रामायण’की रचना की, जिसे संपूर्ण विश्व कभी भूल नहीं सकता । पूरे विश्व के महाकाव्यों में से वह एक है । दूसरे देशों के लोग उसे अपनी-अपनी भाषाओंमें पढते हैं । रामायणके चिंतनसे हमारा जीवन सुधर सकता है । हमें यह महाकाव्य देनेवाले महर्षि वाल्मीकि को हम कभी भूल नहीं सकते । इस महान ऋषि एवं चारण को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम ।
महर्षि वाल्मीकि की रामायण संस्कृत भाषाका पहला काव्य है, अत: उसे ‘आदि-काव्य’ अथवा ‘पहला काव्य’ कहा जाता है तथा महर्षि वाल्मीकिको `आदि कवि’ अथवा ‘पहला कवि’ कहा जाता है ।
जिस कविने ‘रामायण’ लिखी तथा लव एवं कुशको यह गाना तथा कहानी सिखाई, वे एक महान ऋषि, महर्षि वाल्मीकि थे । यह व्यक्ति महर्षि तथा गायक कवि कैसे बने यह बडी बोधप्रद कहानी है । महर्षि वाल्मीकि की रामायण संस्कृत भाषामें है तथा बहुत सुंदर काव्य है ।
महर्षि वाल्मीकि की रामायण गायी जा सकती है । कोयल की आवाजकी तरह वह कानों को भी बडी मीठी (कर्णप्रिय) लगता है । महर्षि वाल्मीकिको काव्यके पेडपर बैठी तथा मीठा गानेवाली कोयल कहा गया है । जो भी रामायण पढते हैं, प्रथम महर्षि वाल्मीकि को प्रणाम कर तदुपरांत महाकाव्य की ओर बढते हैं ।
महाकाव्य रामायण की रचना
नारदमुनि के जानेके पश्चात महर्षि वाल्मीकि गंगा नदी पर स्नान करने गए । भारद्वाज नामका शिष्य उनके वस्त्र संभाल रहा था । चलते-चलते वे एक निर्झर के पास आए । निर्झरका पानी बिल्कुल स्वच्छ था । धर्माचा विजय झाला ! – शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती वाल्मीकि ने अपने शिष्य से कहा, `देखो, कितना स्वच्छ पानी है, जैसे किसी अच्छे मानवका स्वच्छ मन! आज मैं यहीं स्नान करूंगा।’
महर्षि वाल्मीकि पानी में पांव रखने हेतु उचित स्थान देख रहे थे, तभी उन्हें पंछियोंकी मीठी आवाज सुनाई दी । ऊपर देखनेपर उन्हें दो पंछी एक साथ उडते हुए दिखे । उन पंछियोंकी प्रसन्नता देखकर महर्षि वाल्मीकि अति प्रसन्न हुए ।
तभी तीर लगने से एक पंछी नीचे गिर गया । वह एक नर पक्षी था । उसकी घायल हालत देखकर उसकी साथी दुख से चिल्लाने लगी । यह ह्रदयविदारक दृश्य देखकर महर्षि वाल्मीकि का ह्रदय पिघल गया । पंछीपर किसने तीर चलाया यह देखने हेतु उन्होंने इधर-उधर देखा । तीर-कमानके साथ एक आखेटक निकट ही दिखाई दिया । आखेटकने (शिकारीने) खाने हेतु पंछीपर तीर चलाया था । महर्षि वाल्मीकि बडे क्रोधित हुए । उनका मुंह खुला, और ये शब्द निकल गए : `तुमने एक प्रेमी जोडे में से एककी हत्या की है, तुम खुद अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहोगे !’ दुखमें उनके मुंहसे एक श्लोक निकल गया । जिसका अर्थ था, तुम अनंत कालके लंबे सालतक शांतिसे न रह सकोगे । तुमने एक प्रणयरत पंछी की हत्या की है ।
पंछीका दुख देखकर महर्षि वाल्मीकि ने बडे दुखी होकर आखेटक को (शिकारीको) शाप दिया; किंतु किसी को शाप देनेसे वे भी दुखी हो गए । उनके साथ चलने वाले भारद्वाज मुनिके पास उन्होंने अपना दुख प्रकट किया । महर्षि वाल्मीकिके मुंहसे श्लोक निकल जानेके कारण उन्हें भी आश्चर्य हुआ था । उनके आश्रम वापिस आने पर तथा उसके पश्चात भी वे श्लोक के विषयमें ही सोचते रहे ।
महर्षि वाल्मीकि का मन अभी भी उनके मुंहसे निकले श्लोकका ही विचार कर रहा था, कि सृष्टिके देवता भगवान ब्रह्मा स्वयं उनके सामने प्रकट हुए । उन्होंने महर्षि वाल्मीकिसे कहा, `हे महान ऋषि, आपके मुंहसे जो श्लोक निकला, उसे मैंने ही प्रेरित किया था । अब आप श्लोकों के रूपमें ‘रामायण’ लिखेंगे । नारद मुनिने तुम्हें रामायणकी कथा सुनाई है । तुम अपनी आंखों से सब देखोगे । तुम जो भी कहोगे, सच होगा । तुम्हारे शब्द सत्य होंगे । जबतक इस दुनिया में नदियां तथा पर्वत हैं, लोग ‘रामायण’ पढेंगे । ’ भगवान ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा आशीर्वाद दिया और वे अदृश्य हो गए ।
महर्षि वाल्मीकिी ने ‘रामायण’ लिखी । सर्वप्रथम उन्होंने श्रीराम के सुपुत्र लव एवं कुश को श्लोक सिखाए । उनका जन्म महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में हुआ तथा वहीं पर वे बडे हुए ?

Sunday, 25 October 2015

आ गया "Apache" फाईटर हेलीकोप्टर
@बेंग्लोर एयरपोर्ट .. जय हिन्द
कल रात नेट जीयो पर वॉइस vice प्रोग्राम देखा । इसमें फ्रांस में मुस्लिमों के खिलाफ बढ़ते नफरत के बारे में दिखाया गया था ।
कई इस्लामिक देशों से हर महीने लाखो मुस्लिम अच्छी, बेहतर और खुशहाल जिंदगी की तलाश में पश्चिमी देशो में शरणार्थी बनकर वहां रहने देने की भीख मांगते है । वैसे भी एक अजीब विडंबना है की ये मुस्लिम खुद के देश को बर्बाद कर देते है दोखज बना देते है । नरक बना देते है फिर ये अच्छी जिंदगी की उम्मीद में ईसाई राष्ट्र या भारत जैसे हिंदू बहुल देश का रूख करते है ।
ॉइस में दिखाया गया कि फ्रांस में एक नई राजनीतिक पार्टी का उदय हुआ है जिसका नाम नेशनलिस्ट पार्टी है उस पार्टी को महज पांच साल में ही अपार सफलता प्राप्त हुई है और उस पार्टी का मुख्य उद्देश्य है फ्रांस में से मुसलमान को खत्म कर देना और फ्रांस में बनी तमाम मस्जिद को नष्ट कर देना मजे की बात ये है की इस पार्टी की मौजूदा प्रमुख मात्र एक 26 साल की युवा लड़की है जो अपने भाषणो से फ़्रांस में बहुत लोकप्रिय हो गई है ।
फ्रांस में होने वाले कुल बलात्कारों में से 91% बलात्कार प्रवासी मुस्लिम करते है और पिछले साल फ़्रांस की पत्रिका शर्ली एब्दो और एक मॉल पर भी आतंकी हमलो में मुस्लिम शरणार्थियो का ही हाथ था ।
आज नहीं तो कल यही स्थिति भारत में भी पैदा हो जाएगी
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Saturday, 24 October 2015

श्री लंका की रामायण अनुसंधान कमेटी ने तो पूरी तरह अनुसंधान करके अपना काम कर दिया है .. उसने रामायण कालीन रावण के एअरपोर्ट तक खोजे है .
पिछले 9 वर्षों से ये कमेटी श्रीलंका का कोना कोना छान रही थी जिसके तहत कई छुट पुट जानकारी व अवशेष भी मिलते रहे, परन्तु पिछले 4 सालों में लंका के दुर्गम स्थानों में की गई खोज के दौरान रावण के 4 हवाईअड्डे हाथ लगे है. कमेटी के अध्यक्ष अशोक केंथ का कहना है कि रामायण में वर्णित लंका वास्तव में श्री लंका ही है जहां उसानगोडा , गुरुलोपोथा, तोतुपोलाकंदा तथा वरियापोला नामक चार हवाईअड्डे मिले हैं.
रावण के पास वाकई पुष्पक विमान था इस बात के कई प्रमाण हैं. लेकिन यदि आप सोचते हैं कि रावण के पास सिर्फ एक विमान था या लंका में सिर्फ एक ही विमान मौजूद था जिसका प्रयोग लंकापति रावण करता थआ तो ऐसा नहीं है. लंका में ढ़ेरों विमान मौजूद थे और इन विमानों के आवागमन के लिए हावईअड्डे भी थे. रमायण में ऐसे 6 हवाईअड्डों का जिक्र है जिसमें से 4 की खोज वैज्ञानिकों ने कर ली है.
इसी पहाड़ी पर ये भी सबूत है कि उस पुष्पक विमान की खराबी को बनाने के लिए भी जगह बनी हुयी थी ..