Monday, 21 August 2017

अहंकार का बोझ ))))))))))
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एक बार एक राजा के राज्य में एक पहुंचे हुए महात्मा जी का आगमन हुआ. महात्मा जी की कीर्ति राजा ने सुन रखी थी इसलिए पूरे राजसी अंदाज़ में हीरे-जवाहरात और उत्तम भोग से भरे भेंट के कई थाल लिए हुए वह उनके दर्शन को पहुंचा.
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महात्मा जी उस समय कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे. उन्होंने राजा को संकेत में बैठने का निर्देश दिया. महात्मा जी सबसे विदा लेकर राजा के पास पहुंचे तो राजा ने भेंट के थाल महात्मा जी की ओर बढ़ा दिए.
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महात्मा जी थोड़े से मुस्कुराए. हीरे-जवाहरातों को भरे थालों को उन्होंने छुआ तक नहीं. हां बदले में एक सूखी रोटी अपने पास से निकाली और राजा को देकर कहा- इसे खा लीजिए.
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राजा ने सूखी रोटी देखी तो उसका मन कुछ बिदका पर लगा कि महात्मा का दिया प्रसाद है, खा ही लेना चाहिए. उसने रोटी खाई पर रोटी सख्त थी. राजा से चबायी नहीं गई.
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तब महात्मा जी ने कहा- जैसे आपकी दी हुई वस्तु मेरे काम की नहीं है उसी तरह मेरी दी हुई वस्तु आपके काम की नहीं. हमें वही लेना चाहिए जो हमारे काम का हो. अपने काम का श्रेय भी नहीं लेना चाहिए.
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बिना आवश्यकता लिया किसी से लिया हुआ एक कंकड-पत्थर भी बहुत भारी चट्टान के बोझ जैसा हो जाता है. परमार्थ के लिए लिया गया विपुल धन भी फूलों के हार जैसा है जिसे धारण करना चाहिए.
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मुझे यदि किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता होगी तो मैं स्वयं याचक की तरह आपके पास आउंगा. उस समय मैं आवश्यकता अनुसार दान स्वीकार करूंगा परंतु आज तो यह मेरे लिए बोझ जैसा ही है.
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राजा इन बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ. राजा जब जाने को हुआ तो महात्मा जी उसे दरवाजे तक छोड़ने आए.
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राजा ने पूछा- महात्मन मैं जब आया था तब आपने मेरी ओर देखा तक नहीं था, अब बाहर तक छोड़ने आ रहे हैं. ऐसा परिवर्तन क्यों ?
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महात्मा जी बोले- बेटा जब तुम आए थे तब तुम्हारे साथ अहंकार का बोझ था. अब तो चोला तुमने उतार दिया है तुम इंसान बन गए हो. हम ऐसे सद्गुणों का आदर करते हैं. साधु मान-अपमान से ऊपर होता है. उसे तो सदगुण प्रिय हैं.
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राजा नतमस्तक हो गया. कितनी बड़ी बात कही महात्मा जी ने. हम अनावश्यक जीवन में लोगों के उपकार का बोझ लेते रहते हैं. हम समझते हैं कि यह कोई कार्य थोड़े ही था. यकीन मानिए हर उपकार एक बोझ जैसा ही होता है जिसे कभी न कभी चुकाना ही होगा.
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किसी दीन-दुखी या सचमुच किसी जरूरत मंद को देखें तो आगे बढ़कर सहायता का भाव रखें. संभव है आपको कुछ पुराने अनुभव बुरे रहे हों पर न जाने किस अनुभव के लिए ईश्वर समय आ गए हो परीक्षा के लिए.
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धर्म में आस्था रखें. धर्मकार्यों में आस्था रखें. किसी अन्य धर्म का अनादर करना, उसकी अवहेलना करना धर्म नहीं. सनातन तो जीवन जीने की आदर्श कला है. वसुधैव कुटुंबकम्.
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भगवान श्रीरामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण
अब हम श्री राम से जुडे कुछ अहम् सबूत पेश करने जा रहे हैं........
जिसे पढ़ के नास्तिक भी सोच में पड जायेंगे की रामायण सच्ची हैं या काल्पनिक ||
भगवान रामचन्द्र जी के १४ वर्षों के वनवास यात्रा का विवरण >>>>
पुराने उपलब्ध प्रमाणों और श्रीराम अवतार जी के शोध और अनुशंधानों के अनुसार कुल १९५ स्थानों पर राम और सीता जी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिन्हें ५ भागों में वर्णित कर रहा हूँ
१.>>>वनवास का प्रथम चरण गंगा का अंचल >>>
सबसे पहले राम जी अयोध्या से चलकर तमसा नदी (गौराघाट,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश) को पार किया जो अयोध्या से २० किमी की दूरी पर है |
आगे बढ़ते हुए राम जी ने गोमती नदी को पर किया और श्रिंगवेरपुर (वर्त्तमान सिंगरोर,जिला इलाहाबाद )पहुंचे ...आगे 2 किलोमीटर पर गंगा जी थीं और यहाँ से सुमंत को राम जी ने वापस कर दिया |
बस यही जगह केवट प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है |
इसके बाद यमुना नदी को संगम के निकट पार कर के राम जी चित्रकूट में प्रवेश करते हैं|
वाल्मीकि आश्रम,मंडव्य आश्रम,भारत कूप आज भी इन प्रसंगों की गाथा का गान कर रहे हैं |
भारत मिलाप के बाद राम जी का चित्रकूट से प्रस्थान ,भारत चरण पादुका लेकर अयोध्या जी वापस |
अगला पड़ाव श्री अत्रि मुनि का आश्रम
२.बनवास का द्वितीय चरण दंडक वन(दंडकारन्य)>>>
घने जंगलों और बरसात वाले जीवन को जीते हुए राम जी सीता और लक्षमण सहित सरभंग और सुतीक्षण मुनि के आश्रमों में पहुचते हैं |
नर्मदा और महानदी के अंचल में उन्होंने अपना ज्यादा जीवन बिताया ,पन्ना ,रायपुर,बस्तर और जगदलपुर में
तमाम जंगलों ,झीलों पहाड़ों और नदियों को पारकर राम जी अगस्त्य मुनि के आश्रम नाशिक पहुँचते हैं |
जहाँ उन्हें अगस्त्य मुनि, अग्निशाला में बनाये हुए अपने अशत्र शस्त्र प्रदान करते हैं |
३.वनवास का तृतीय चरण गोदावरी अंचल >>>
अगस्त्य मुनि से मिलन के पश्चात राम जी पंचवटी (पांच वट वृक्षों से घिरा क्षेत्र ) जो आज भी नाशिक में गोदावरी के तट पर है यहाँ अपना निवास स्थान बनाये |यहीं आपने तड़का ,खर और दूषण का वध किया |
यही वो "जनस्थान" है जो वाल्मीकि रामायण में कहा गया है ...आज भी स्थित है नाशिक में
जहाँ मारीच का वध हुआ वह स्थान मृग व्यघेश्वर और बानेश्वर नाम से आज भी मौजूद है नाशिक में |
इसके बाद ही सीता हरण हुआ ....जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पार हुई जो इगतपुरी तालुका नाशिक के ताकीद गाँव में मौजूद है |दूरी ५६ किमी नाशिक से |
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इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया क्यों की यहीं पर मरणसन्न जटायु ने बताया था की सम्राट दशरथ की मृत्यु हो गई है ...और राम जी ने यहाँ जटायु का अंतिम संस्कार कर के पिता और जटायु का श्राद्ध तर्पण किया था |
यद्यपि भरत ने भी अयोध्या में किया था श्राद्ध ,मानस में प्रसंग है "भरत किन्ही दस्गात्र विधाना "
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४.वनवास का चतुर्थ चरण तुंगभद्रा और कावेरी के अंचल में >>>>
सीता की तलाश में राम लक्षमण जटायु मिलन और कबंध बाहुछेद कर के ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढे ....|
रास्ते में पंपा सरोवर के पास शबरी से मुलाकात हुई और नवधा भक्ति से शबरी को मुक्ति मिली |जो आज कल बेलगाँव का सुरेवन का इलाका है और आज भी ये बेर के कटीले वृक्षों के लिए ही प्रसिद्ध है |
चन्दन के जंगलों को पार कर राम जी ऋष्यमूक की ओर बढ़ते हुए हनुमान और सुग्रीव से मिले ,सीता के आभूषण प्राप्त हुए और बाली का वध हुआ ....ये स्थान आज भी कर्णाटक के बेल्लारी के हम्पी में स्थित है |
५.बनवास का पंचम चरण समुद्र का अंचल >>>>
कावेरी नदी के किनारे चलते ,चन्दन के वनों को पार करते कोड्डीकराई पहुचे पर पुनः पुल के निर्माण हेतु रामेश्वर आये जिसके हर प्रमाण छेदुकराई में उपलब्ध है |सागर तट के तीन दिनों तक अन्वेषण और शोध के बाद राम जी ने कोड्डीकराई और छेदुकराई को छोड़ सागर पर पुल निर्माण की सबसे उत्तम स्थिति रामेश्वरम की पाई ....और चौथे दिन इंजिनियर नल और नील ने पुल बंधन का कार्य प्रारम्भ किया |

"उद्धव गीता"
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उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने अवतार काल को पूर्ण कर गौलोक जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-

"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ। तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी। उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- "भगवन #महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया! आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा! क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"

श्री कृष्ण बोले- “उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह "भगवद्गीता" थी। आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह "उद्धव-गीता" के रूप में जानी जाएगी। इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है। तुम बेझिझक पूछो।

उद्धव ने पूछना शुरू किया- "हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"

कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"

उद्धव- "कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया। कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।

किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया? आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं? चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा! आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे! आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!

उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे! अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे! इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया! लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं? उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है! एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया? अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा? क्या यही धर्म है?"

इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं! उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले- "प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है। उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं। यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"

उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा। जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता? पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार? चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की! और वह यह- उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए! क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं! इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी! इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!

अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही! तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा! उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!

जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर- 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम' की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला। जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया। अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"

उद्धव बोले- "कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई! क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?" कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा "इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"

कृष्ण मुस्कुराए- "उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है। न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ। मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ। मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ। यही ईश्वर का धर्म है।"

"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण! तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे? हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे? आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?" उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!

तब कृष्ण बोले "उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो। जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे? तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे। जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है! अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"

भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले - प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है। गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।

सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है। सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।

अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे। वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया! यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!

वाह क्या इस्लाम है

अधिकतर मुस्लिम खेती नहीं करते पर कृषि उत्पादों की दलाली करते।
गाय नहीं पालते पर गाय खाने को लार टपकाते हैं।
गंदगी के अम्बार लगाते पर सफाई कर्मचारी नहीं बनते।
चैरिटेबल चिकित्सालय नहीं खोलते पर सरकारी अस्पताल इन्ही की तीमारदारी में लगे रहते हैं।
फौज में भर्ती नहीं होते पर फौजियों पर गोलीबारी और पत्थर बरसाते हैं।
बातें इमान की करते पर अपराधियों में 98% यही मिलते हैं।
राष्ट्र से सुविधा व सुरक्षा चाहते हैं पर राष्ट्र को मानते नहीं हैं।
बात बेबात पर फतवे जारी करते हैं पर कानून तोड़ने में पहले दर्जे की बदमाशी देते हैं।
भाई चारे की बात करते हैं लेकिन सभी आतंकवादी इसी समुदाय से मिलते हैं।
इस्लाम की तारीफ़ में बाते बड़ी बड़ी इस्लाम की और इस्लाम की अमन की करते है और कहते है इस्लाम अमन (शांति) का मजहब है ,और सारी दुनिया में इस्लाम दहशत और आतंकवाद फैलता आया है और फैला रहा है,,, शुरू से ही,
कुर्बानी हलाला तीन तलाक चार चार शादी 10-12 बच्चे जैसी जाहिली का शौक फरमाते हैं लेकिन बात कुराने पाक की करेंगे।
इस्लाम की अमन (पीस) शांति तो मानो ऐसी है कि कहीं से भी कभी भी किसी भी समय बम के या गोली के रूप में बरस जाती है,, और वह शांति अकारण ही निर्दोष लोगो की हत्या कर देती है,,, और यह सब इस्लाम के कट्टरवादी आतंकवादी केवल किसी दलाल के बहकावें में आकर उसके झांसे में जन्नत मिलने की बीमारी और उस जन्नत में 72 हूरे पाने के लिए या दिलाने के लिए करते है,,
वाह क्या इस्लाम है !
हामिद अंसारी किधर है ?
देश में मुसलमान कितने खतरे में हैं इसकी एक और बड़ी मिसाल सामने आई है। उत्तराखंड में मदरसे में पढ़ने वाले करीब 2 लाख मुसलमान लड़के रातों-रात गायब हो गए! दरअसल ये वो छात्र हैं जो हर महीने सरकार से वजीफा यानी स्कॉलरशिप पा रहे थे। लेकिन जैसे ही उत्तराखंड सरकार ने उन्हें अपने बैंक खातों को आधार नंबर से लिंक करने को कहा एक साथ 1 लाख 95 हजार 360 बच्चे गायब हो गए।
अभी तक इन छात्रों को सरकारें हर साल करीब साढ़े 14 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति बांट रही थीं। लेकिन अब ये सिर्फ 2 करोड़ रुपये रह गई है। ये अकेले उत्तराखंड का मामला है। अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि जब उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में मदरसों को अपना रजिस्ट्रेशन करवाने को कहा तो क्यों इतना हंगामा खड़ा कर दिया गया।
तो इसलिए असुरक्षित हैं मुसलमान?
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बीजेपी की सरकार आने के बाद से मुसलमान खुद को क्यों असुरक्षित महसूस कर रहे हैं इस बात से साबित हो गया है। क्योंकि 2014-15 तक 2 लाख 21 हजार 800 मुसलमान छात्र सरकारी स्कॉलरशिप पा रहे थे। आधार से लिंक होते ही इनकी संख्या गिरकर 26 हजार 440 हो गई है। यानी एक साथ करीब 88 फीसदी मुसलमान छात्रों की संख्या कम हो गई। ये वो स्कॉलरशिप है जो बीपीएल परिवारों के छात्रों को दी जाती है। जिन छात्रों के पास आधार नहीं हैं, उन्हें भी स्कॉलरशिप का फायदा मिल रहा है, लेकिन उन्हें इसके लिए जिलाधिकारी से सत्यापन करवाना जरूरी है। फिलहाल जिला प्रशासन को इस घोटाले के दोषियों की लिस्ट तैयार करने और उन पर कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।
अल्पसंख्यक कोटे के नाम पर धांधली
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यह बात भी सामने आई है कि कई मदरसे और स्कूल सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं और वो फर्जी छात्रों के नाम भेजकर आराम से सरकारी फंड हासिल कर रहे थे। उत्तराखंड के 13 जिलों में से 6 में तो एक भी मुसलमान छात्र स्कॉलरशिप लेने नहीं आया। सबसे ज्यादा धांधली हरिद्वार जिले में पकड़ी गई है। इसके बाद ऊधमसिंहनगर, देहरादून और नैनीताल जिलों के नंबर आते हैं। कुछ जिलों में अब तक जितने अल्पसंख्यक छात्रों को स्कॉलरशिप दी जा रही थी उतनी तो उनकी वहां आबादी भी नहीं है। अब तक कांग्रेस के दौर में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत बिना जांच पड़ताल के ये काम चल रहा था। जाहिर है बीजेपी सरकार आने के बाद इस घोटाले पर नकेल कसनी शुरू कर दी गई।
यूपी में भी इसीलिए है सारी दिक्कत
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यूपी में भी इसी तरह की गड़बड़ियों को देखते हुए मदरसों का रजिस्ट्रेशन जरूरी कर दिया गया है। राज्य में कई मदरसे बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। और इन मदरसों को फंड कहां से मिल रहा है इसकी भी कोई जानकारी नहीं होती। इन मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है, इस पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होताष जबकि ये अपने छात्रों को अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं के तहत तमाम फायदे पहुंचाते रहते हैं। यूपी सरकार राज्य में करीब 800 मदरसों पर हर साल 400 करोड़ के करीब खर्च करती है। जब इन मदरसों का रजिस्ट्रेशन होगा तो सही तस्वीर सामने आ पाएगी कि कितना पैसा वाकई गरीब छात्रों के पास पहुंच रहा है और कितना उन लोगों की जेब में जा रहा है, जिन्हें लेकर हामिद अंसारी जैसे लोग परेशान रहते हैं।
इसाई धर्म
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ईसा एक है
बाइबिल एक।
फिर भी, लेटिन कैथलिक, सीरियन कैथलिक, मारथोमा, पेंटेकोस्ट, सैल्वेशन आर्मी, सेवेंथ डे एडवांटिष्ट, ऑर्थोडॉक्स, जेकोबाइट जैसे 146 फिरके आपस में किसी के भी चर्च में नहीं जाते।
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इस्लाम धर्म
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अल्लाह एक,
कुरान एक,
नबी एक।
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फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे। सबकी अलग मस्जिदें। साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ सकते। धर्म के नाम पर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।
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हिन्दू धर्म
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1280 धर्म ग्रन्थ
10 हज़ार से ज्यादा जातियां, अनगिनत पर्व एवं त्योहार,
असंख्य देवी-देवता।
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एक लाख से ज्यादा उपजातियां, हज़ारों ऋषि-मुनि, सैकड़ों भाषाएँ।
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फिर भी सारे हिन्दू सभी मन्दिरों में जाते हैं और सारे त्योहारों को मनाते हुए आपस में शान्ति एवं शालीनता से रहते हैं।
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यह है भव्यता, सुन्दरता और खूबसूरती हिन्दू धर्म की ...... !!
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फिर क्यों न गर्व हो हिन्दुओं को हिन्दू धर्म पर .........
भारत के नाम हैं ये विश्व रिकॉर्ड
दूध के उत्पादन से लेकर रिकॉर्ड गोल्ड मेडल जीतने तक-भारत के नाम हैं कुछ ऐसे रिकॉर्ड जिनमें वह दुनिया में नंबर एक है.
सबसे ज्यादा डाकघर
डेढ़ लाख से अधिक डाकघरों वाले भारत में दुनिया का सबसे बड़ा डाक नेटवर्क मौजूद है. आजादी के समय यह संख्या करीब 23,000 थी, जो अब 7 गुना बढ़ गयी है. देश के कुल डाकघरों में से 90 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में हैं.
सबसे बड़ा धार्मिक मेला
कुंभ मेले को दुनिया की सबसे बड़े धार्मिक सभा या मेलों में गिना जाता है. हर 12 साल में होने वाले इस मेले में दुनिया भर से करोड़ों लोग पहुंचते हैं. 2013 में हुए कुंभ मेले में 3 करोड़ से भी ज्यादा लोग पहुंचे थे.
हर मैच में मिला गोल्ड
भारत की कबड्डी टीम ने आज तक खेले अपने सारे एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता है. कबड्डी साल 1990 में एशियन गेम्स का हिस्सा बना था.
सबसे ज्यादा बारिश भी यहीं
भारत के मेघालय में हर साल औसतन 467 इंच बारिश का रिकॉर्ड है. पूर्वोत्तर राज्य मेघालय को 'लैंड ऑफ क्लाउड्स' भी कहा जाता है.
क्रिकेट का सबसे ऊंचा मैदान
दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान भारत के हिमाचल प्रदेश में स्थित है. धर्मशाला के इस मैदान की ऊंचाई समुद्र तल से 2,144 मीटर (करीब 7000 फीट) है.
सबसे अधिक दूध उत्पादन
दुनिया भर में सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन करने वाला देश भी भारत ही है. साल 2015-16 में देश में औसतन 155.5 मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ.