Thursday, 30 March 2017

मीट और अण्डे से 

 ज्यादा शक्तिशाली है मूंगफली ...

 मूंगफली को सेहत का खजाना भी कहा जाता है। शायद आपको इस बार यकीन ना आए, लेकिन ये सच है कि मूंगफली मीट और अण्डे की तुलना में काफी शक्तिशाली होती है। आइए जानते हैं कि मूंगफली में ऐसे कौन से गुण हैं जिससे उसने मांस को भी पीछे छोड़ दिया है।
Peanuts-Benefits :-
– वानस्पति प्रोटीन का स्त्रोत है मूंगफली।
– मूंगफली में मांस की तुलना में 2.3 गुना और अण्डे की तुलना 2.5 गुना और फलों की तुलना में 7 गुना अधिक प्रोटीन होता है।
– 100 ग्राम कच्ची मूंगफली खाना, एक लीटर दूध पीने के बराबर होता है।
– मूंगफली खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है और हमारी पाचन क्रिया दुरस्त भी होती है।– 250 ग्राम भुनी हुई मूंगफली खाने से हमारे शरीर को जितने खनिज और विटामिन्स मिलते हैं उतने 250 ग्राम चिकन खाने से भी नहीं मिलते हैं।
loading…
– मूंगफली में न्यट्रीशन्स, मिनिरल्स, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं।
– मूंगफली हमारे खराब कोलेस्ट्राल को अच्छे कोलेस्ट्राल में बदलती है।
– मूंगफली में जितना प्रोटीन और एनर्जी होती है उतनी अण्डे में भी नहीं होती है।
– मूंगफली में पाया जाने वाला प्रोटीन दूध से मिलता है और चिकनाई घी से मिलती है।
– अकेली मूंगफली दूध, घी और बादाम की कमी को पूरा कर देती है।
– इसे गरीब का बादाम कहा जाता है। मूंगफली खाने से शरीर गर्म रहता है और फेफड़ों को बल मिलता है।
– खाने के बाद इसका सेवन करने से पाचन तंत्र अच्छा होता है और मोटापा कमजोर इंसान हेल्दी होता है।
– श्वास के मरीजों के लिए भी मूंगफली खाना फायदेमंद होता है।
– मूंगफली गर्म होती है इसलिए जिन लोगों को गर्म चीज खाने से परेशानी होती है वो इसका कम सेवन करें।

यहां बैलों को दी जा रही है पेंशन...

लखनऊ। राष्ट्रीय दुग्ध अनुसंधान करनाल के वैज्ञानिकों की टीम एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहे हैं, जिसमें अब गायें सिर्फ बछिया यानि मादा को ही जन्म देंगी। 55 करोड़ की इस परियोजना पर तेजी से काम हो रहा है। इस परियोजना को सेक्स सीमेन टेक्नोलॉजी का नाम दिया गया है। इसका मकसद है गायों की संख्या बढ़ाना, जिससे दुग्ध उत्पादन बढ़ सके। लेकिन इस परियोजना को लेकर लोगों का विरोध भी है। चिंता इस बात पर जताई जा रही है कि बैलों की संख्या इससे बहुत कम हो जाएगी और जो कृषि और परिस्थिति तंत्र के लिए भी ठीक नहीं होगा। ऐसे में बैलों की संख्या को बढ़ाने के लिए झारखंड की राजधानी रांची के नजदीक कस्बा पतरातू में बैलों को बचाने के लिए अनूठा प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें बैलों को पेंशन दी जा रही है।

तब कम होने लगी बैलों की संख्या

इस योजना को पहली बार सुनकर लोग अचरज में पड़ जाते हैं, मगर इस क्षेत्र में इस योजना ने बैलों की संख्या बढ़ाने के साथ ही कृषि कार्य के लिए उनको उपयोगी बनाने में एक क्रांति कर दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े सिद्धनाथ सिंह रामगढ़ जिले के पतरातू में इस योजना को संचालित कर रहे हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर कुछ दिनों तक एक स्टील कंपनी में काम करने वाले सिद्धनाथ सिंह ने बताया कि साल 1973 में मैंने पतरातू में अपना काम शुरू किया। इसमें मैंने देखा कि यहां के गावों में गाय से बछड़ा पैदा होने के बाद लोग इसका ठीक से पालन पोषण नहीं करते हैं। लोग उसे अनुपयोगी मानकर छोड़ देते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र से बैलों की संख्या कम हो गई और जिसका असर खेती पर भी पड़ा। क्योंकि झारखंड के अधिकतर क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर ट्रैक्टर या दूसरी मशीनों से खेती नहीं हो सकती।

और शुरू की बुल पेंशन स्कीम

ऐसे में सिद्धनाथ सिंह ने बुल पेंशन स्कीम शुरू की। जिसमें उनके गौशाला में जब कोई गाय बछड़ा देती है तो उसे गांव वालों को दिया जाता। जिस किसान को बछड़ा दिया जाता है, उससे 8,000 रूपए सिक्योरिटी का लिया जाता है और साथ ही उसके साथ एक एमओयू भी साइन कराया जाता है कि वह बछड़े को बेच नहीं सकता। 12 साल का जब बैल हो जाता है तो किसान को ब्याज के साथ पैसा वापस दिया जाता है। जिससे बैल की अच्छे से देखभाल हो जाती है। साथ ही बैलों को कृषि के लिए कैसे उपयोगी बनाया जाए, इसके लिए भी ट्रेनिंग दी जाती है। इस योजना का यहां के आसपास के किसान काफी लाभ ले रहे हैं।

क्या कहते हैं गाँव के किसान

पतरातू का हफुआ गांव की ज्यादातर आबादी मुसलिम है। इस गांव के किसान मोहम्मद कु्ददुस अंसारी ने बताया कि हमारे गांव में बैलों की संख्या बिल्कुल कम हो गई थी। ऐसे में मुझे बैल पेंशन योजना के बारे में पता चला और मैंने सिद्धनाथ सिंह से संपर्क किया। वहां मैंने दो बैल पेंशन योजना के तहत ले लिया। कुछ साल में एक तरफ जहां हमारा पैसा दोगुना हो जाएगा, वहीं इस पैसे से हम अपने बैल की अच्छे से देखभाल भी कर पाएंगे।

मध्य प्रदेश, गुजरात और कनार्टक में भी चल रही ऐसी योजना

जबसे परंपरागत खेती की जगह नई खेती ने ली है, उसके बाद से किसान, खेत और बैल का रिश्ता टूट गया है। पहले खेतों की जुताई, रहट से सिंचाई, खेत-खलिहान से फसलों और अनाज की ढुलाई में बैलगाड़ियों में बैल की ही जरुरत पड़ती रही। लेकिन जब से ट्रैक्टर का उपयोग बढ़ा, बैल बिना काम के हो गए। मगर डीजल के बढ़ते दाम, ग्लोबल वार्मिंग और जैविक खेती के साथ ही पारंपरिक खेती के बढ़ते प्रचलन ने एक बार फिर से बैलों की जरुरत महसूस की जा रही है। ऐसे में बैलों को बचाने और कृषि कार्य के लिए उन्हें उपयोगी बनाने के लिए मध्यपद्रेश के मोहाड़, कनार्टक के इडाकाडू और गुजरात के कथाड़ा में बैलों को बचाने की ऐसी ही योजना चल रही है। जहां पर बैलों को पेंशन देने के साथ ही बैल किसान के लिए कैसे अधिक से अधिक उपयोगी बन सके, इसके लिए किसानों को ट्रेनिंग दी जा रही है।

बिना खर्च का है बैल पालन

रासायनिक खादों का कृषि पर अब दिख रहा दुष्प्रभाव कृषि वैज्ञानिकों के साथ ही देश की राज्य और प्रदेश की सरकारों को चिंता में डाल दिया है। ऐसे में अब परंपरागत खेती को लेकर जागरूकता पैदा की जा रही है। जिसमें किसानों को बताया जा रहा है कि कैसे बैले उनके लिए उपयोगी है। उनके पालन-पोषण में अलग से खर्च की जररुत नहीं पड़ती है। खेतों में पैदा होनी वाली फसलों ठंडल, भूसा, पुआल, और खेतों की घासों से बैल का चारा बन जाता है, जो उनका पेट भरने के लिए काफी है। खेतों में पैदा होने वाली हरी सब्जियों को ऐसा भाग जिसे किसान फेंक देते हैं उसको भी इनको खिलाया जा सकता है। बैल पालन से देसी खाद भी अच्छी मात्रा में बन जाती है। जिससे खेतों में रासायिनक खादों की जरुरत नहीं पड़ती है। ऐसे में खेत, किसान और बैल का रिश्ता बना रहता है।
पशु शक्ति के बारे में वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता और व्यवहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या सबको चिंता में डाल दिया है। ऐसे में बैलों से खेती करने को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सिद्धनाथ सिंह, कृषि एवं पशुपालन मामलों के जानकार।

Wednesday, 29 March 2017

Bihar : 90 हजार किसानों ने छोड़ी यूरिया

 दही को बनाया विकल्प ...

-फसल उत्पादन में 30 फीसदी तक किसानों ने की बढ़ोतरी
-40 दिनों तक फसलों को मिलता है नाइट्रोजन व फास्फोरस
-देशी गाय के दूध से तैयार दहीवाले मिश्रण से होते हैं अधिक फायदे
-जिले के साथ दिल्ली व पंजाब के कृषि फार्म में हुए फायदे
-सकरा के किसान दिनेश ने थाइलैंड में ली थी ट्रेनिंग

मुजफ्फरपुर.
 रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक से होनेवाले नुकसान के प्रति किसान सजग हो रहे हैं. जैविक तकनीक की बदौलत उत्तर बिहार के करीब 90 हजार किसानों ने यूरिया से तोबा कर ली है. इसके बदले दही का प्रयोग कर किसानों ने अनाज, फल, सब्जी के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी बढ़ोतरी भी की है. 25 किलो यूरिया का मुकाबला दो किलो दही ही कर रहा है. यूरिया की तुलना में दही मिश्रण का छिड़काव ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है. किसानों की माने, तो यूरिया से फसल में करीब 25 दिन तक व दही के प्रयोग से फसलों में 40 दिनों तक हरियाली रहती है.

सकरा के मछही की किरण कुमारी, चांदनी देवी, नूतन देवी, पवन देवी, धर्मशीला देवी बताती हैं कि इस प्रयोग से सब्जी, फल व अनाज की मात्रा व गुणवत्ता में सुधार हुआ है. केशोपुर के अरविंद प्रसाद, ओम प्रकाश, राजा राम सिंह, रमेश सिंह, रघुनाथ राम, वीरचंद्र पासवान आदि बताते हैं कि आम, लीची, गेहूं, धान व गन्ना में प्रयोग सफल हुआ है. फसल को पर्याप्त मात्रा में लंबे समय तक नाइट्रोजन व फॉस्फोरस की आपूर्ति होती रहती है. केरमा के किसान संतोष कुमार बताते हैं कि वे करीब दो वर्षों से इसका प्रयोग कर रहे हैं. काफी फायदेमंद साबित हुआ है.

लीची व आम का होता है अधिक उत्पादन
 इस मिश्रण का प्रयोग आम व लीची में मंजर आने से करीब 15-20 दिनों पूर्व इसका प्रयोग करें. एक लीटर पानी में 30 मिलीलीटर दही के मिश्रण डाल कर घोल तैयार बना लें. इससे पौधों की पत्तियों को भीगों दें. 15 दिन बाद दोबारा यही प्रयोग करना है. इससे लीची व आम के पेड़ों को फॉस्फोरस व नाइट्रोजन की सही मात्रा मिलती है. मंजर को तेजी से बाहर निकलने में मदद मिलती है. सभी फल समान आकार के होते हैं. फलों का झड़ना भी इस प्रयोग से कम हो जाता है
एेसे तैयार होता दही का मिश्रण 
देशी गाय के दो लीटर दूध का मिट्टी के बरतन में दही तैयार करें. तैयार दही में पीतल या तांबे का चम्मच, कलछी या कटोरा डुबो कर रख दें. इसे ढंक कर आठ से 10 दिनों तक छोड़ देना है. इसमें हरे रंग की तूतिया निकलेगी. फिर बरतन को बाहर निकाल अच्छी तरह धो लें. बरतन धोने के दौरान निकले पानी को दही में मिला मिश्रण तैयार कर लें. दो किलो दही में तीन लीटर पानी मिला कर पांच लीटर मिश्रण बनेगा. इस दौरान इसमें से मक्खन के रूप में कीट नियंत्रक पदार्थ निकलेगा. इसे बाहर निकाल कर इसमें वर्मी कंपोस्ट मिला कर पेड़-पौधों की जड़ों में डाल दें. ध्यान रहे इसके संपर्क में कोई बच्चा न जाये. इसके प्रयोग से पेड़-पौधों से तना बेधक  (गराड़)और दीमक समाप्त हो जायेंगे. पौधा निरोग बनेगा. जरूरत के अनुसार से दही के पांच किलो मिश्रण में पानी मिला कर एक एकड़ फसल में छिड़काव होगा. इसके प्रयोग से फसलों में हरियाली के साथ-साथ लाही नियंत्रण होता है. फसलों को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिलता होता है. इससे पौधे अंतिम समय तक स्वस्थ रहते हैं.

आइसीएआर में भी प्रयोग सफल
इसका प्रयोग मुजफ्फरपुर के सकरा, मुरौल, कुढ़नी, मीनापुर, पारू, सरैया व बंदरा में काफी तेजी से बढ़ रहा है. वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय व दरभंगा के दक्षिणी इलाके में काफी संख्या में किसानों ने इसे अपनाया है. यहां के किसानों ने दिल्ली के बुरारी रोड, नत्थूपूरम, इब्राहीमपुर, उत्तमनगर, नागलोई, गुड़गांव, नजफगढ़, रोहिनी समेत कृषि फार्म में इसके प्रयोग से उत्पादन में सुधार हुआ है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नयी दिल्ली में भी इसके सफल प्रयोग से जैविक अनाज, फल व सब्जी का उत्पादन हुआ है. यहां के दिनेश कुमार को दिल्ली स्थित आइसीएआर में दो केंद्रीय मंत्रियों ने इसके लिए सम्मानित किया.

बोले किसान
सकरा के इनोवेटिव किसान सम्मान विजेता दिनेश कुमार ने बताया, मक्का, गन्ना, केला, सब्जी, आम-लीची सहित सभी फसलों में यह प्रयोग सफल हुआ है. आत्मा हितकारिणी समूह के  90 हजार किसान यह प्रयोग कर रहे हैं. इसके बाद  मुजफ्फरपुर, वैशाली के साथ-साथ दिल्ली की धरती पर इसे उतारा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मार्च 2017 में इनोवेटिव किसान सम्मान से सम्मानित किया.
 

मुजफ्फरपुर के किसान भूषण सम्मान प्राप्त सतीश कुमार द्विवेदी कहते हैं, जिन खेतों में कार्बनिक तत्व मौजूद होते हैं, उनमें इस प्रयोग से फसलों का उत्पाद 30 फीसदी अधिक होता है. इस मिश्रण में मेथी का पेस्ट या नीम का तेल मिला कर छिड़काव करने से फसलों पर फंगस नहीं लगता है. इसके प्रयोग से नाइट्रोजन की आपूर्ति, शत्रु कीट से फसलों की सुरक्षा व मित्र कीटों की रक्षा एक साथ होती है. 

अफ़ग़ानों को पंजाब कि धरती से धुल चटाने वाला हिन्दू योधा – महान सिंह बाली

 महान सिंह बाली रणजीत सिंह की सेना के दूसरा प्रमुख सेनापति थे। हरी सिंह नलुआ के बाद उन्हें आधुनिक पंजाब का सबसे सफल जरनैल माना जाता है। इनके पिता का नाम दाता राम था जो की गुजरात के सुलतान की कचहरी में काम करते थे। महान सिंह बाली ने अपने कार्यकाल में पेशावर, नौशेरा ,हरिपुर को जीता और रणजीत सिंह सनसिवाल के साम्राज्य में मिलवाया। इसीलिये रणजीत सिंह ने उन्हें राजा की उपाधि दी।उनकी बहादुरी के चलते लोग उन्हें “मनशेरा” कह कर पुकारते थे। हरि सिंह नलुवा की मौत के बाद महान सिंह बाली को हरी सिंह की बीवी ने गोद लिया और उनकी शादी एक मोहन ब्राह्मण (मोहयाल) परिवार में हिन्दू रीती रिवाज से की। उस समय रणजीत सिंह की सेना में सबसे अधिक संख्या में मोहयाल ब्राह्मण थे । उसके कई बड़े सिपहसलार ब्राह्मण ही थे। महान सिंह बाली की रणजीत सिंह से मुलाकात उस समय हुई जब वो काम की तलाश मे पंजाब में थे। महान सिंह बाली युद्ब कला में निपुण थे। इतिहासकार कहते हैं कि एक बार रणजीत सिंह ने महान सिंह बाली को अकेले अपनी तलवार से चीते को मारते देखा। वो उनकी बहादुरी का कायल हो गया और इन्हें अपनी सेना में रख लिया। महान सिंह बाली ने पेशावर के अलावा कश्मीर की लड़ाइयों में बड़ा योगदान दिया।मुल्तान के युद्ध के वो बुरी तरह जख्मी हुए पर लड़ते रहे और विजयी हुए। जब अप्रैल 1837 में अफ़ग़ानों ने जमरूद किले पर धावा बोल दिया तब उस युद्ध में हरी सिंह नलवा मारा गया। यह जानकारी मिलने के बाद महान सिंह बाली ने खुद मोर्चा संभाला और हरी सिंह नलवा की मौत की खबर सेना को नहीं लगने दी । उन्होंने बहुत कुशल से सेना का नेतृत्व किया और लाहौर (पंजाब की राजधानी) से फौजी मदद आने तक अपनी छोटी से सेना लेकर किले की रक्षा की और अंततः विजय पाई। रणजीत सिंह ने उन्हें अपना प्रमुख सेनापति बना दिया। सन 1844 में सेना में विद्रोह के समय उनके अपने ही सैनिकों ने उनकी हत्या कर दी। उम्मीद करता हूँ की टीवी पर जो महाराजा रणजीत सिंह पर serial शुरू हुआ है उसमें उस समय की फ़ौज में ब्राह्मणों का योगदान और महान सिंह बाली का चरित्र सही से पेश किया जायेगा।
हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं के कारण हिन्दू धर्म में कई ऐसी अंतरविरोधी और विरोधाभाषी विचारधाराओं का समावेश हो चला है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा की देन है। लेकिन उन सभी विचारधाराओं का सम्मान करना भी जरूरी है, क्योंकि धर्म का किसी तरह की विचारधारा से संबंध नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ ‘ब्रह्म ज्ञान’ से संबंध है। ब्रह्म ज्ञान अनुसार प्राणीमात्र सत्य है। सत्य का अर्थ ‘यह भी’ और ‘वह भी’ दोनों ही सत्य है। सत् और तत् मिलकर बना है सत्य।यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जो व्यक्ति जिस भी धर्म में जन्मा है, वह उसी धर्म को सबसे प्राचीन और महान मानेगा। सत्य को जानने का प्रयास कम ही लोग करते हैं। हजारों वर्ष की लंबी परंपरा के कारण हिन्दू धर्म में कई तरह के भ्रम फैल गए हैं। इन भ्रमों के चलते सनातन हिन्दू धर्म पर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। ऐसे ही भ्रमों में एक भ्रम पशु बलि प्रथा है। हम आपको बताएंगे कि पशु बलि प्रथा भ्रम क्या हैं और आखिर उनमें कितनी सच्चाई है।

क्या हिन्दू धर्म में पशु बलि प्रथा है?
देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि का प्रयोग किया जाता है। बलि प्रथा के अंतर्गत बकरा, मुर्गा या भैंसे की बलि दिए जाने का प्रचलन है। सवाल यह उठता है कि क्या बलि प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा है?

”मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।”- ऋग्वेद 1/114/8

अर्थ : हमारी गायों और घोड़ों को मत मार।

विद्वान मानते हैं कि हिन्दू धर्म में लोक परंपरा की धाराएं भी जुड़ती गईं और उन्हें हिन्दू धर्म का हिस्सा माना जाने लगा। जैसे वट वर्ष से असंख्य लताएं लिपटकर अपना ‍अस्तित्व बना लेती हैं लेकिन वे लताएं वक्ष नहीं होतीं उसी तरह वैदिक आर्य धर्म की छत्रछाया में अन्य परंपराओं ने भी जड़ फैला ली। इन्हें कभी रोकने की कोशिश नहीं की गई।बलि प्रथा का प्रचलन हिंदुओं के शाक्त और तांत्रिकों के संप्रदाय में ही देखने को मिलता है लेकिन इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। बहुत से समाजों में लड़के के जन्म होने या उसकी मान उतारने के नाम पर बलि दी जाती है तो कुछ समाज में विवाह आदि समारोह में बलि दी जाती है जो कि अनुचित मानी गई है। वेदों में किसी भी प्रकार की बलि प्रथा कि इजाजत नहीं दी गई है।

”इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्।
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम।।”

अर्थ : ”उन जैसे बालों वाले बकरी, ऊंट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार।।” -यजु. 13/50  ..पशुबलि की यह प्रथा कब और कैसे प्रारंभ हुई, कहना कठिन है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि वैदिक काल में यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती है। ऐसा तर्क देने वाले लोग वैदिक शब्दों का गलत अर्थ निकालने वाले हैं। वेदों में पांच प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। पशु बलि प्रथा के संबंध में पंडित श्रीराम शर्मा की शोधपरक किताब ‘पशुबलि : हिन्दू धर्म और मानव सभ्यता पर एक कलंक’ पढ़ना चाहिए।
” न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि। मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।।’- सामवेद-2/7

अर्थ : ”देवों! हम हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं, वेद मंत्र के आदेशानुसार आचरण करते हैं।”वेदों में ऐसे सैकड़ों मंत्र और ऋचाएं हैं जिससे यह सिद्ध किया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में बलि प्रथा निषेध है और यह प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं है। जो बलि प्रथा का समर्थन करता है वह धर्मविरुद्ध दानवी आचरण करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए सजा का प्रावधान है। मृत्यु के बाद उसे ही जवाब देना के लिए हाजिर होना होगा।

Tuesday, 28 March 2017

ऐसा राजा जिसे इतिहास ने भूला दिया, 
बनाया था भारत को सोने की चिड़िया।।
संम्राट विक्रमादित्य के नाम से विक्रम संवत चल रहा है और २०७३ पूर्ण होकर २८ मार्च २०१७ से २०७४ विक्रम संवत का वर्ष शुरू हो रहा है 

*बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था*

उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य… बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।

*आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमदित्य के कारण अस्तित्व में है*
अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे। रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे,
महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया। विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या
हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे
हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे, उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया ,

*वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है*

महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है। विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे ,आप गूगल इमेज कर विक्रमदित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।

*हिन्दू कैलंडर भी विक्रमदित्य का स्थापित किया हुआ है*

आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार ,तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे , विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था।

विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी
पर बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा के बारे में इतिहास भारत की जनता को शून्य ज्ञान देता है,

कृपया आप शेयर तो करें ताकि देश जान सके कि सोने की चिड़िया वाला देश का राजा कौन था ?

Monday, 27 March 2017

रामायणकाल और महाभारत काल में विमान होते थे...
 पुष्पक विमान के बारे में भी हम सबने पढ़ा है।…लेकिन हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक 5000 साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतवायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक ‘टाइम वेल’ में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि ‘टाइम वेल’ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं।
रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने 21 दिसंबर 2010 को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।कालीन हो सकता है।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में…
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
न सिपाही बचे और न ही कुत्ते…
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप 40 सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
 
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की…
 
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है। 
साभार – विभिन्न हिन्दी स्रोत