Monday, 20 November 2017

 पिछले दिनों “सेक्सी दुर्गा और सेक्सी राधा” जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा था, देश के फिल्मबाज़ ऐसे शब्दों का प्रयोग कर अपनी फिल्मो के नाम रख रहे थे, और इसे अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी भी बता रहे थे तभी पत्रकार रोहित सरदाना ने ऐसे तमाम लोगों पर ungali उठाते हुए कहा था की, ये लोग सिर्फ सेक्सी राधा और दुर्गा जैसे शब्द ही इस्तेमाल कर सकते है, पर  सेक्सी फातिमा, सेक्सी आयशा, सेक्सी मैरी जैसे नाम का इस्तेमाल नहीं करते, क्यूंकि इन लोगों के निशाने पर सिर्फ हिन्दू होते है, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ये लोग सिर्फ हिन्दुओ को निशाना बनाते है
 अब कट्टरपंथी तत्वों ने रोहित सरदाना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया ,और रोहित सरदाना को हर तरह से चुप करवाने की कोशिशें भी तेज कर दी है .लखनऊ में मशाल खान ने रोहित सरदाना के खिलाफ केस दर्ज करवाया है,  साथ ही कई मुस्लिम धर्मगुरु रोहित सरदाना के खिलाफ बयानबाजी भी कर रहे है, , माफ़ी ना मांगने पर अंजाम भुगतने की धमकियाँ भी दे रहे है..., 
साफ़ है की रोहित सरदाना ने अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल किया तो इनके खिलाफ सब एकजुट हो गए,और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा पर, उनके बोलने की आज़ादी के हक़ पर सेकुलरिज्म के चैंपियन  चुप भी हो गए है...
देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती हैं ये 10 एजेंसियां...!
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1. रिसर्च ऐंड अनैलिसिस विंग (RAW)-
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1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत का इंटेलिजेंस ब्यूरो सही से काम नहीं कर पाया था। ऐसे में एक ऐसी एजेंसी की जरूरत महसूस हुई जो सूचनाएं एकत्रित करने और दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो। इसके नतीजे में 1968 में रॉ का गठन हुआ जिसका उस समय नाम फॉरन इंटेलिजेंस था। रॉ को दुनिया की बेहतरीन खुफिया एजेंसियों में एक माना जाता है। इसने बांग्लादेश के निर्माण, ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्ध और 71, 99 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी।
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2. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)-
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इंटेलिजेंस ब्यूरो का गठन साल 1887 में सरकार के एग्जिक्युटिव ऑर्डर से हुआ और 1947 में इसका पुनर्गठन हुआ। आईबी देश की सबसे पुरानी खुफिया एजेंसी है। आईबी देश में खुफिया ऑपरेशनों को संचालित करती है और विदेश नीति बनाने में सरकार की मदद की करती है। आईबी के सदस्यों को रूस की केजीबी ट्रेनिंग देती है।
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3. नैशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA)-
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नैशनल इन्वेसिटगेशन एजेंसी (एनआईए) का गठन 2008 के मुंबई हमलों के बाद हुआ। यह एजेंसी आतंकवाद से संबंधित मामलों को हैंडल करती है। तंकी हमलों की घटनाओं, आतंकवाद को धन उपलब्ध कराने एवं अन्य आतंक संबंधित अपराधों का अन्वेषण के लिए एनआईए का गठन किया गया जबकि सीबीआई आतंकवाद को छोड़ भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों एवं गंभीर तथा संगठित अपराधों का अन्वेषण करती है।
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4. नैशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (NTRO)-
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साल 2004 में टेक्निकल इंटेलिजेंस एजेंसी का गठन हुआ था। यह अन्य एजेंसियों को खुफिया जानकारी मुहैया कराती है और देश-विदेश में खुफिया सूचनाएं एकत्रित करने में समन्वय करती है। 2014 में इसने आईसीजी को खुफिया जानकारी दी थी जिसकी मदद से 2014 में नए साल की पूर्व संध्या पर पाकिस्तानी जहाज को उड़ाने में मदद मिली थी। यह इसका एक अहम ऑपरेशन था।
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5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB)-
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एनसीबी का गठन 1986 में हुआ था। एनसीबी भारत में मादक पदार्थों की तस्करी और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए काम करती है। इसने ऑपरेशनों में बीएसएफ पंजाब बॉर्डर के साथ समन्वय, बीएसएफ/आर्मी भारत-म्यांमार सीमा पर ऑपरेशनों में अहम भूमिका निभाई।
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6. डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA)-
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इसका गठन 2002 में किया गया था। यह देश-विदेश में डिफेंस से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने का काम करती है। यह सिविल इंटेलिजेंस एजेंसियों पर सशस्त्र बलों की निर्भरता को कम करती है। डायरेक्टोरेट ऑफ सिगनल्स इंटेलिजेंस, डिफेंस इमेज प्रोसेसिंग ऐंड अनैलिसिस सेंटर और डिफेंस इन्फर्मेशन वारफेयर इसके नियंत्रण में हैं।
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7. डायरेक्टोरेट ऑफ एयर इंटेलिजेंस (DAI)-
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यह वायु सेना से संबंधित इंटेलिजेंस एजेंसी है। इसने 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी। यह देश के आंतरिक और सीमा से सटे इलाकों की निगरानी करती है। एयरस्पेस एरिया पर नजर रखने के लिए यह इंटेलिजेंस एजेंसी अवाक्स और ड्रोन्स का इस्तेमाल करती है।
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8. डायरेक्टोरेट ऑफ नेवल इंटेलिजेंस (DNI)-
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यह भारतीय नौसेना का खुफिया अंग है जो सामुद्रिक क्षेत्र में सूचनाएं एकत्रित करने का काम करती है। कराची बंदरगाह पर बमवारी में इसने अहम भूमिका निभाई थी।
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9. डायरेक्टोरेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस (DMI)-
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यह भारतीय थल सेना की इंटेलिजेंस विंग है। इसका गठन 1941 में किया गया था। आजादी के बाद इसे सेना में भ्रष्टाचार की जांच का अधिकार दिया गया। एजेंसी ने कारगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाई।
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10. जॉइंट साइफर ब्यूरो (JCB)-
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इसका गठन 2002 में किया गया था। यह सिगनल अनैलिसिस और क्रिप्टअनैलिसिस को हैंडल करती है। यह संवेदनशील डेटा का इन्क्रिप्शन करती है। इसकी जिम्मेदारी साइबर क्राइम से संबंधित मामलों को हैंडल करने की है।

Sunday, 19 November 2017

पुरे देवभूमि को इस्लामी भूमि बनाने की तैयारी


बद्रीनाथ को अचानक से बदरुद्दीन नहीं बता दिया, पुरे देवभूमि को इस्लामी भूमि बनाने की तैयारी
मेरे एक मित्र ने 1997 में श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति की जोशीमठ बैठक में यह निवेदन किया था कि मुस्लिम बद्रीनाथ को बदरुद्दीन की मजार और केदारनाथ को केदारूदीन की मजार में निरूपित कर फिदाईन तैयार कर रहे हैं। उस वक्त CS टोलिया जी के कहने पर इतिहास लेखन की वैठक थी और उसमें वेदपाठी, धर्माधिकारी के अलावा तत्कालीन मुख्यकार्यकारी अधिकारी बी के मिश्रा थे। तब जनपद चमोली में देवबन्द से प्रशिक्षित जेहादियों को छोटे बच्चों को कुरान और उर्दू पढ़ाने के लिए भेजा गया था। ये घरों में जाकर पढ़ाते थे। तब तक गोपेश्वर में केवल पोस्ट आफिस के पास ही इनका अड्डा जाना जाता था।
देवबन्द के लोगों के आने के बाद परिस्थितियों में परिवर्तन आया। जो रणनीति कश्मीर में अपनायी थी उसे ही उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाने लगा। दिन में अंडे मुर्गी, फल, शब्जी, बिसात खाने, मैकेनिक, की दुकान और रात को जिहाद की शिक्षा। परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं की लड़कियों का मुसलमानों के साथ निकाह की खबरें आने लगी।
गोपेश्वर में मस्जिद बनाने के प्रयास तेज हुए। अलकापुरी में कब्रिस्तान को SDM अबरार अहमद ने डन्डे के बल पर मंजूरी दी। गोपेश्वर नगर क्षेत्र में ही नहीं पूरे जिले में इस्लाम के अनुयायियों की बाढ़ आगयी। उन्होंने ठेकेदार बन कर मकान खरीद लिए । सवर्ण तो मुसलमानों को किरायेदार रखते नहीं। बस्ती वालों के यहां रहे। और वहीं दामाद भी बन गये। पहले माँ से रिश्ते बनाये और बाद में शादी बेटी से की और फिर घर जमाई बन कर जमीन भी हड़प दी। पुलिस लाइन से लेकर पठालीधार पोखरी बैंड तक यही हाल है। और तो और गोपेश्वर जहां एबर्टशन बन्दोबस्त में तक भी 200 नाली जमीन मन्दिर के नाम दर्ज कागजाद थी।
1965 के उत्तराखण्ड ज़मीदारी विनाश कानून ने मन्दिर को ज़मीदारी मान लिया और मन्दिरों के नाम जिस जमीन से मन्दिरों की दिया बत्ती और भोग पूजा होती थी। और मन्दिर के भंडारी, बाजीगिरी, कमदी, आदि खैकर थे, जमीन उन खैकरों के नाम दर्ज हो गयी। मन्दिर कंगाल और अवैध कब्ज़े धारी मालामाल हो गये। आज उस जमीन पर इस्लामिक जेहादियों की हवेलियां उग आयी है।
मन्दिर की जमीन पर उगी इन हवेलियों में पुजारियों को कत्ल करने के लिए हथियारों का जखीरा होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यही स्थिति नन्दप्रयाग और जोशीमठ में है। लेकिन इन जेहादियों को प्रतिष्ठित करने में दोगले पत्रकारों की भी बड़ी भूमिका रही है। दारू के पैक में बिकने वाले पत्रकार हमेशा सेक्युलर आवरण में इनके काले कारनामों को छुपाने के लिए अग्रणी रहे हैं।
हर बार साम्प्रदायिक सौहार्द की दुहाई मंचों से माइक पर देने वालों की ही चलती है। अब जब पिछले 20 सालों में इस्लामिक जेहादियों ने अपनी जमीनी पकड़ यहां मजबूत कर ली तो बद्रीनाथ पर अपने कब्जे के पत्ते खोल दिए हैं। यही कश्मीर में होता रहा है। यह जेहाद की रणनीति का हिस्सा है। अब देवभूमि के अस्तित्व बचाने का एक ही रास्ता है कि म्यामांर सरकार से सीख लेते हुए उनकी नीतियों का अनुपालन किया जाय ।
Vithal Vyas
इसलिए मुझे., रावण याद आता है.......

मुझे ताड़का याद आती है। उसे यज्ञों का विध्वंस करना है, इसके लिए वो सभी मन्त्र जानने वालों की हत्या नहीं करती, वो सारी सामग्री चुरा नहीं भागती। वो बस हवन-कुण्ड में एक हड्डी फेंक जाती है। विदेशी आक्रमणों में हुए जौहर का इतिहास बिगाड़ना था तो बहुत मेहनत नहीं करनी, “पद्मिनी” नाम था या “पद्मावती” इसमें संशय पैदा कर देना भी बहुत है। एक हड्डी ही तो फेंकनी थी, इसलिये ताड़का और राक्षसी तरीका याद आता है।
मुझे सिंहिका राक्षसी याद आती है। ये जीव को नहीं उसकी परछाई को दबोच लेती थी, परछाई को त्यागने में असमर्थ जीव खुद उसके चंगुल में चला आता था। कोई बंधन ना हो, स्वतंत्रता युवाओं को प्रिय होती है, इसलिए वो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर युवाओं को ही बहकाती हैं। संतान तो अपनी ही परछाई सी है, उसे छोड़कर लोग कहाँ जायेंगे ? बच्चों के पीछे वो खुद ही फंसा, चला आता है।
मुझे कालनेमि याद आता है। उसे हनुमान को ठगकर, उन्हें समय से संजीवनी ले आने से रोकना है इसलिए वो साधू का वेष बनाता है। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़े से तिलक, भगवा वस्त्रों और मोटी-मोटी मालाओं में खुले बालों वाली स्त्रियाँ टीवी बहसों में “पद्मावती” फिल्म के समर्थन में उतरी हैं। उन्हें भी बस फिल्म के विरोधियों का विरोध थोड़ा कम करना है। वो जीतेंगी नहीं, कालनेमि जैसा ही उन्हें भी पता है, इसलिए मुझे कालनेमि याद आता है।
मुझे मारीच याद आता है। उसे पता है वो गलत कर रहा है, लेकिन जिनके राजाश्रय में पल रहा है उनकी आज्ञा से बाध्य भी तो है ! वो भेष बदलता है, सोने का मृग बनकर सीता को लुभाने पहुँच जाता है। अंतिम समय तक भी छल नहीं छोड़ता, “हे राम” कहते ही मुक्ति मिलेगी ये जानकार भी “हा लक्ष्मण, हा सीते” चिल्लाता है। फिर वो कलाकार दिखते हैं जो कल निर्माताओं के पैसे पर पले और कल फिर उनके ही पास काम मांगने जाना है। उधार के तीस किलो का लहंगा और कई किलो के जेवर पहनकर वो लुभाने आ जाते हैं, अंत तक “मेरी बरसों की मेहनत डूबी” का रोना रोते हैं। भेष बदलकर वो स्त्रियों को लुभाने आये, इसलिए मारीच भी याद आता है।
मुझे रावण याद आता है। वो ज्ञानी है, लक्ष्मण रेखा क्यों लांघनी चाहिए इसके लिए नीति-धर्म की ही दुहाई देता है। अपने तरीकों, शालीनता, सभ्यता-संस्कृति की सीमाओं के अन्दर मौजूद सीता का वो अपहरण नहीं कर सकता। विमान, सेनाएं, बल-ज्ञान सब उसपर बेकार होगा ये जानता है। इसलिए वो बहकाकर सीता को लक्ष्मण-रेखा के बाहर लाना चाहता है। उसे पता है कि आग से जल सकते हो दूर रहो बच्चे को समझाया जा सकता है, गालियाँ क्यों नहीं सीखनी, इसमें गलत क्या है ? ये समझाना मुश्किल है। बस “माय चॉइस”, “फासीवाद के विरोध”, “आखिर ऐसा होगा क्या देख भर लेने से”, “चल देखें कुछ गलत दिखाया भी या नहीं”, जैसे किसी बहाने से दिखा देना है।
इसलिए मुझे रावण याद आता है।
Anand Kumar
संन्यासी से बने रईस अमेरिकी हिंदुस्तानी...
शांति के लिए भारत के वीरान पहाड़ों में संन्यासी के रूप में 12 साल बिताने के बाद एक शख्स अमेरिका के सबसे रईस भारतीय में शामिल हुआ है. 59 साल के मनोज भार्गव की सफलता ने फोर्ब्स के साथ ही पूरी दुनिया को हैरान किया है.
लखनऊ में जन्मे मनोज भार्गव की कारोबारी सफलता आज पूरी दुनिया में चर्चा बटोर रही है. वह फोर्ब्स की बनाई 400 सबसे अमीर अमेरिकी लोगों की सूची में 1.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 311वें नंबर पर मौजूद हैं. 14 साल की उम्र में अमेरिका पहुंचे भार्गव ने पेन्सिल्वेनिया के हिल स्कूल से हाई स्कूल तक की पढ़ाई की. मशहूर प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में एक साल पढ़ने के बाद उसे अलविदा कह कर मनोज भारत चले आए और यहां पहाड़ों में संन्यासी बन भटकते रहे. इन पहाड़ों में 12 साल बिताने के बाद वह अमेरिका वापस लौटे और कारोबार की दुनिया में कदम रखने से पहले कई तरह के छोटे मोटे काम किए. इनमें टैक्सी चलाने से लेकर प्रिंटिंग प्रेस चलाना, क्लर्क बन कर खाता बही संभालना, और सफाई के ठेके लेना तक शामिल है.
1990 में मनोज भार्गव ने एक प्लास्टिक का कच्चा माल बनाने वाली कंपनी प्राइम पीवीसी इंक शुरू की जो देखते ही देखते दो करोड़ डॉलर की बिक्री वाली कंपनी बन गई. बाद में मनोज ने इसे एक इक्विटी फर्म को बेच दिया. इसके बाद उन्होंने सीधे उपभोक्ताओं के इस्तेमाल वाली चीजें बनाना शुरू किया और नई कंपनी का नाम रखा लिविंग एसेन्शियल्स. इसी कंपनी ने फाइव आवर एनर्जी नाम का एनर्जी ड्रिंक बनाना शुरू किया जो इन दिनों खूब हिट हो रहा है. लिविंग एसेन्शियल्स के अलावा छह और कंपनियां भी हैं जिनकी शुरूआत मनोज भार्गव के हाथों हुई. इनके अलावा मनोज कई तरह से समाज की भलाई के कामों में भी जुटे हुए हैं और इसके लिए ट्रस्ट भी चलाते हैं. उनकी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा समाज की भलाई में ही खर्च होता है.
मनोज भार्गव के बारे में फोर्ब्स ने लिखा, "प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले 59 साल के भार्गव इस सूची में नए नए दाखिल हुए हैं. उन्होंने अमेरिकी सपने को पूरा करने के लिए एक नई राह पर चलना मंजूर किया."
अमेरिका के सबसे ज्यादा अमीर 400 लोगों में पांच भारतीय भी हैं. फोर्ब्स की बनाई अमेरिकी धनकुबेरों की सूची में बिल गेट्स लगातार 19वें साल शीर्ष पर हैं. अमीरों की फेहरिस्त में 56 साल के बिल गेट्स के बाद बर्कशायर हैथवे के वॉरेन बफेट हैं जिनकी कुल संपत्ति 46 अरब अमेरिकी डॉलर पर जा पहुंची है. तीसरे नंबर पर ऑरेकल के लैरी एलिसन है जो पिछले एक साल में सबसे ज्यादा आठ अरब डॉलर कमाने वाले अमेरिकी हैं. उनकी कुल संपत्ति 41 अरब डॉलर है.
अमेरिकी अमीरों की सूची में पहला भारतीय नाम आईटी कंपनी सिंटेल को शुरू करने वाले भरत देसाई का है जो 239वें नंबर पर हैं. कुल दो अरब डॉलर की संपत्ति वाले देसाई ने अपनी पत्नी के साथ मिल कर 1980 में आईटी कंपनी सिंटेल की नींव रखी थी. सिंफनी टेक्नोलॉजी ग्रुप शुरू करने वाले रोमेश वाधवानी इस सूची में दूसरे भारतीय हैं. 250वें नंबर पर
मौजूद वाधवानी की कुल संपत्ति 1.9 अरब डॉलर बताई गई है. आईईटी मुंबई और कार्नेजी मेलन यूनिवर्सिटी में पढ़ चुके वाधवानी ने पहले बिजनेस सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी एस्पेक्ट डेवलपमेंट को आगे बढ़ाया. बाद में उन्होंने साल 2000 के आईटी बूम के दौरान कंपनी को 9.3 अरब डॉलर में बेच दिया.
अमेरिका के अमीर भारतीयों में गूगल के बोर्ड सदस्य और शेयरधारक के राम श्रीराम भी हैं. श्रीराम फोर्ब्स की सूची में 298वें नंबर पर हैं और उनकी कुल संपत्ति 1.6 अरब डॉलर है. मशहूर एनर्जी ड्रिंक 5 आवर एनर्जी बनाने वाली कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज भार्गव 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर के साथ 311वें नंबर पर हैं.
अमेरिका के सबसे रईस लोगों की संपत्ति पिछले एक साल में 13 फीसदी बढ़ कर 1.7 लाख करोड़ तक जा पहुंची है. फेसबुक को शुरू करने वाले मार्क जकरबर्ग इस साल सूची में थोड़ा नीचे खिसक गए हैं. मई में कंपनी के शेयर बाजार में उतरने के बाद कंपनी की संपत्ति घट कर 9.4 अरब डॉलर पर पहुंच गई है. फिलहाल मार्क जकरबर्ग 36वें नंबर पर हैं.
#एनआर/एजेए (पीटीआई)/डी डब्लू
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क्या मौजूदा ट्रकों को चुनौती दे पाएगा ई ट्रक ?

डीजल ट्रक को रोड का राजा कहा जाता है. क्या 30 मिनट की चार्जिंग से 600 किलोमीटर चलने वाला टेस्ला का इलेक्ट्रिक ट्रक नया रोड किंग साबित होगा?
अमेरिकी कंपनी टेस्ला के सीईओ ईलॉन मस्क ने कैलिफोर्निया में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़ा खुलासा किया. मस्क ने दावा किया कि टेस्ला ने एक बार में 804 किलोमीटर की दूरी तय करने वाला इलेक्ट्रिक ट्रक बना लिया है. ट्रक की ढुलाई क्षमता 36.28 टन है. अमेरिका में सेमी ट्रकों के लिए इतना ही लोड तय किया गया है.
बिजली से चलने वाला ट्रक, डीजल ट्रक से कीमत में काफी ज्यादा महंगा है. लेकिन गुरुवार को टेस्ला ने दावा किया कि प्रति किलोमीटर ढुलाई और रखरखाव के लिहाज से उसका ट्रक ज्यादा किफायती साबित होगा.
औटोपाइलट सिस्टम भी है
ट्रक में टेस्ला ऑटोपायलट सिस्टम होगा. सिस्टम की मदद से ट्रक तय की गई स्पीड पर चलता रहेगा. ज्यादा ट्रैफिक होने पर वाहन खुद ही रफ्तार कम करेगा. ऑटोपायलट ट्रक को निर्धारित लेन पर भी चलाता रहेगा.
मेगाचार्जर्स बनाने पड़ेंगे
मस्क ने कहा कि टेस्ला दुनिया भर में सौर ऊर्जा वाले सुपरफास्ट चार्जिंग स्टेशन "मेगाचार्जर्स" का नेटवर्क बनाएगी. ऐसे चार्जिंग स्टेशनों पर 30 मिनट की चार्जिंग के बाद ट्रक 600 किलोमीटर की यात्रा कर सकेगा. कंपनी ने वादा किया है कि ट्रक 2019 से बाजार में आ जाएगा. अमेरिका में इच्छुक ग्राहकों को 5,000 डॉलर जमा कराकर ऑर्डर देना होगा.
टेस्ला का ई ट्रक
दुनिया भर के ट्रक बाजार पर अभी डीजल इंजन का नियंत्रण है. डीजल इंजन जांचा परखा है. साथ ही डीजल हर जगह आसानी से उपलब्ध भी हो जाता है. मस्क इस वर्चस्व को तोड़ना चाहते हैं. अमेरिका में 2016 में 4,100 ई ट्रक बिके. नैविगेंट रिसर्च के मुताबिक 2026 तक यह संख्या 70,000 होगी. अमेरिका में फिलहाल बिजली से चलने वाले पिक अप ट्रकों की मांग बढ़ रही है. इन्हें रात भर चार्ज किया जाता है और 160 किलोमीटर की रेंज कवर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
चुनौतियां भी है
परिवहन पर शोध करने वाली संस्थाओं के मुताबिक डीजल पर सख्ती और बेहतर चार्जिंग से बिजली वाले वाहनों को फायदा मिलेगा. अमेरिका, यूरोप और चीन में आने वाले समय में गाड़ियों के उत्सर्जन के मानक कड़े होने तय हैं.
लंबी दूरी के लिए ई ट्रक बनाने का दांव टेस्ला ने चला है. इस राह में कई चुनौतियां भी हैं. कंपनी को दुनिया भर के हाईवेज पर सुपरफास्ट चार्जिंग का नेटवर्क बनाना होगा. अगर चार्जिंग में दो घंटे का समय लगा तो माल डिलिवर करने में देरी होगी. साथ ही कोई खराबी आने पर रिपेयर सुविधा भी जल्द मुहैया करानी होगी. केली ब्लू बुक की ट्रांसपोर्ट विशेषज्ञ रेबेका लिंडलैंड बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं. वह कहती हैं, ट्रांसपोर्टर "कारोबारी लोग होते हैं, उनके सामने यह साबित करना होगा कि यह ट्रक मौजूदा तकनीक से कहीं ज्यादा बेहतर है."
रोडस्टर के साथ ईलॉन मस्क स्पोर्ट कार
मस्क ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक और बड़ी खबर दी. उन्होंने टेस्ला की पहली स्पोर्ट्स कार रोडस्टर लॉन्च करने की घोषणा की. 402 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार भर सकने वाली रोडस्टर 2020 में बाजार में आएगी. 2,00,000 डॉलर की रोडस्टर एक चार्जिंग में 1,000 किलोमीटर की दूरी तय करेगी.
#डी डब्लू
इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण

हाल ही में तीन नए देशों का सृजन हुआ है। ईस्ट तिमोर, दक्षिणी सूडान और कोसोवो।
क्या हम अधिकांश भारतीयों को यह पता है इन देशों का निर्माण किस आधार पर हुआ है?
जिन्हें नहीं पता है उनके लिए जानकारी है कि इन देशों का निर्माण जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण हुआ है।
ईस्ट तिमोर जो इंडोनेशिया का एक भाग था में पहले ईसाइयों की आबादी बहुत कम थी, मुसलमानों एवं अन्य मत के मानने वाले लोगों की आबादी 80% से अधिक थी केवल 50 वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रयत्न से ईस्ट तिमोर में ईसाइयों की जनसंख्या 80% से अधिक हो गई, परिणाम स्वरुप संयुक्त राष्ट्र के दखल से जनमत संग्रह करा कर ईस्ट तिमोर नाम के देश का निर्माण कर दिया गया। कोई युद्ध नहीं हुआ।
सूडान के दक्षिणी क्षेत्र में गरीबी थी, मिशनरियों के प्रभाव में कुछ आदिवासी लोगों को पहले ही ईसाई बनाया गया। धीरे धीरे इस मुस्लिम बहुल देश को दक्षिणी क्षेत्र में ईसाइयों से भर दिया गया। फिर गृह युद्ध करा दिया गया। शांति प्रयास संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुए और परिणिति दक्षिणी सूडान को काटकर ईसाई देश के रूप में नए देश की मान्यता दे दी गई।
कोसोवो सर्बिया के भीतर एक ऐसा क्षेत्र था जिसमें खदानें बहुत अधिक थीं। इन खदानों में काम करने के लिए अल्बानियाई मूल के मुसलमानों को मजदूर के रूप में लाया गया था।कालांतर में इनकी संख्या बढ़ गई। यूगोस्लाविया के विघटन के बाद सर्बिया स्वतंत्र देश बना। लेकिन मुसलमानों ने सर्बों के अधीन रहना स्वीकार नहीं किया और कोसोवो को अलग देश बनाने की मांग किया। गृहयुद्ध जैसी स्थिति कई वर्षों तक रही। फिर नया देश बन गया।
भारत के कई क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से जनसांख्यकीय परिवर्तन किए जा रहे हैं।
बहुसंख्यक आबादी इससे अनजान है।
विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों मे ऐसा होने से गैरकानूनी एवं आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं।
यदि हम भारत की अखंडता बनाए रखना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन से मिलकर हमें समस्या का समाधान खोजना चाहिए। आखिर हम भी तो भारत माता के बिना वर्दी वाले सैनिक हैं।