Saturday, 23 September 2017

saskar-nov

हिंदु और सिखों में अलगांव वाद पैदा करनेवाले जरा एक बार बज्जर सिंह का चरित्र पढ़ ले -

सरदार बज्जर सिंह राठौड़ के विषय में, जिनका देश के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है बहुत कम लोग इससे परिचित हैँ।

सरदार बज्जर सिंह राठौड सिक्खो के दसवे गुरू श्री गोविंद सिंह जी के गुरू थे ,जिन्होने उनको अस्त्र शस्त्र चलाने मे निपुण बनाया था। बज्जर सिंह जी ने गुरू गोविंद सिंह जी को ना केवल युद्ध की कला सिखाई बल्कि उनको बिना शस्त्र के द्वंद युद्ध, घुड़सवारी, तीरंदाजी मे भी निपुण किया। उन्हे राजपूत -मुगल युद्धो का भी अनुभव था और प्राचीन भारतीय युद्ध कला मे भी पारंगत थे। वो बहुत से खूंखार जानवरो के साथ अपने शिष्यों को लडवाकर उनकी परिक्षा लेते थे। गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने ग्रन्थ बिचित्तर नाटक मे इनका वर्णन किया है। उनके द्वारा आम सिक्खो का सैन्यिकरण किया गया जो पहले ज्यादातर किसान और व्यापारी ही थे और भारतीय martial art गटखा का प्रशिक्षण भी दिया, ये केवल सिक्ख ही नही बल्की पूरे देश मे क्रांतिकारी परिवर्तन साबित हुआ।
बज्जर सिंह राठौड जी की इस विशेषता की तारीफ ये कहकर की जाती है कि जो कला सिर्फ राजपूतों तक सीमित थी उन्होंने मुग़लो से मुकाबले के लिये उसे खत्री सिक्ख गुरूओ को भी सिखाया, जिससे पंजाब में हिन्दुओ की बड़ी आबादी जिसमे आम किसान, मजदूर, व्यापारी आदि शामिल थे, इनका सैन्यकरण करना संभव हो सका।

===पारिवारिक पृष्टभूमि===
बज्जर सिंह जी सूर्यवंशी राठौड राजपूत वंश के शासक वर्ग से संबंध रखते थे। वो मारवाड के राठौड राजवंश के वंशंज थे --
वंशावली--
राव सीहा जी
राव अस्थान
राव दुहड
राव रायपाल
राव कान्हापाल
राव जलांसी
राव चंदा
राव टीडा
राव सल्खो
राव वीरम देव
राव चंदा
राव रीढमल
राव जोधा
राव लाखा
राव जोना
राव रामसिंह प्रथम
राव साल्हा
राव नत्थू
राव उडा ( उडाने राठौड इनसे निकले 1583 मे मारवाड के पतंन के बाद पंजाब आए)
राव मंदन
राव सुखराज
राव रामसिंह द्वितीय
सरदार बज्जर सिंह ( अपने वंश मे सरदार की उपाधि लिखने वाले प्रथम व्यक्ति) इनकी पुत्री भीका देवी का विवाह आलम सिंह चौहान (नचणा) से हुआ जिन्होंने गुरू गोविंद सिंह जी के पुत्रो को शस्त्र विधा सिखाई--।

1710 ईस्वी के चॉपरचिरी के युद्ध में इन्होंने भी बुजुर्ग अवस्था में बन्दा सिंह बहादुर के साथ मिलकर वजीर खान के विरुद्ध युद्ध किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी।

स्त्रोत : गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा कृत-बिचित्तर नाटक
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Friday, 22 September 2017

वेदव्यासों द्वारा वेद मन्त्रों का संकलन-
28 वेदव्यास हुए थे, अर्थात् 28 बार वेदों का संकलन हुआ। कई बार वेद लुप्त भी हुए हैं। उनका हयग्रीव, वराह तथा मत्स्य अवतारों द्वारा उद्धार हुआ है।
केवल दयानन्द द्वारा सुनी हुई संहितायें ही वेद नहीं हैं। ऋक् वेद की सभी 21 संहितायें ऋक् वेद हैं। उनमें अभी 3 उपलब्ध हैं-शाकल्य, वाष्कल, शांख्यायन। इसी प्रकार यजुर्वेद की सभी 101 शाखायें यजुर्वेद हैं। शुक्ल की 2 तथा कृष्ण की 4 शाखा उपलब्ध हैं-काण्व, माध्यन्दिन, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कपिष्ठल। सामवेद की आकाश में 1000 तथा शब्द रूप में 13 शाखा हैं जिनमें 3 उपलब्ध हैं-कौथुमी, जैमिनीय, राणायनीय। अथर्ववेद की आकाश में 50 तथा शब्द रूप में 9 शाखा हैं जिनमें 2 उपलब्ध हैं-शौनक, पैप्पलाद।
वेद मन्त्र समझने लायक, भाषा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, ज्योतिष, कल्प, शिक्षा का जब तक विकास नहीं हो तब तक किसी भी मनुष्य को तथाकथित ईश्वर वेद नहीं दे सकता। इसमें प्रत्येक मन्त्र में ऋषि के उल्लेख से ही स्पष्ट है कि भिन्न भिन्न स्थान और काल के ऋषियों को मन्त्र का दर्शन हुआ था। इनका संकलन 28 बार 28 व्यासों द्वारा हुआ है।
ब्रह्म के कई स्तर हैं। परात्पर में निर्विशेष या सविशेष द्वारा कोई मन्त्र नहीं दिया जा सकता। ईश्वर रूप सभी प्राणियों के हृदय में रह कर नियन्त्रण करता है (गीता, 18/61)। उसकी प्रेरणा से अनुभव हो सकता है। वह परा वाणी के स्तर पर होगा। उसको पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी के स्तर पर व्यक्त करना मनुष्य ऋषि का काम है। अव्यक्त परा वाक् को व्यक्त वाणी के मन्त्र में प्रकट करने से वह शाश्वत होता है जैसा ईशावास्योपनिषद (काण्व संहिता, अध्याय 40) में लिखा है-
स पर्यगात् शुक्रं अकायं अस्नाविरं, शुद्धं अपापविद्धं कविः मनीषी परिभूः स्वयम्भूः याथातथ्यतो अर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः।
मनुष्य ऋषियों द्वारा अलग अलग मन्त्र का दर्शन होने पर भी 3 प्रकार से वेद अपौरुषेय है-
(1) मन्त्र दर्शन के समय ऋषि अपने व्यक्तित्व से स्वतन्त्र था।
(2) यह किसी एक व्यक्ति का मत नहीं है। भिन्न भिन्न ऋषियों के मन्त्रों के संकलन रूप में औसत है।
(3) 5 प्रकार के ज्ञानेन्द्रिय द्वारा प्राप्त ज्ञान के अतिरिक्त इसमें 2 प्रकार के अतीन्द्रिय ज्ञान भी हैं। इनके माध्यम के रूप में 5 सत् प्राण तथा 2 अतिरिक्त असत् प्राण (परोरजा, ऋषि) वेद में वर्णित हैं।
वेद को ३ अर्थों में अपौरुषेय कहा है-
(१) अतीन्द्रिय ज्ञान-सामान्यतः ५ ज्ञानेन्द्रियों से ५ प्राणों के माध्यम से ज्ञान होता है। अन्य २ असत् प्राणों से अतीन्द्रिय ज्ञान होता है। इनको परोरजा तथा ऋषि कहा गया है। सृष्टि का मूल ऋषि प्राण है जो सभी चेतना से परे होने के कारण असत् है। ऊपर (स्रोत) से नीचे (शिष्य) तक ज्ञान का प्रवाह परोरजा प्राण द्वारा है, यह परोऽवरीय कहा है (पर से अवर)-
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् (मुण्डकोपनिषद् २/१/८),
पञ्च प्राणोर्मिं पञ्च बुद्ध्यादि मूलाम्। (श्वेताश्वतर उपनिषद्१/५)
परोरजसेऽसावदोम् (बृहदारण्यक ५/१४/७), परोरजा य एष तपति (भ्रुह. ५/१४/३)
परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति, य एतदेवं विद्वान् (छान्दोग्य उपनिषद् १/९/२)
असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति । ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
(२) कई ऋषियों का समन्वय- वेद मन्त्रों का दर्शन मनुष्य ऋषियों द्वारा हुआ। किन्तु कई हजार वर्षों तक विभिन्न देशों के ऋषियों द्वारा मन्त्र का दर्शन होने से उनका समन्वय अपौरुषेय है।
ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात् कृतकर्माण ऋषयो बभूवुः। (निरुक्त १/२०)
तद्वा ऋषयः प्रति बुबुधिरे य उतर्हि ऋषय आसुः (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/१४)
नमो ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रविद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यो। मा मामृषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहु (दु) र्दैवी वाचमुद्यासम्॥ (वरदापूर्वतापिनी उपनिषद्, तैत्तिरीय आरण्यक, ४/१/१, मैत्रायणी संहिता ४/९/२)
ऋषे मन्त्रकृतां स्तोत्रैः कश्यपोद्वर्धयत् गिरः। सोऽयं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥ (ऋक् ९/११४/२)
आप्तोपदेशः शब्दः। (न्याय सूत्र १/१/७)
(३) तीन विश्वों का समन्वय-विश्व के ३ स्तरों का समन्वय जो विज्ञान के प्रयोगों द्वारा सम्भव नहीं है-आधिदैविक (आकाश की सृष्टि), आधिभौतिक (पृथ्वी पर), आध्यात्मिक (मनुष्य शरीर के भीतर)। इनका एक दूसरे की प्रतिमा रूप दर्शन परोरजा या ऋषि प्राण से सम्भव है।
स ऐक्षत प्रजापतिः (स्वयम्भूः) इमं वा आत्मनः प्रतिमामसृक्षि। आत्मनो ह्येतं प्रतिमामसृजत। ता वा एताः प्रजापतेरधि देवता असृज्यन्त-(१) अग्निः (तद् गर्भितो भूपिण्डश्च), (२) इन्द्रः (तद् गर्भितः सूर्यश्च), सोमः (तद् गर्भितः चन्द्रश्च), (४) परमेष्ठी प्राजापत्यः (स्वायम्भुवः)-शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१२-१३)
पुरुषोऽयं लोक सम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुः आत्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके॥ (चरक संहिता, शारीरस्थानम् ५/२),
अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च (तत्त्व समास ७)
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्म उच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः॥३॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषस्याधिदैवतम्। (गीता, अध्याय ८)
सृष्टि और वेद का आरम्भ- पहले मूल वेद एक ही था। इसे ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को पढ़ाया था अतः उसे अथर्ववेद कहते थे। बाद में उसका परा और अपरा विद्या मे अङ्गिरा ने विभाजन किया। उनके शिष्य सत्यवह भरद्वाज ने अपरा विद्या का विभाजन 4 वेद और 6 अङ्गों में किया। यह मुण्डक उपनिषद् के प्रथम 5 श्लोकों में है। अतः भरद्वाज गोत्र वालों को आङ्गिरस भरद्वाज कहते हैं। मूल वेद अथर्ववेद होने के कारण इसके बारे में सभी वेदों में लिखा है ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में ही 30 बार सामवेद तथा प्रायः 40 बार अथर्ववेद का उल्लेख है। पर इस ऐतिहासिक क्रम को नष्ट करने के लिए अंग्रेजों ने प्रचार किया कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है। वैदिक क्रम को नष्ट करने के लिए यूनेस्को आदि भी ऐसी घोषणा करते रहते हैं। भारतीय लोग विदेशियों की नकल के अतिरिक्त कुछ नहीं करते। मूल अथर्व से 3 शाखाएं ऋक्, यजु, साम निकली, पर मूल भी बना रहा। अतः त्रयी का अर्थ 4 वेद होता है-एक मूल और 3 शाखा। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे 3 पत्ते निकलने पर मूल भी बना रहता है। यज्ञोपवीत के समय वेदारम्भ संस्कार के लिये वेद का प्रतीक पलास दण्ड का प्रयोग होता है। यह वेद निर्माता ब्रह्मा का भी प्रतीक है।
मूल अथर्ववेद का प्रथम श्लोक है-
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वाः = जो 3 प्रकार के 7 हैं उनसे सभी विश्व व्याप्त हैं।
इसके 15 प्रकार के अर्थ हैं। एक अर्थ है कि 7-7 लोक आकाश में, पृथ्वी पर तथा शरीर के भीतर हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार यह सृष्टि का क्रम है। चूँकि सृष्टि का आरम्भ 3 सप्तक से हुआ, अतः वेद का आरम्भ भी उसी से हुआ तथा मनुष्य भी अपना काम वैसे ही शुरू करता है। आकाश में पहले 7 लोक हुये, तब 8 दिव्य सृष्टि और 6 पार्थिव सृष्टि हुई। 7 लोक हैं-भू, भुवः (ग्रह कक्षा), स्वः (सौर मण्डल), महः (आकाश गंगा की सर्पाकार भुजा में सूर्य के चारों तरफ उसकी मोटाई के बराबर का गोला। इसके 1000 तारा शेषनाग के 1000 सिर हैं), जनः (आकाश गंगा), तपः (दृश्य जगत् जहां तक का प्रकाश यहां तक आ सकता है), सत्य (अनन्त आकाश)।
हर लोक की चेतना या प्राण का एक स्तर है जो उस लोक की दिव्य सृष्टि है। अव्यक्त स्रष्टा या ब्रह्म सर्वव्यापी है-कुल 8 दिव्य सृष्टि हुई। पृथ्वी पर 6 प्रकार की सृष्टि है-मनुष्य ब्रह्म या विश्व की प्रतिमा है। मनुष्य मस्तिष्क में उतने ही कण (न्यूरॉन) हैं जितना दृश्य जगत् मे आकाश गंगा, या हमारी आकाश गंगा में उतने तारा हैं।एक निर्जीव या मृत (मिट्टी) है। एक अर्ध चेतन वृक्ष है। बाकी 3 जल, स्थल तथा वायु के जीव हैं।
✍🏻अरुण उपाध्याय
.इस्लाम की शीर्ष संस्था है उम्माह... जिसका सार है कि  मुसलमानो  को किसी देश के प्रति ईमानदार नहीं होना चाहिए, क्योंकि मुसलमान के लिए केवल इस्लाम का महत्व है...
अगर किसी भी देश के मुसलमान के लिए अपने देश के काफिरों को मारना पड़े, तो मुसलमान को एक पल भी नहीं सोचना चाहिए..., जी हां यही है इस्लाम में राष्ट्रवाद न होने का सार।
इस्लाम के अनुसार जहां तक मुसलमानों की बहुसंख्यक जनता के प्रभाव से देश चलते हैं, शासन चलते हैं वह सब दार-अल-इस्लाम हैं। +जो नही हैं वह दार-अल-हर्ब की भूमि कही जाती है।
भारत, बर्मा, श्रीलँका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि को "उम्माह" के अनुसार दार-अल-कब्ज़ा की स्थिति में माना जाता है, हालांकि इसका कोई लिखित concept नही है जैसे दार-अल-इसलाम और दार-अल-हर्ब का है।
 बौद्ध राजाओं ने "Rakhine" में रहने वाले मुसलमानो को इज़्ज़त, दौलत दी... लेकिन स्वभाव से मजबूर बर्मा के मुसलमानो, ने इन सारी इज़्ज़तों को लात मार के "उम्माह" के concept पे चलने का फैसला किया।
परन्तु DNA की विकृति से मजबूर रोहिंग्या मुसलमानो ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय, गुप-चुप तरीकों से Britian से setting कर ली कि बर्मा के मुसलमान अपने ही बौद्ध भाइयों के खिलाफ (जो द्वित्य विश्व युद्ध में जापान की तरफ थे) विश्व युद्ध में England का साथ देंगे और बदले में England उनको एक मुस्लिम राष्ट्र देने में मदद करेगा।
तो रोहिंग्या मुसलमानो ने इंग्लैंड के साथ मिल कर के अपने ही बौद्ध भाइयों को काटना शुरू किया, और खूब काटा, जी भर जाने तक काटा.... लेकिन जैसा होता आया है विश्व युद्ध जीत जाने के बाद England ने रोहिंग्या मुसलमानो को कोई इस्लामिक राष्ट्र देने में मदद नहीं की, अर्थात अपना काम बना कर निकल गए।
 , भोले-भाले बौद्ध भी हिन्दूओं की भांति इस इस्लामिक शीर्ष संस्था "उम्माह" के concept को जानते भी नहीं थे... इन सब को भुला कर बौद्धों ने रोहिंग्या मुसलमानो को शान्ति से और मिल-जुल कर रहने का प्रस्ताव दिया, पर रोहिंग्या मुसलमान उस प्रस्ताव को ठुकरा के MAY, 1946 में जिन्नाह के पास चले गए, खुद को पाकिस्तान में मिलवाने का प्रस्ताव लेकर...
नरमदिल बौद्ध लोगों ने बड़ी दरियादिली दिखा कर रोहिंग्या मुसलमानो के सब गलती को माफ़ करके अपने Parliament में बुलाया, और रोहिंग्या मुसलमानो से उनकी परेशानी बताने को कहा ताकि मिल-जुल कर दोनों समुदाय ख़ुशी से रह सकें... पर रोहिंग्या ने भाईचारे के इस पेशकश को मानने से इंकार कर दिया 
फिर रोहिंग्या ने वही किया, जो दुनिया भर के मुसलमान करते हैं, गुप्त रास्तों से रोहिंग्या मुसलमानो ने RAKHINE में लाखों बांग्लादेशियों की घुसपैठ कार्रवाई, और RAKHINE के जन्मसंख्या का ढांचा बदल दिया।
अधिक आबादी के जोश में रोहिंग्या मुस्लमानो ने फिर से बर्मा के बौद्धों पर हमला शुरू कर दिया और 1954 में 100 से अधिक बौद्धों का क़त्ल किया, जिसके जवाब में बर्मा सरकार को मजबूरन रोहिंग्या पे attack करना पड़ा, जिसमे काफी रोहिंग्या भी मारे गए।

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केरल के एक मुस्लिम  धर्मगुरु अब्दुल मुहसिन एडिड ने बयान दिया है कि वह जो कुछ कह रहा है वह उसका निजी बयान नहीं, बल्कि उसका बयान इस्लाम और सऊदी अरब के मुस्लिम धर्मगुरु की विचारधारा के हवाले से दिया गया है: मुहसिन एडिड ने कहा है कि मुसलमानो के लिए देशभक्ति हराम है क्योंकि इस्लाम में देशभक्ति हराम है।
 धर्मगुरु ने यह भी कहा है कि भारत के मुसलमानो को इस्लामिक देशों (पाकिस्तान, सऊदी इत्यादि) से प्यार करना चाहिए, भले ही वो उसके निवासी हो न हो, या उन देशों से कोई सम्बन्ध भी न हो। उन्हें तो सिर्फ मुसलमान होने के कारण इस्लामिक देशों से प्यार करना चाहिए। उनके प्रति ईमानदारी रखनी चाहिए। मुसलमानो के लिए इस्लाम पहले है, और भारत की जगह उन्हें उन देशों को प्यार करना चाहिए जो की इस्लामिक देश हो, जैसे की पाकिस्तान, सऊदी अरब, बांग्लादेश, अफगानिस्तान -इत्यादि..
उमा शंकर सिंह

Thursday, 21 September 2017

 *इसाई धर्म*
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ईसा एक है
बाइबिल एक।
फिर भी, लेटिन कैथलिक, सीरियन कैथलिक, मारथोमा, पेंटेकोस्ट, सैल्वेशन आर्मी, सेवेंथ डे एडवांटिष्ट, ऑर्थोडॉक्स, जेकोबाइट जैसे 146 फिरके आपस में किसी के भी चर्च में नहीं जाते।
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*इस्लाम धर्म*
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अल्लाह एक,
कुरान एक,
नबी एक।
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फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे। सबकी अलग मस्जिदें। साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ सकते। धर्म के नाम पर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।
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*हिन्दू धर्म*
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1280 धर्म ग्रन्थ
10 हज़ार से ज्यादा जातियां, अनगिनत पर्व एवं त्योहार,
असंख्य देवी-देवता।
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एक लाख से ज्यादा उपजातियां, हज़ारों ऋषि-मुनि, सैकड़ों भाषाएँ।
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फिर भी सारे हिन्दू सभी मन्दिरों में जाते हैं और सारे त्योहारों को मनाते हुए आपस में शान्ति एवं शालीनता से रहते हैं।
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यह है भव्यता, सुन्दरता और खूबसूरती हिन्दू धर्म की ...... !!
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फिर क्यों न गर्व हो हिन्दुओं को हिन्दू धर्म पर .....आज कल लोगो के पास मे aadhyatmik ज्ञान की कमी होने के कारण लड़ाई बड़ रहा है. हिन्दू में अशांति फेल रही है । आपस मे एक नही हो पा रहे है। लोग आपने को ही नही जानते है कि मै कौन हूं? लोग आपने को अलग अलग जाती में हिन्दू बट गए है। कोई बोलता है में ब्राम्हण हु कोई छत्रिय, कोई वैस्य, कोई शूद्र आपने आप को नही जानने के कारण आज हिन्दू एक नही हो पाता है। मैं आत्मा हु बस इतना मान ले और जान ले तो उसी दिन से ही सभी हिन्दू एक जुट हो जाएंगे। हिन्दू एक जुट नही होने के कारण मुसलमान और ईसाई मिशनरी इसका बहुत अच्छे से फायदा उठा रहा है और हिन्दू बैठा हुए है सोया हुए है ।
जागो हिन्दू जागो।
Kuber Ram Sapaha

गजवा-ए-हिन्द का ये सच! आँखों के सामने होने के बावजूद भी नहीं जानते करोड़ों हिन्दू...
गजवा-ए-हिन्द का मतलब होता है इस्लाम कि भारत पर विजय। और इस की तैयारी जोरो पर है। एक जगह जहाँ मिडिया हिन्दुओ का ध्यान बाटने में लगी है, वही दूसरी और यह कोशिशें ज़ोरों पर है,फर्क सिर्फ यह है इन कोशिशों को सेकुलर चोला पहनाया जा रहा है।
काफिरों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं। जब भी किसी आक्रान्ता और अक्रमंनकारी के नाम के सामने गाजी लग जाता है, उसका यह मतलब होता है कि निश्चय ही वह हिन्दुओ का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था।
हिन्दुओ की सबसे बड़ी कमजोरी है की हम अपने ही धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और फिर भी अपने को सेकुलर कहते है। पर क्या हम सेकुलर का मतलब भी जानते है ? कभी भी कोई मुस्लिम अपने को सेकुलर नहीं कहेगा, फिर चाहे वह नेता हो या आम नागरिक। पर वह एक भीड़ को सेकुलर भाषण जरुर दे सकता है। कहा जाता है कि मुहीम के लिए लड़के इस तरह तैयार किए जा रहें है कि वह पुलिस और फ़ौज से मुकाबला कर पाएंगे और हर आम गैर मुस्लिम पर भारी पड़ेंगे।
यह बहुत ही चिंता कि बात है क्यूंकि गजवा-ए-हिन्द का मतलब है की भारत में सभी गैर मुस्लिम पर इस्लामिक शरिया कानून लागु किया जायेगा, जिसका साफ़ साफ शब्दों में यह मतलब हुआ कि:
“इनको मारकर ख़तम कर दो या इनको इस्लाम स्वीकार कराओ”
या
“उन्हें तब तक जिन्दा रखो जब तक अपनी कमाई का एक हिस्सा “जजिया कर” के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहे”
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, मुग़ल यह कोशिश एक बार पहले कर चुके है, जिसका बड़ा उदाहरण “ताजमहल” है, जो एक शिवमंदिर था और उसे?
गजवा-ए-हिन्द को और तफ्शीश से समझिये:
1- अल-तकिय्या
इस अवस्था में जब एक मुस्लिम कमजोर हो जाता है, तब उसे काफिरों यानि गैर-मुस्लिमों से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना कि पूरी इज़ाज़त होती है। इस अवस्था से मुस्लमान अपने को अंदरूनी तौर से मजबूत रखेंगे और काफिरों से अपनी अंदरूनी जानकारियों से दूर रखेंगे। इसके चलते नेहरुद्दीन जवाहिरी और मैमूना बेगम, राजीव का असली धर्म आज भी किसी को नहीं पता है।
2- काफिरों के मन में भय भरना
इस मुकाम को हासिल करने के लिए काफिरों पर धोखे से हमला करना और उनकी हत्या करना, जायज़ होगा। उनपर झुण्ड बनाकर किसी एक जगह पर हमला करा जायेगा। और ऐसा तो पिछले ३-४ सालों से भारत में जारी है। कितने ही गैर मुस्लिम अगुआ और आक्रामक नेताओं को मौत के घात उतर दिया गया है। इससे लोगों के दिल में डर बना रहता है। और सार्वजनिक रूप से आम हिन्दू इसके खिलाफ जबान नहीं खोलते।
3- हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना
इस मुहीम के मुसलमानों का मानना है काफ़िर को जितनी पीड़ा दायक मृत्यु दी जाये और वो भी दूसरे काफ़िर को दिखाकर) वह उतना ज्यादा प्रभावित होता है। हथियार इकठ्ठा करने का काम अदनान खगोशी और उसके बाद बहुत से मुस्लिम तस्कर पिछले ४० साल से कर रहे हैं। सबसे ज्यादा हथियार सोवियत संघ से मुस्लिम देशों के टूटने के बाद भारत में लाये गए, अनुमान के अनुसार पूर्व सोवियत देशों से १ करोड़ AK-47 गायब हुयीं मगर आज तक उनका कोई पता नहीं है! ये हथियार मुख्यतः भारत में है और कुछ अफ़ग़ानिस्तान में।
4- समय समय पर काफिरों की ताकत का अंदाज़ा करना
ताकत का अंदाज़ा लगाने के लिए दंगो का सहारा लिया जाता है। यह प्रतिरोध का आंकना बहुत दिनों से चल रहा है और इसका उदाहरण जम्मू के किश्तवाड़ में देखने को मिला है। छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा करवाया जायेगा, और जब काफिर एक जुट हो जायेंगे तो उनकी ताकत का पता लग जायेगा।
5- ठिकाने या शिविर बनाना
इस काम के लिए धर्म का सहारा लिया जायेगा और दूसरे धर्म पर इस्लाम को सच्चा धर्म बताकर लोगों को आस्थावान बनाया जायेगा। इससे लोग मुस्लिमों पर विश्वास कर्नेगे और उन पर शक नहीं करेंगे। इन इलाकों से गैर मुस्लिमों को दूर रखा जायेगा, जिस से उन्हें गतिविधियों की जानकारी मिल नहीं पायेगी। इस काम के लिए बस्तियों और मस्जिदों को इस्तेमाल किया जायेगा। लोगों को इकठ्ठा करा जायेगा और उन्हें भड़काकर काफिरों का सफाया करने के लिए भेजा जायेगा। उद्देश्य सभी काफिरों को भगाना होगा, ताकि उन्हें संवेदनशील सूचनाएँ न मिल पाएं।
“क्योंकि इस्लाम की असली ताकत “अल-तकिय्या” ही है।”
6- सरकारी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करना
इस काम के लिए तो खुद सरकारें शामिल हैं। सच तो यह है कि सेकुलर सरकारें खुद इस काम को समर्थन दे रही हैं। अगर किसी फौजी के पास १२०० गज कारगर रेंज की असाल्ट रायफल है, वह यह जान ले कि यह जेहादियों पर गुलेल चलने के बराबर है। इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन केस इसी का भाग है, यह दोनों केस इस्लामिक शक्तियों के इशारे पर हुए थे।
7- व्यापक दंगे
यह गजवा-ए-हिन्द का अंतिम उद्देश्य है और इस में बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर मुस्लिम मर्दों को मौत के घाट उतरा जायेगा। गजवा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण सबसे उपयुक्त समय होगा, और ऐसा पाकिस्तानी वेबसाइटों पर बार-बार देखने को मिलता है। जेहादी लड़कों के मरने पर युवा जेहादियों को ७२ सुन्दर जवान हुर्रें मिलने की बात कई बार कही गई है। और वह जीत जाता है तो जवान काफ़िर महिलाओं के साथ सहवास करने के अनंत मौके प्रदान किए जायेंगे!
यही अंतहीन सिलसिला पिछले १४०० सालों से चल रहा है। पहले हमारे देश कि सनातनी जड़ें गहरी थीं, जिस कारण हम ऐसे खतरों का सामना बड़ी अच्छी तरह से कर पाते थे। लेकिन आज के दिन झूठे इतिहास और गलत पढ़ाई तथा चर्चों ने हिंदुत्व को बहुत आघात पहुँचाया है।
गजवा-ए-हिन्द की प्रक्रिया कश्मीर में आज़माई जा चुकी है १००% सफल रही है, जम्मू में इसका ट्रायल चल रहा है। बीच में ईसाइयत के इनके खेल को कमजोर ज़रूर किया था लेकिन अब दोबारा इसने गति पकड़ ली है।
उमा शंकर सिंह

250 ग्राम नीम के पत्ते लें |
इन्हें साफ करके एक बर्तन में रख दें।
1/2 लीटर साफ पानी एक बर्तन में लें और नीम के पत्ते उसमें डाल कर अच्छी तरह गर्म करें ।
फिर इसमें 3 दाने इलायची, थोड़ा सा पौदीना, थोड़ी सी दालचीनी और 4 दाने लोंग के डालें ।
जब पानी आधा रह जाए तब पानी को उतार कर छान लें।
ठंडा होने पर ये एक ग्लास पानी लेकर कुल्ली करें और 2 घूंट पी जाएं
इससे खोपड़ी का वो कीड़ा मर जाएगा , जो आपको काम-धंधे छुड़वा कर wtsapp उलझाए रखता है
Jitendra Pratap Singh

*अन्न के स्थूल भाग से रक्त मज़्ज़ा और शारीरिक कोष बनते हैं, अन्न की ऊर्जा से प्राणमय कोष बनते हैं और अन्न के संस्कार से मनोमय कोष बनता है।* आहार चयन में विशेष सावधानी बरते, कृषि द्वारा प्राप्त अन्न जिसे दुबारा बोने पर पुनः पौधे निकल सकें, ऐसे सात्विक अन्न को बलिवैश्व में भोग लगा के संस्कारित करके खाने से स्वस्थ शरीर के साथ, श्रेष्ठ प्राण ऊर्जा और श्रेष्ठ मन बनता है जो मानव मात्र के लिए उत्तम है।
पशु जिनमें सम्वेदना व्यक्त करने की क्षमता हो, दर्द पर छटपटाहट हो, ऐसे जीव को मारकर खाने पर मॉस में पशु का श्राप होता है। स्थूल शरीर हेतु तो कुछ लाभ मिल भी सकता है मांस भक्षण से लेकिन, मर्मान्तक हत्या द्वार प्राप्त माँस से प्राण ऊर्जा नहीं मिलती और दूषित मन का निर्माण होता है।
अन्न के संस्कार के आधार पर ही- इसे सात्विक, तामसिक और राजसिक भागों में बाँटा गया है।
ऐसा जीव जो स्वतः मरा हो, उसका भक्षण करने पर उतना मन पर बुरा असर नहीं पड़ता, जितना जबरन स्वाद हेतु हत्या कर, तड़फ़ाकर हलाले माँस को खाने पर पड़ता है। कुत्सित कुंठित असंवेदनशील निर्दयी मन का निर्माण करती है, जो मानवमात्र के लिए घातक होता है।
🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाईन इण्डिया यूथ एसोसिएशन