Tuesday, 16 January 2018

कांग्रेस आज से नही बहुत पहले से जानती है कि नरेंद्र मोदी ही वो शख्स है जो कांग्रेस की नस नस से वाकिफ है और कांग्रेस को कैसे खत्म किया जाय ये नरेंद्र मोदी ही जानते है और कांग्रेस की शंका सही निकली कभी पूरे देश पर राज करने वाली कांग्रेस आज सिर्फ 6 राज्यो में सिमट कर रह गई और अब अमित शाह के आ जाने से कांग्रेस हताश हो गई ईसलिये वो अब नकारात्मक राजनीति कर रही है.
कांग्रेस बिना सत्ता के जल बिन मछली है वो सत्ता पाने के लिए झूठ,दंगे फसाद, लोगो को भड़काकर,किसानों को भड़काकार,देशविरोधी लोगो को आगे बढ़ाकर देश को नुकसान पहुचाने में भी नही सोचेगी.
कांग्रेस ने आजादी के बाद से ऐसे बीज बोए थे कि उसकी फसल काटकर वो देश पर 60 साल तक राज करती रही पहले उसने देश को बांटा और वोट बैंक के नाम पर मुस्लिमो को यही रहने दिया.ऐरो गेरो को मलाईदार प्रशासनिक पद बांटे,पुरुस्कार के साथ पैसे बांटे हर प्रशासनिक,न्यायालय जैसी संस्थाओं,सीबीआई और रॉ जैसी संस्थाओं में अपने लोग बिठाकर उन्हें भ्रष्टाचार की खुली छूट दी.
अब कांग्रेस के यही पालतू कभी देश मे दलितो पर अत्याचार का मुद्दा उठाते है,कभी असहिष्णुता की बात करते है,कभी जातिवाद,कभी मजहब के नाम पर,कभी आरक्षण के नाम पर देश मे अस्थिरता पैदा करने का काम करते है,कभी पुरुस्कार वापिस करते है(लेकिन पुरुस्कार में मिली राशि वापिस नही करते)कभी प्रशासनिक संस्थाओं पर आरोप लगाते है और अभी उसीमे से कुछ पालतू जज अपने नमक का हक़ अदा करते हुए न्याय व्यवस्था पर उंगली उठा रहे है.
मोदी को गुजरात दंगे और अमित शाह को सोहराबुद्दीन एनकॉउंटर में फसाने के लिए भी एड़ी चोटी का जोर लगाया पर सफलता नही मिली ईसलिये अब जस्टिस लोया का नया हथकंडा आजमा रही है.
आश्चर्य तो तब होता है जब देश को लोग ये सब जानते हुए भी इस कांग्रेस के बहकावे में आते है
हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान :
प्रकृति भी अपना स्वभाव सृष्टि के हित में बदलती है, हमें भी अपना स्वभाव गरीबों के हित में बदलना चाहिए जैसे जरूरतमंदों को दान देकर मदद करना। बच्चों से दान देने की आदत डालनी चाहिए। डॉ.भागवत जी ने आगे कहा कि दुनिया में इन दिनों अपने-अपने पंथ और संप्रदाय को ही सर्वोपरि बताने की प्रवृति बढ़ी है जो गलत और अस्वीकारणीय है। भारत में भी अनेक जातियां, बोलियां और देवी-देवता हैं लेकिन इतनी विविधता में भी एकता के दर्शन होते है। ४० हजार सालों से भारत की पहचान उसकी संस्कृति, उसके पूर्वज हैं।
 सुख की चाह में हम जो बटोर रहे हैं, उसमें से जरूरतमंदों को कुछ बांटने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत का चेहरा कोई पंथ या संप्रदाय नही हो सकता बल्कि संस्कृति ही हमारी पहचान है। उपरोक्त विचारों को हम आत्मसात करेंगे तो दुनिया की कोई ताकत हमें अलग नही कर सकती, हरा नही सकती। वर्तमान में दुनिया की निगाहें भारत की ओर हैं।
 जब-जब हम भारत की लिए लड़े, हमारी एकता कायम रही, हमें कोई जीत नही सका लेकिन जैसे-जैसे हम पंथ, संप्रदाय, भाषा इत्यादि को लेकर लडऩे लगे, हमारा देश टूटने लगा। हमें हमारे पूर्वजों पर अभिमान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति तोड़ती है लेकिन समाज और संस्कृति व्यक्ति को जोड़ती है।.......
 डॉ मोहन भागवत जी
देश मे मुस्लिम और क्रिश्चियन का कार्ड खेलने वाली कांग्रेस ने देश मे क्या-क्या गुलखिलाये हैं... जरूर जानना हरेक भारतवासी का हक़ है...*
2008 मे कांग्रेस सरकार बनने के बादके सोनीया एन्टोनिया ओर राहुलखान के काले कारनामे...
*मुस्लिम क्रिस्चियन आरक्षण का कहर !!*😡
राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद ४९ है जिसमे ४५ मुस्लिम क्रिस्चियन, तथा हिन्दू ४ थे...
उप राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद ७ जिसमे ७ ही मुस्लिम क्रिस्चियन "हिन्दू'' ०० थे
मंत्रियो के कैबिनेट सचिव कुल पद २० जिसमे १९ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू १ थे
प्रधानमंत्री कार्यालय मे कुल पद ३५ जिसमे ३३ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू २ थे
कृषि एवं सिचंन विभाग मे कुल पद २७४ जिसमे २५९ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू १५ थे
रक्षा मंत्रालय मे कुल पद है १३७९ जिसमे १३३१ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ५८ थे
समाज कल्याण एवं हैल्थ मंत्रालय कुल पद २०९ जिनमे १९२ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू-१७ थे
वित्त मंत्रालय मे कुल पद है १००८ जिसमे ९५२ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ६६ थे
ग्रह मंत्रालय मे कुल पद है ४०९ जिसमें ३७७ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ३३ थे
श्रम मंत्रालय मे कुल पद है ७४ जिसमे ७० मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ४ थे
रसायन एवं पेट्रोलियम मंत्रालय मे कुल पद है १२१ जिसमे ११२ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ९ थे
राज्यपाल एवं उपराज्यपाल कुल पद है २७ जिसमे २० मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ७ थे
विदेश मे राजदूत १४० जिसमे १३० मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू १० थे
विश्वविद्यालय के कुलपति पद १०८ जिसमे ८८ मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू १५ थे
प्रधान सचिव के पद है २६ जिसमे २० मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ६ थे
हाइकोर्ट के न्यायाधीश है ३३० जिसमे ३२६ मुस्लिम क्रिस्चियन हिन्दू ४ थे
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश २३ जिसमे २० मुस्लिम क्रिस्चियन हिन्दू नामधारी भी, हिन्दू ०३ थे
IAS अधिकारी ३६०० जिसमे २९५० मुस्लिम क्रिस्चियन हिन्दू नामधारी भी "हिन्दू ६०० थे
PTI कुल पद २७०० जिसमे २४०० मुस्लिम क्रिस्चियन, हिन्दू ३०० थे
१९४७ से अब तक किसी सरकार ने इस तरह से सविँधान को अनदेखा और इस का उल्लंघन नहीं किया, इस सरकार की नजरों तो जैसे मुस्लीम से श्रेष्ठ, ईमानदार, योग्य, अनुभवी और मेहनती कोई दूसरी जातियो्ँ है ही नहीं...
*क्या ये सब कानून का उल्लंघन और सविँधान के खिलाफ नहीं था ?*
दान की उम्मीद पर टिका भविष्य, मदरसों के हाल-चाल, मदरसों की राजनीति
मुगल सम्राट शाहजहां के चार बेटों दारा, शुजा, मुराद तथा औरंगजेब की विधिवत शिक्षा के लिए, दिल्ली की जामा मस्जिद के प्रांगण में विशेष रूप से मजहबी शिक्षा की व्यवस्था खुद शाहजहां के आदेश से शुरू हुई। बाद के दिनों में लाल किला के अंदर स्थित "मोती मस्जिद' शाही घरानों की तालीमगाह बनी। इस अवधि में "कुरआन-ए-मजीद', अरबी व फारसी भाषाएं, मंतक (तर्क शास्त्र) और इस्लामी इतिहास- कुल चार विषय पढ़ाने की परंपरा क्षेत्रीय मस्जिदों में कायम हुई। इस समय तक सार्वजनिक मदरसों या स्कूल की व्यवस्था नहीं थी।
1836 में अंग्रेजी सरकार द्वारा मैकाले शिक्षा पद्धति लागू किए जाने के बाद हिन्दू और मुसलमान दोनों वर्गों को अपनी-अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ा।
मुसलमानों की चिंता यह थी कि उनका मजहब और संस्कृति पूरी तरह नष्ट हो सकती है। लिहाजा 1866 ई. में उत्तर प्रदेश के नानौता निवासी हजरत मौलाना मुहम्मद याकूब नानौतवी ने सहारनपुर और मुजफ्फरनगर शहरों के बीच स्थित देवबंद कस्बे में छत्ता मस्जिद द्वार से सटे एक अनार के पेड़ के नीचे अपने एकमात्र शिष्य महमूद हसन को पढ़ाना शुरू किया। वेतन था सिर्फ पन्द्रह आना। एक शिक्षक और एक छात्र से जिस मदरसे की नींव पड़ी थी, आज वह वि·श्व में इस्लामी शिक्षा के लिए प्रसिद्ध अजहर वि·श्वविद्यालय, काहिरा (मिस्र) के बाद दूसरे नंबर के वि·श्वविद्यालय दारुल-उलूम, देवबंद के नाम से प्रसिद्ध है। आज वहां तीन हजार से ज्यादा छात्र हैं और सौ से ज्यादा अध्यापक। शहंशाह औरंगजेब के जमाने में यह शिक्षा पद्धति तेजी से लोकप्रिय हुई। गुलावठी, मुरादाबाद, मऊनाथभंजन, दरभंगा, सहानपुर, हैदराबाद में मदरसे खुले जो दारुल उलूम देवबंद से जुड़े हुए हैं। अफगानिस्तान के "तालिबान' इसी शिक्षा पद्धति की उपज हैं। कहा जाता है कि मुल्ला मुहम्मद उमर भी इसी मदरसे का छात्र था।
#मदरसा शिक्षा पद्धति
मदरसा शिक्षा पद्धति, मूलत: इस्लामी शिक्षा पर आधारित है। आम स्कूलों का पांचवां वर्ग यहां तन्तानिया और आठवां वर्ग वस्तानिया क्रमश: पहला और दूसरा वर्ग है। तीसरा वर्ग फौकानिया हाई स्कूल, चौथा वर्ग मौलवी इंटरमीडिएट के समकक्ष है। इसी प्रकार आलिम स्नातक के बराबर और फाजिल स्नातकोत्तर एम.ए. के समकक्ष है। कुल मिलाकर आठ वर्षों में एम.ए. की शिक्षा पूरी होती है। बी.ए., एम.ए. की शिक्षा अवधि दो-दो वर्षों की है। उपाधियां (डिग्रियां) देते समय दस्तार (पगड़ी) बांधने की परंपरा है।
इस शिक्षा पद्धति की समर्थक और संचालक शक्तियों का तर्क है कि छात्रों को उपाधियां देकर, उन्हें इस्लाम के प्रसार और मुसलमानों के नेतृत्व के लिए उम्मत (मुसलमानों) के हवाले कर दिया जाता है।
यहां एक बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि क्या मदरसा शिक्षित डिग्रीधारी अपनी कौम को विकासशील नेतृत्व उपलब्ध करा रहे हैं? और क्या इस्लामी प्रचार-प्रसार का काम प्रतिरक्षा और विकास दोनों मोर्चों पर मुसलमानों के जीविकोपार्जन या रोजगार की समस्या को हल कर पा रहा है?
इरशाद आलम रहमानी के शब्दों में एक अध्ययन के अनुसार औसतन 3000 छात्र मैट्रिक से बी.ए. तक की मदरसा डिग्रियां लेकर प्रतिवर्ष, जब रोजगार की तलाश में सड़क पर निकलते हैं तो उन्हें कहीं किसी मुल्क में उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई देती। 1970-71 से यह सिलसिला ऐसे ही चल रहा है।
मदरसा शिक्षा पद्धति, मुसलमानों की इस गिरती हुई स्थिति में सुधार नहीं कर पा रही है। आखिर क्यों? इसके लिए निम्न मुद्दों का अध्ययन करना होगा।
#मदरसों का उद्देश्य
यह एक ऐतिहासिक सवाल है, जिसका सिरा पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सलअम के जमाने से जुड़ा है। "नबी' साहब की मस्जिद में चला करता था, दुनिया का पहला मदरसा, जहां पैगम्बर की तकदीर, कुरआन के अवतरण, मानवता की हद, मानवाधिकार, मानवीय मूल्य, युद्ध, दण्ड, क्षमा, प्रायश्चित, ज्ञानार्जन और शिक्षा का महत्व, आदि कई विषयों पर विशेष चर्चा होती थी। पैगम्बर के निधन के बाद खिलाफत और बाद में मलूकियत (राजतंत्र) काल में भिन्न परिवर्तनों के साथ मदरसों ने एक स्वतंत्र संस्था का रूप ले लिया। और एक ही उद्देश्य बाकी रहा कि इस्लाम की रोशनी में जीवन के सभी क्षेत्र-प्रक्षेत्रों की शिक्षा का काम जारी रहे। आजादी के बाद भारत में हजारों मदरसे स्थापित हुए और कुरआन व सुन्नत की शिक्षा दी जाने लगी, लेकिन 1958 के प्रारंभ से ही संपूर्ण मुस्लिम आबादी इस्लाम के भिन्न-भिन्न फिका (मतों) में बंटने लगी। नमाज पढ़ने के तरीके, रोजा रखने और खोलने की मान्यता तथा अन्य इस्लामी कर्मकाण्डों में सुधार के नाम पर परिवर्तन की एक परंपरा चल पड़ी। भिन्न मदरसे भिन्न मतों के झंडाबरदार बन गए। आज एक मतावलंबी दूसरे मत के मदरसे में अपना नामांकन करा ले, तो उसे विरोध की आग में झुलस कर अंतत: अपना बोरिया-बिस्तर लपेट कर वापस जाना पड़ता है। जबकि शिक्षा संस्थानों में सभी मतों के बारे में तर्कसंगत जानकारी दी जानी चाहिए। देवबंदी, बरेलवी, अहले हदीस, हन्फी सुन्नी आदि अनेक मत हैं। सभी मतों के अपने-अपने मदरसे हैं और वहां दूसरे मतों पर चर्चा करना भी गुनाह माना जाता है। किसी छात्र ने अगर मत-विभाजन का अध्ययन करना चाहा, तो उसे मदरसे से निकाल दिया जाता है। सच्चाई यह है कि तमाम मदरसे अब मदरसा इस्लामिया न होकर मदरसा कासिमिया, मदरसा सल्फिया और मदरसा रहमानिया हो गए हैं, जो अपने छात्रों को अध्ययन की स्वतंत्रता भी नहीं देते। इस्लाम के बारे में एक मत विशेष की मान्यता दूसरे मतावलंबी नहीं मानते, एक-दूसरे को गुमराह करार देते हैं और यहीं से मदरसों की पवित्रता खंडित होने लगती है। वहां किसी एक मत को ही स्वीकार करना होता है, और दूसरे का अध्ययन भी वर्जित है। ऐसी स्थिति में छात्र जब उपाधियां लेकर बाहर निकलते हैं तो दूसरे वैचारिक मत के समर्थकों के लिए अनुपयोगी सिद्ध होते हैं।
#मदरसों के छात्र
मदरसा छात्रों में सभ्य, सुसंस्कृत, ऊंची जाति और ऊंचे मुस्लिम घरानों के छात्र नहीं होते। यही कारण है कि सुदृढ़ अध्ययन पर आधारित आलिम (बी.ए.) और फाजिल (एम.ए.) उत्तीर्ण शिक्षकों का अभाव, शिक्षण कार्य को संपूर्ण करने में एक बड़ी बाधा बन गया है। पैंट-कमीज पहनना, दाढ़ी मुंडवाना, रेडियो सुनना, टेलीविजन देखना और अखबार पढ़ना तकरीबन सभी मदरसों में वर्जित है। इसे हलाल और हराम की कसौटी पर परखे बिना, वर्जना का फतवा जारी है। छात्र इससे कुंठित होते हैं। नाटक पढ़ना, खेलना और देखना भी वर्जित है। इन तमाम चीजों को यहां तक कि अखबारों को भी "गुनाह' का रास्ता कहा जाता है, जिसके कारण छात्र सामाजिक सरोकार से बिल्कुल कट जाता है।
#मदरसा पाठ्यक्रम
किसी भी शिक्षण संस्था या शिक्षा पद्धति की मूलभूत पूंजी है-पाठ्यक्रम। उर्दू में इसे निसाब-ए-तालीम कहते हैं। तमाम शिक्षक इसी के आधार पर काम करते हैं। हालांकि मदरसा शिक्षकों द्वारा मेहनत और लगन से शिक्षा देने में कोई कोताही नहीं की जाती लेकिन शिक्षा व्यवस्था सामयिक, प्रासंगिक, और जमाने की तब्दीलियों के लिहाज से तर्कसंगत न होने के कारण वांछित फल नहीं मिल पाता। आम तौर पर मदरसों में तीन प्रचलित पद्धतियां लागू हैं:-
(क) दरस-ए-निजामिया : यह सैंकड़ों वर्ष पुरानी शिक्षा पद्धति है जो शहंशाह औरंगजेब के जमाने से चली आ रही है। औरंगजेब के बाद शिक्षा और शिक्षण के मुद्दे पर कई क्रांतियां हुईं, लेकिन इस शिक्षा पद्धति में तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र के वही 400 वर्ष पुराने सूत्र पढ़ाए जाते हैं, जो अब अनुपयोगी सिद्ध हो चुके हैं
(ख) जामिया इस्लामिया मदीना का पाठ्यक्रम : इस्लामिया वि·श्वविद्यालय, मदीना, अरब अमीरात का यह पाठ्यक्रम भारत में "सल्फी' मत ने कुछ अनिवार्य संशोधन के बाद लागू किया। लेकिन इस पाठ्यक्रम से शिक्षित छात्रों को भी जीवनयापन के मैदान में, शिक्षा का कोई लाभ नहीं मिल पाता।
(ग) नदवत-उल-उलेमा का पाठ्यक्रम : यह पाठ्यक्रम दइस-ए-निजामिया से बेहतर और भिन्न है। लेकिन भारतीय समाज में मुसलमानों की यह मजबूरी है कि वह एक मदरसे से शिक्षा लेकर निकले तो दूसरे किसी समान मत के मदरसे में ही जिंदा रह सकते हैं, यह चिंता उन्हें घेरे रहती है। उनमें किसी अन्य कारोबार की योग्यता का अभाव रहता है।
#मदरसा शिक्षा व्यवस्था
मदरसों की संख्या हजारों में है। रोजगार के अभाव में मदरसों से शिक्षित लोग जब दस-बारह वर्ष की बेरोजगारी से ऊब जाते हैं तो उनके पास एक ही विकल्प बचता है कि वे भी मदरसा खोल लें, यही कारण है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में और आजकल पश्चिम बंगाल, केरल, असम में मदरसों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मदरसों को नियंत्रित करने के लिए जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय या देश के स्तर पर कोई समिति या परिषद् नहीं है, जिसके कारण तमाम मदरसे निजी व्यवस्था के तहत चलते हैं।
#हिन्दी अंग्रेजी शिक्षा
कुछ मदरसों में अंग्रेजी पढ़ाई जाती है। जैसे नदवत-उल-उलेमा (देवबंद) और सल्फी मदरसा (दरभंगा) में। लेकिन बी.ए. के छात्रों को भी अधिक से अधिक सातवें वर्ग की अंग्रेजी पढ़ाई जाती है। शेष 98 प्रतिशत मदरसों में अंग्रेजी और हिन्दी भाषा पढ़ना वर्जित है।
#उर्दू साहित्य का अध्ययन
मदरसों में भले ही उर्दू भाषा पढ़ाई जाती है, लेकिन वहां उर्दू साहित्य बिल्कुल नहीं पढ़ाया जाता। बीसियों स्नातक और स्नातकोत्तर (आलिम और फाजिल) के छात्रों से बातचीत करने पर यह तथ्य सामने आया कि वे भारत के फारसी शायर अमीर खुसरो को उनकी रचनाओं के माध्यम से नहीं जानते। गालिब, मीर तकी मीर, इकबाल, फैज से परिचित ही नहीं है। उन्होंने सआदत हसन मंटो को नहीं पढ़ा और न समझना चाहते हैं। भारत में मुसलमानों के इतिहास से वे परिचित नहीं है।
मदरसा शिक्षितों का दावा है कि वे "आलिम' (विद्वान) हैं, उनका मान-सम्मान अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत के मदरसा शिक्षित आलिमों में से 90 प्रतिशत उलेमा इल्मे समाजियात (समाजशास्त्र) इल्मे सियासियात (राजनीति शास्त्र), इल्मुवारीख (इतिहास), इल्मे लसानियात (भाषा विज्ञान), इल्मुल अख्लाक (नीति शास्त्र), इल्मुल अग्जिया (आहार विज्ञान), इल्मुल अफलाक (अंतरिक्ष विज्ञान), इल्मुल हयात (दर्शन शास्त्र) आदि से सर्वथा अनभिज्ञ हैं, जबकि इन विषयों पर उर्दू भाषा में किताबें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
#मदरसों में उद्यम (रोजगार) शिक्षा
प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चे को आम शिक्षा के साथ-साथ रोजगार दिलाने वाली शिक्षा भी देना चाहता है। हाल के वर्षों में कई मदरसों ने पोस्टर से विज्ञापित किया कि उनके यहां इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ छात्रों को कटिंग, सिलाई, कशीदाकारी, जरदोजी और कैलिग्राफी का रोजगारोन्मुख काम भी सिखाया जाएगा। इससे मदरसों की मानसिकता और उनके लक्ष्य का पता भी चलता है।
किसी भी शिक्षण संस्थान के लिए पुस्तकालय या कुतुबखाना की अहमियत सबसे ऊपर है। लेकिन एक हजार में से 995 मदरसों में अच्छी किताबों का सर्वथा अभाव है। मदरसों में आज भी पुस्तकालय एक ख्वाब है।
#अखबारों से सम्बंध
आमतौर पर 99 प्रतिशत मदरसों, मदरसा शिक्षकों, छात्रों व कर्मचारियों का सम्बंध पत्र-पत्रिकाओं से नहीं होता। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कुछेक शिक्षक किसी-किसी शहर में उर्दू अखबारों तक सीमित हैं। छात्रों के लिए उर्दू-हिन्दी कोई भी अखबार पढ़ना वर्जित है। यदि किसी ने अखबार पढ़ लिया, तो उसका खाना बंद कर दिया जाता है। या खूब पिटाई होती है- "कम्बख्त काफिर और दहरिया (सांसारिक) ही बनना था, तो मदरसे में क्यों आया?'
#दस्तारबंदी (दीक्षान्त)
एम.ए. यानि फाजिल की उपाधि वालों और हाफिजों को "दस्तार' (पगड़ी) बांधने की रस्म बहुत पुरानी है। नदवत-उल-उलेमा साहित सभी मदरसों का वार्षिक और अनिवार्य समारोह "दस्तारबंदी' ही है। दस्तारबंदी छात्रों को समाज से ऊपर, अलग और ऊंचा स्थान प्राप्त कर लेने का एक मजबूत एहसास प्रदान करती है। इसके बाद जब वह रोजगार के लिए व्यावहारिक मैदान में निकलता है तो कर्मभूमि में वह खुद को सबसे अलग पाता है। स्वयं को ऊंचा समझने का एहसास उसे समाज से मिलने जुलने नहीं देता।
लगभग सभी मदरसों में छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था है। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से छात्र यहां आते हैं। अत्यधिक नामांकन मदरसों की व्यावसायिक मजबूरी है। छात्रों की संख्या ज्यादा होगी तो चंदा उगाहने में आसानी होगी, क्योंकि मदरसों में छात्रों के रहने और भोजन की नि:शुल्क व्यवस्था आज भी चल रही है। लेकिन, अधिक नामांकन का नतीजा यह निकलता है कि छ: लड़कों के रहने वाले कमरे में दस छात्रों को रखना आम बात है। नामांकन समाप्ति के समय वही कमरा बीस छात्रों का शयनकक्ष बन जाता है। 15 न् 15 के कमरे में एक दरी बिछी होती है, जिस पर एक दूसरे के साथ तकरीबन सटकर सोना सभी की मजबूरी है। यही कारण है कि ज्यादातर मदरसों में समलैंगिक सम्बंध जैसी बुराइयों ने जन्म ले लिया है, जो सरासर इस्लाम के खिलाफ है।
#मदरसा शिक्षितों की उपयोगिता
मदरसा शिक्षितों के प्रमाणपत्रों और उपाधियों में शिक्षण की उपयोगिता साबित कर दी जाए, तो मदरसा शिक्षा की उपयोगिता का मसला हल हो सकता है। केवल पांच वक्त नमाज पढ़ लेने या इसके लिए अवाम को नियंत्रित कर लेने भर से इस्लाम का हक अदा नहीं होता।
#मदरसों का अर्थ प्रबंधन
मदरसों को अपने खर्च के लिए जकात, खैरात, फितरा, खुम्स यानी मजहब के लिए अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रतिवर्ष रमजान शरीफ में, ईद और बकरीद के मौके पर मजहब के लिए अनुदान मांगने वाले पोस्टर नियमित रूप से सभी मदरसे प्रकाशित करते हैं।
उक्त पोस्टरों में छात्रों की संख्या होती है, जिन्हें गरीब, नादार, मातृहीन, पितृहीन घोषित किया जाता है। ये मदरसे वे संपूर्ण रूप से "चंदे' (अनुदान) की राशि पर निर्भर हैं।
#मदरसों की राजनीति
आम तौर पर यह कहा-माना जाता है कि मदरसे राजनीति से अलग हैं। लेकिन मदरसों की राजनीति अपनी कौम पर बदस्तूर जारी है। मदरसा संचालकों में ज्यादातर आधे-अधूरे उलेमा हैं। अगर किसी मौलवी की आलोचना की जाए, तो वह फौरन फतवा जारी करेंगे कि "इस्लाम' पर हमला हो रहा है। बात गले नहीं उतरती कि कोई "व्यक्ति विशेष' अकेले "सम्पूर्ण इस्लाम' कैसे हो सकता है? ऐसे लोगों को वोट की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त होता है, जिनकी वजह से कौम पर उनका दबाव डंडे के जोर पर कायम है।
मदरसा आलिमों की सबसे बड़ी और अपनी ही कौम को गुलाम बनाए रखने की राजनीति यह है कि वे छात्रों को अरबी पढ़ना भर सिखा देते हैं, परन्तु अरबी का अर्थ पढ़ना आमतौर पर वर्जित है। जो कोई कुरआन की आयतों को समझने का प्रयास करता है, उसे फौरन कहा जाता है कि इस्लाम में हस्तक्षेप गुनाह है।
उलेमा की राजनीति उनके इस अमल से ज्यादा स्पष्ट होती है कि "शराब' इस्लामी मान्यताओं के अनुसार हराम है, शराब की हालत में मरने वाले मुसलमानों के जनाजे की नमाज भी नहीं पढ़ाई जानी चाहिए। लेकिन यह हकीकत इसलिए छिपा कर रखी गई है क्योंकि शराब पीने-पिलाने वाले मुसलमान धनाढ्य हैं और मदरसों को मोटी रकम "चंदे' के तौर पर देते हैं। अगर "शराबी' की आलोचना खुलेआम करें या फतवा जारी करें, तो चंदा नहीं मिलेगा, अर्थतंत्र ध्वस्त होने लगेगा। लिहाजा ऐसे कई मामलों में खामोशी उनकी राजनीति का कुत्सित हिस्सा है।
असम में कांग्रेस सरकारों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को न केवल बसाया, बल्कि उन्हें अपना वोट बैंक भी बनाया। अब जबकि उच्चतम न्यायालय की देखरेख में राष्ट्रीय नागरिक पंजी की पहली मसौदा सूची जारी हुई तो जहां कांग्रेस इसका श्रेय लेने की जुगत में है, वहीं ममता बनर्जी को यह पूरी प्रक्रिया बंगलाभाषियों के विरुद्ध साजिश दिखती है
असम तथ्यान्वेषण के दौर से गुजर रहा है। खोज इस तथ्य की हो रही है कि कौन भारतीय है और कौन विदेशी। दशकों से बांग्लादेशी घुसपैठियों के वहां आकर बसने और नतीजतन तेजी से बदलती जनसांख्यिकी प्रकृति के कारण सामाजिक दबाव एवं हिंसा का सामना कर चुके इस सीमावर्ती राज्य के लिए सच को जानना जरूरी है। वैसे तो यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन हर बीतते दिन के साथ सामाजिक संकट को विकट बनाती यह घुसपैठ कुछ राजनीतिक दलों को रास आ रही थी। इस कारण मामला अटकता रहा। राहत की बात यह है कि पहचान-परख का यह काम सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में चल रहा है। उम्मीद है कि इससे वे छेद बंद हो सकेंगे जो संकीर्ण हितों को पैर फैलाने का रास्ता देते रहे।
सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी को अद्यतन करने का काम शुरू हुआ है। 1951 के बाद पहली बार हो रही इस प्रक्रिया के अंतर्गत 31 दिसंबर की रात को असम में पहली सूची जारी हुई जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम हैं और बाकी की जांच हो रही है। पंजी में नाम शामिल करने के लिए 3.24 करोड़ लोगों ने आवेदन दिया था। दशकों की धूल झाड़ने का काम जिस तरह आनन-फानन में हुआ, उसमें कुछ कमियों का रह जाना स्वाभाविक था। कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए जिसमें एक परिवार के ज्यादातर लोगों के नाम तो आ गए, पर एक-दो के छूट गए। इसमें सभी वर्गों और राजनीतिक दलों के लोग शामिल हैं। नलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से सत्ताधारी भाजपा के विधायक अशोक सरमा व उनके पुत्र हिमेन सरमा का नाम इसमें नहीं हैं, जबकि उनकी मां, पत्नी और बेटी के नाम हैं। बरखेत्री से भाजपा विधायक नारायण डेका व उनकी पत्नी का नाम भी सूची में नहीं है, जबकि उनकी मां का नाम है। इसी तरह, धुबरी से सांसद और एआईएडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल व बरपेटा से उनके सांसद पुत्र सिराजुद्दीन अजमल, रुपहीहाट से कांग्रेसी विधायक नुरुल हुदा जैसे तमाम लोग हैं जिनका नाम मसौदा सूची में नहीं है।
#भारतीय हैं तो चिंता क्यों?
इस मामले में रजिस्ट्रार जनरल आॅफ इंडिया से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक ने आश्वस्त किया है कि किसी भी भारतीय को आशंकित होने की जरूरत नहीं है, एक-एक व्यक्ति का नाम शामिल किया जाएगा। पर असम में भारतीयों की पहचान के मामले में सहूलियत के मुताबिक एक कदम आगे-दो कदम पीछे की रणनीति पर चलने वाली कांग्रेस श्रेय लेने की कतार में आगे खड़ी हो गई है। वहीं, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो एनआरसी को अद्यतन करने की पूरी प्रक्रिया को ही बंगलाभाषियों के प्रति साजिश बताती हैं। हालांकि असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल महंत एनआरसी को राज्य की समस्या के स्थायी समाधान के कदम के तौर पर देखते हैं। वे कहते हैं, ‘‘एनआरसी को अद्यतन करने का पूरा काम सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रहा है। यहां की समस्या को खत्म करने का यही एक रास्ता था। भारत के लोगों और 24 मार्च, 1971 की मध्यरात्रि से पहले भारत आए बांग्लादेशियों को घबराने की जरूरत नहीं है। काम पारदर्शी ढंग से हो रहा है। अंतिम सूची आते-आते सभी भारतीय इसमें शामिल कर लिए जाएंगे।’’
#भारतीय बनाम विदेशी
एनआरसी तैयार करने का मकसद भारतीयों की पहचान करना है और इस पूरी प्रक्रिया को स्थानीय लोगों के अलावा 24 मार्च, 1971 तक असम आ चुके लोग बड़ी राहत के तौर पर देखते हैं। हालांकि अंतिम सूची में शामिल होने के लिए जरूरी कागजात इकट्ठा करने की जद्दोजहद तो है, पर इस बात की राहत भी है कि कागजी खानापूर्ति के बाद कोई उनकी ओर संदेह की नजर से नहीं देखेगा। राजनीतिक विश्लेषक रविशंकर रवि कहते हैं, ‘‘निश्चित तौर पर ऐसे लोगों, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, में राहत का भाव तो है।’’ वहीं, आशंका जताई जा रही है कि कुछ तत्व एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया को हिंदू बनाम मुस्लिम रंग देकर तनाव पैदा करने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि 2010 में बरपेटा में शुरू किए गए एनआरसी के पायलट प्रोजेक्ट के दौरान आॅल मुस्लिम स्टूडेंट्स यूनियन के विरोध के बाद कई भागों में हिंसा भड़क गई थी। इस पर प्रफुल्ल महंत कहते हैं, ‘‘चूंकि सब उच्चतम न्यायालय की निगरानी में हो रहा है। उम्मीद है कि एहतियात के सभी कदम उठाए जाएंगे।’’
#जवाबदेही से नहीं बच सकती कांग्रेस
रविशंकर रवि कहते हैं, ‘‘कौन भारतीय है? इस मामले में दशकों तक अस्पष्टता के कारण समाज के एक तबके में आशंका की स्थिति पैदा हुई और कुछ दल इसका लाभ उठाते रहे। एनआरसी पर ममता बनर्जी का बयान बंगलाभाषियों के बीच पकड़ मजबूत करने का ही एक प्रयास है। बेशक, कांग्रेस के समय 1985 का असम समझौता हुआ, पर राज्य की कांग्रेस सरकारों ने बांग्लादेश से आए लोगों का इस्तेमाल सत्ता पाने के औजार के तौर पर किया।’’
दरअसल, आजादी के बाद असम में जिस रफ्तार से बांग्लादेशी घुसपैठिए आकर बसने लगे, उसे देखते हुए तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने आने वाले नाजुक समय को भांप कर एनआरसी तैयार कराने की व्यवस्था की थी। इसी कारण 1951 में पहला एनआरसी आया, जिसे हर दस साल पर अद्यतन करने का प्रावधान था। पर कांग्रेस सरकारों ने जान-बूझकर इसे अद्यतन नहीं कराया व बांग्लादेशी घुसपैठियों को ‘वैध नागरिक’ बनाने का खेल चलता रहा। धीरे-धीरे असम के कई जिलों में मुसलमानों की संख्या इतनी हो गई कि वे सत्ता के समीकरण तय करने लगे। इस संदर्भ में आपातकाल के बाद हुए चुनाव को खास तौर पर देखा जा सकता है। इस चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई और उसके परंपरागत मतदाता मुसलमान व चाय बागान में काम करने वाले उससे छिटक गए। असम मामलों के जानकार अरविंद कुमार राय कहते हैं, ‘‘तब कांग्रेस ने उन क्षेत्रों में बांग्लादेशियों को बसाना व मतदाता बनाना शुरू किया जहां उनकी हार का अंतर अधिक नहीं था। अन्य स्थानीय संगठनों और बांग्लादेश में बैठे कट्टरपंथी दलों ने इस आग में घी डाला और असम के जनसांख्यिकी ढांचे को काफी हद तक बदल डाला। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि लगभग 18 जिलों में जीत का समीकरण अवैध बांग्लादेशी तय करने लगे।’’ असम के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में बाहरी लोगों के इसी वर्चस्व के खिलाफ असमिया अस्मिता का आंदोलन शुरू हुआ जिसकी परिणति 1985 के असम समझौते के रूप में हुई।
#सच को सामने लाने वाले योद्धा
एनआरसी को अद्यतन करने के मुद्दे को कागजों से निकाल कर व्यवहार में लाने का श्रेय 85 वर्षीय बुजुर्ग प्रदीप गोगोई और 43 वर्षीय अभिजीत सरना को जाता है। मतदाता सूची से करीब 41 लाख अवैध नामों को बाहर करने के लिए गोगोई ने सामाजिक कार्यकर्ता अभिजीत सरना से संपर्क किया। इस तरह 20 जुलाई, 2008 को सर्वोच्च न्यायालय में मामला दर्ज हुआ। इनके अनुरोध पर अदालत एनआरसी को अद्यतन करने की प्रक्रिया की देखरेख पर राजी हो गई। 2015 में इस पर काम शुरू हुआ और अदालत के निर्देशानुसार 31 दिसंबर, 2017 को इसका पहला मसौदा जारी किया गया। वैसे, 2012 को असम सम्मिलित महासंघ के अध्यक्ष मतिउर रहमान ने उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर ‘कट आॅफ’ साल 1950 करने का भी अनुरोध किया था। कुल मिलाकर एनआरसी को अद्यतन करने की प्रक्रिया वैध भारतीयों की पहचान का ऐसा चिर-प्रतीक्षित काम है जो असम में स्थायी शांति की पहली सीढ़ी है। बड़े बदलाव के दौर में झूठ और आधे सच की राजनीति करने वालों में छटपटाहट तो होगी, पर व्यापक सामाजिक-राजनीतिक सफाई के लिए यह जरूरी था।
#घुसपैठ रुकेगी समस्या हल होगी
ब्रिगेडियर (सेनि.) आर.पी. सिंह का कहना है, ‘‘किसी समस्या को हल करने की दिशा में पहला कदम यह होता है कि उसे और बढ़ने से रोका जाए। असम में समस्या की जड़ है बांग्लादेशियों का लगातार आना। भारतीयों की सूची तैयार करने का बड़ा फायदा यह होगा कि घुसपैठ रुक जाएगी और असम की समस्या के निवारण का पहला चरण पूरा हो जाएगा। यह बाद की बात है कि गैर-भारतीयों का क्या होगा। 1985 के असम समझौते में ऐसे लोगों को वापस भेजने की बात थी, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समझौता भारत में रह रहे विभिन्न हितधारकों के बीच था। जब तक समझौते की जद देश के भीतर है, कोई दिक्कत नहीं, पर जब कुछ लोगों को वापस भेजने की बात होगी, उसमें बांग्लादेश खुद ही एक पक्ष बन जाएगा। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार से भारत के अच्छे रिश्ते हैं, जिन्हें खतरे में नहीं डाला जा सकता। इसलिए यह एक टेढ़ा मामला होगा।
दूसरी बात, असम की मूल समस्या भारतीय बनाम बांग्लादेशी है। आशंका है कि बांग्लादेश के कट्टरपंथी इसे हिंदू बनाम मुस्लिम का रंग देने की साजिश कर सकते हैं। इसके प्रति सरकार को सावधान रहना होगा। ध्यान रखना होगा कि धुबरी से सांसद और एआईएडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के जमात-ए-इस्लामी से नजदीकी संबंध जगजाहिर हैं।’’
#समस्या की अनदेखी ज्यादा खतरनाक
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी कहते हैं, ‘‘जब घर के किसी कोने में आग लगी हो तो आप दरवाजे बंद करके निश्चिंत नहीं हो सकते। लपटें छोटे-छोटे झरोखों से फैलती रहेंगी और एक समय ऐसा आएगा जब आग पूरे घर को तबाह कर देगी। असम के मामले में ऐसा ही हुआ है। कुछ तो राजनीतिक हित व कुछ नौकरशाही की लापरवाही के कारण अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा सुलगता रहा। लेकिन इसकी ओर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। हां, पहले कदम उठा लेते तो मामला इतना नहीं बिगड़ता। आज कदम उठाने पर ज्यादा परेशानी तो होगी, पर इसे नजरअंदाज करना और खतरनाक होगा। वैसे तो आजादी के पहले से ही दूसरे इलाकों से असम में आकर बसने का सिलसिला चलता रहा। किंतु असम की जनसांख्यिकी में तेजी से बदलाव आजादी के बाद और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में आजादी का संघर्ष छिड़ने के बाद आया। पाकिस्तानी सेना के अमानवीय अत्याचारों के कारण लोग बड़ी संख्या में पलायन कर असम और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों में घुस आए। इससे वहां दिक्कतें तो होनी थीं। असम में मामला असमिया व बांग्ला भाषा-भाषी आबादी का है। जिस दौरान मैं चुनाव करा रहा था, मेरे पास भी बंगलाभाषियों का प्रतिनिधिमंडल आता था। वे कहते थे कि हम तो हिंदू हैं। हमारे साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। बांग्लादेश से आए लोग निहायत गरीब रहे हैं और यह उनकी कमजोरी भी है जो उनके गलत इस्तेमाल की आशंकाएं भी पैदा करती है। 1985 के असम समझौते के बाद दरिया में काफी पानी बह चुका है और हालात काफी बदल चुके हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार में बड़े और कड़े फैसले लेने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखती है। ऐसे में बेहतर की उम्मीद की जानी चाहिए।’’

Monday, 15 January 2018

असल में मुकेश अंबानी हमेशा से कांग्रेस के करीब रहे
आप कांग्रेस की उन्नाव से पूर्व सांसद रही अनु टंडन की स्टोरी पढिये
जानिए कौन है ये अनु टंडन ? इनके पति संदीप टंडन की रहस्यमय ढंग से स्विट्जरलैंड में मौत क्यों हुई ? सिर्फ बीएससी पास अनु को मुकेश अंबानी ने आठ हजार करोड़ की पूजी लगाकर एक सोफ्टवेयर कम्पनी मोटेक क्यों दे दिया ? आखिर लगातार घाटे के बावजूद भी मुकेश अंबानी इस कम्पनी को क्यों चलाते रहे ? संदीप टंडन जिस कम्पनी के छापा मारे उसकी कम्पनी के निदेशक कैसे बन गये ? फिर वो मुंबई के बजाय जयूरिख क्यों रहते थे ?
देश की जनता इन सवालों का जबाब गाँधी खानदान से चाहती है ..
१-आखिर अनु टंडन जिसने सिर्फ दो दिन पहले ही कांग्रेस ज्वाइन किया उसे राहुल गाँधी ने सांसद का टिकट क्यों दिया ? और अगर टिकट दिया तो उन्नाव में राहुल गाँधी ने अनु को जिताने के लिए एडी चोटी का जोर क्यों लगाया ?
२- रिलाएंस ग्रुप पर छापा मारने वाले संदीप टंडन के इशारे पर पूरी केंद्र सरकार और गाँधी परिवार क्यों उनके कदमो में गिर जाता था ? आखिर संदीप टंडन ने मुकेश अंबानी के ठिकानो और एचएसबीसी बैंक पर छापे के दौरान ऐसी कौन कौन से दस्तावेज बरामद किये जिससे गाँधी परिवार संदीप टंडन के इशारे पर नाचता रहा ?
३- आखिर संदीप टंडन की स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में हुई रहस्यमय मौत की जाँच क्यों नही हुई ? एक कांग्रेसी सांसद और उपर से राहुल गाँधी के कोर कमेटी का मेबर अनु टंडन के पति की रहस्यमय मौत पर केंद्र सरकार और कांग्रेस खामोश क्यों ?
४- आखिर संदीप टंडन साल में आठ महीने स्विट्जरलैंड में क्यों रहते थे ? उन्होंने वहा घर भी ले रखा था |जब वो रिलाइएन्स में निदेशक के पद पर थे तब वो अपने ऑफिस में रहने के बजाय स्वित्जेर्लैंड में क्यों रहते थे ?
५- छुट्टियाँ मनाने के बहाने बार बार राहुल गाँधी, राबर्ट बढेरा और खुद सोनिया गाँधी बार बार संदीप टंडन के पास ज़ियुरिख स्वीतजरलैंड क्यों जाते थे ?
६-स्विट्जरलैंड स्थित भारतीय दूतावास आनन फानन में संदीप टंडन के शव को भारत क्यों भेज दिया ? जब उनकी मौत प्राकृतिक नही थी तब उनके शव का पोस्टमार्टम क्यों नही किया गया ?
मित्रों, जब लोकसभा चुनावो में कांग्रेस ने उन्नाव से अनु टंडन को टिकट दिया तब यूपी कांग्रेस की अध्यछ और उन्नाव जिले के कांग्रेस अध्यछ तक को नही मालूम था की ये अनु टंडन कौन है ? राहुल गाँधी ने यूपी कांग्रेस के पदाधिकारियो से कहा की ये अनु टंडन हर हाल में जितनी चाहिए इसके लिए कुछ भी करना पड़े |
मित्रो, शाहरुख़ खान, सलमान खान से लेकर रवीना, कैटरिना आदि बालीयुड के सैकड़ो सितारे उन्नाव में अनु टंडन के प्रचार के लिए आये |
मित्रो, अनु टंडन के पति संदीप टंडन इंडियन रेवेन्यु सर्विस के अधिकारी थे .. ये उस टीम में शामिल थे जिस टीम ने रिलाएंस ग्रुप पर छापा मारा था .. फिर मजे की बात ये है की छापे के कुछ महीनों के बाद ही नाटकीय ढंग से ये सरकारी नौकरी छोडकर रिलाएंस इंडस्ट्रीज के बोर्ड में शामिल हो गये . जबकि ये गलत था |
और तो और इनकी पत्नी अनु टंडन जो सिर्फ बीएससी [बायो] पास थी और जिनके पास कोई अनुभव तक नही था ..उनको मुकेश अंबानी ने अपनी सोफ्टवेयर कम्पनी मोतेफ़ का सर्वेसर्वा बना दिया . आखिर क्यों ?
मित्रो, असल में संदीप टंडन ने छापे के दौरान कई ऐसे कागजात और सुबूत बरामद किये थे जिससे पता चलता था की गाँधी खानदान के कालेधन को मुकेश अंबानी सफेद कर रहे है | असल में अमेरिका और भारत सहित कई देशो में स्विस बैंको के खिलाफ गुस्सा फैला है और स्विस सरकार अमेरिका, जर्मनी सहित कई देशो से संधि कर चुकी है की वो अपने यहाँ जमा कालेधन का ब्यौरा देगी | इससे गाँधी खानदान ने अपने कालेधन को निकालकर मुकेश अंबानी को देकर उसे सफेद करने में जुट गया |
देश की कई एजेंसिओ को भनक लगी की मुकेश अंबानी हवाला में माध्यम से दुबई से कालाधन अपनी कम्पनी में कमिशन लेकर सफेद कर रहे है तो डीआरआई ने मुकेश अम्बानी के ठिकानो पर अचानक छापा मारा जिसका नेतृत्व संदीप टंडन कर रहे थे | फिर मुकेश अंबानी और गाँधी परिवार ने मुंहमांगी कीमत देकर संदीप टंडन को ही खरीद लिया |
मित्रो, सोचिये एक बड़ा सरकारी अधिकारी जिस कम्पनी पर छापा मारता है वो सिर्फ चंद महीने के बाद उसकी कम्पनी का निदेशक कैसे बन जाता है ?
केंद्र सरकार ने संदीप टंडन की वीआरएस की अर्जी तुरतं ही मंजूर कैसे कर ली ?
संदीप टंडन की रहस्मय मौत की खबर जिन जिन वेब साईट पर थी उन साइटों को केंद्र सरकार ने किसके आदेश से ब्लोक कर दिया ?
मित्रो, सोचिये जिस महिला को राजनीती का एक दिन का भी अनुभव न हो उसे राहुल गाँधी अपनी कोर ग्रुप की सबसे अहम सदस्य कैसे बना सकते है ? आखिर इसके पीछे क्या राज है ?Jitendra Pratap Singh, Veena Srivastava 
टाइम्स ऑफ इंडिया... चाय के दौरान एक जूनियर जज का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करनेवाले जजों को खूब खरी-खोटी सुनाई। जूनियर जज ने कहा, 'आप प्रेस के पास क्यों चले गए? आपने मीडिया से बात करने से पहले हमें बताना भी जरूरी नहीं समझा। आपको चीफ जस्टिस के द्वारा केसों का रोस्टर तैयार करने को लेकर कुछ शिकायत थी तो आप पहले हमसे बात करते।' 

जूनियर जज ने चारों 'बागी' जज पर यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने मीडिया से बात कर इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया। न्यायपालिया की कार्यप्रणाली पर नेताओं को छीछालेदर करने का मौका मिल गया। जूनियर जजों ने इस दौरान यह भी कहा कि चारों जज एक फुल कोर्ट मीटिंग बुलाकर इस मुद्दे पर आंतरिक विचार-विमर्श कर सकते थे। वहीं कुछ जूनियर जजों ने तो यह भी कहा कि सीनियर जजों ने ऐसा करके यह साबित करने की कोशिश की है कि बड़े केसों की सुनवाई करने की कुशलता सिर्फ वरिष्ठ जजों में ही है। 

एक जूनियर जज ने कहा, 'प्रेस के पास जाकर आपने कहा कि महत्वपूर्ण केसों को सुनवाई के लिए जूनियर बेंच के पास भेजा जाता है। ऐसा कहकर आप क्या यह साबित करना चाहते हैं कि बड़े केस जिनकी देश में काफी चर्चा हो, उसे सुनने की योग्यता सिर्फ वरिष्ठ जजों के पास है और हम जूनियर बेंच ऐसे केसों पर सही फैसला नहीं दे सकते। आपके इस व्यवहार ने न सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाई है बल्कि प्रत्येक जज की निष्ठा पर शक के बादल खड़े कर दिए हैं।